जिस देवर को उसने अपना बेटा माना:वही आज उसे...क्यों चले गए? अनुभव तुम…तुम्हारे जाने से रिश्तों के सारे मायने ही बदल गए

5 महीने पहले
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"तुमने अपनी जिंदगी के बेहतरीन दस साल उस घर को दिए और आज उसी घर में तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं है। तुमने अपना सर्वस्व लगा दिया, ताकि उस घर का हर सदस्य खुश रहे। जीवन में कोई न कोई मुकाम हासिल कर सके…और ऐसा हुआ भी, मणी। ईंट-ईंट जोड़कर तुमने जिस मकान को घर का रूप दिया, जिसे एक मजबूत नींव पर खड़ा किया, उसकी एक ईंट हटते ही तुम भी उनके लिए गैर जरूरी हो गई। कितनी आसानी से उन्होंने तुम्हारे अस्तित्व को ही नकार दिया"

"इतने सालों से तुम सबका बोझ ढो रही थी, आज तुम उनके लिए बोझ बन गई हो। क्या त्याग और खुद की निजता को राख कर देने की ऐसी सजा मिलती है" नारायणी के आंसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे। मणी के जले हुए हाथ को देख उनकी ममता सिसक रही थी। उनकी इतनी काबिल और शालीन बेटी के साथ आखिर ऐसा क्यों हुआ"…

"आप क्यों परेशान हो रही हैं मां। मैंने जो भी किया अपना फर्ज समझकर किया और उन्होंने जो किया उसके लिए, उन्हें क्यों दोष देना। इंसान की मजबूरी उससे न जाने क्या-क्या करवा लेती है। यह हमारे समाज की आज की विसंगति है, जिसकी वजह से परिवार तेजी से बिखर रहे हैं।

धन-संपत्ति के लिए तो हमेशा से रिश्ते दरकते आए हैं। मुझे किसी से भी कोई शिकायत नहीं है, बस उन लोगों से मैंने जो प्यार का नाता जोड़ा, उसके टूट जाने का दर्द अवश्य है" मणी की पीड़ा उसकी आंखों से झलक उठी। छह महीने ही तो हुए हैं, अभी अनुभव को गए, उसके जाने के दुख को अभी समेट भी नहीं पाई कि उसे उसके घर की ढेरी से चले जाने का हुक्म सुना दिया गया।

बाएं हाथ में चीसें सी चलती महसूस हुईं, तो उस पर ढके आंचल को सरकाते हुए वह हाथ पर मलहम लगाने लगी। वह तो कभी सोच भी नहीं सकती थी, जिस देवर को सदा उसने अपना बेटा माना, वही, उसे जलाकर मार देने की कोशिश कर सकता है। जिस ननद को बेटी का प्यार दिया, वही, उसे आग में झुलसाने के लिए अपने भाई का साथ दे सकती है। और उसकी सास, जिन्होंने उसे हमेशा बेटी माना और जिसकी सेवा करने में मणी ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी, वह उसे पनौती मान घर से निकालने के लिए कमर कस सकती है। क्यों चले गए अनुभव तुम…तुम्हारे जाने से रिश्तों के सारे मायने ही बदल गए।

"जब भाई ही नहीं रहा, तो भाभी इस घर में रहकर क्या करेंगी" अनुराग के ये शब्द उसे छलनी कर गए। बड़ी आशा से उसने अपनी सास की ओर देखा, पर उनकी आंखों में हमेशा उसके लिए बसी रहने वाली ममता जैसे बेटे को खोते ही कहीं गायब हो गई थी।

"सही तो कह रहा है। मेरा बेटा चला गया, फिर तू निपूती, मेरे बेटे का वंश ही खत्म कर दिया तुमने। पनौती बन गई हो, दिन-रात जिस बहू के उसकी सास गुनगाते नहीं थकती थीं, वह ऐसा कह रही थीं। दूसरा बेटा कहीं रुठ न जाए, यही विवशता रही होगी, उनके अंदर"। धूप कमरे में झांकने लगी तो उसने परदे हटा दिए। एक तपिश उसे सहला गई, लगा अनुभव का स्पर्श उसके मन और शरीर के घाव को सहला रहा है। कितना प्यार करता था वह उसे, एक एक्सीडेंट हुआ और सब खत्म हो गया। अनुभव का एहसास ही उसे रोमांचित कर गया। मणी बीते दिनों की सुखद यादों की परतें खोलने लगी।दस साल पहले उसकी और अनुभव की अरेंज मैरिज हुई थी। वह हमेशा अरेंज मैरिज को लेकर आशंकित रहती थी, पर अनुभव के साथ और विश्वास ने मानो उसकी जिंदगी में असंख्य चटक रंग भर दिए थे। वह नौकरी भी करती थी और घर भी बखूबी संभालना जानती थी, इसलिए उसे लगता था कि शादी के बाद कहीं उसके पर कतर न जाएं। पर अनुभव ने पग-पग पर उसे नए माहौल में एडजस्ट करने में मदद की। देवर, ननद छोटे थे, सास से अकेले घर नहीं संभल रहा था, अनुभव ने कहा कि कुछ समय के लिए वह नौकरी छोड़ दे। उसके भाई-बहन लायक बन जाएं तब वह जो चाहे कर सकती है, उसके प्यार में झूलती मणी ने वैसा ही किया। मां ने टोका भी था उसे इस बात के लिए कि नौकरी करते हुए भी घर संभाला जा सकता है, अपनी पढ़ाई को यूं व्यर्थ न करे, लेकिन तब अनुभव के प्यार के रंग में रंगी मणी ने ही कहा था, “मां, मेरी पहचान अब अनुभव से है और मैं उनके विरुद्ध नहीं जा सकती। कुछ सालों की तो बात है और फिर पढ़ाई कहां कभी बेकार जाती है।”

अनुराग और अनुभूति को कामयाब बनाने का जिम्मा उसने अपने हाथ में ले लिया। सास को आराम करने के लिए कहा और खुद को उस घर में झोंक दिया, अनुभव के लिए वह कुछ भी कर सकती थी, इसलिए कभी न तो अपने कैरियर को दांव पर लगाने का अफसोस हुआ और न ही अपनी पढ़ाई-लिखाई को व्यर्थ कर देने का पछतावा।

अनुभव भी मां और अपने भाई-बहन पर जान छिड़कते थे। घर की जिम्मेदारियों में वह ऐसी उलझी कि यह भी नहीं सोचा कि आखिर वह मां क्यों नहीं बन पा रही है। अनुभव कहते, “कोई नहीं, हमारे दो बच्चे तो पहले से ही हैं। बस उनकी परवरिश अच्छे से हो जाए तो, सोच लेंगे अपने बच्चे के बारे में’’ देवर-ननद की परवरिश भी अच्छे से हो गई और वे काबिल भी बन गए, बस वही दोनों संतान सुख से वंचित रह गए। मणि फिर कहां कुछ सोच पाई। बस उसे एक ही धुन लग गई थी कि अनुभव को एक परफेक्ट पत्नी, बहु और भाभी-मां बनना है। उसे ये भूमिकाएं निभाने में मजा आने लगा है।

अनुभव भी तो जब तक जीवित थे, मेहनत ही करते रहे। बहन की शादी धूमधाम से हो, हमेशा यही चाहते थे। जाने से एक महीने पहले यह काम भी वह कर गए थे। अनुभव के बाद जब अनुराग ने घर की बागडोर संभाल ली तो मणि ने सोचा कि अब वह आराम कर पाएगी, कुछ अपने बारे में सोच पाएगी, एकदम खाली-सी हो गई थी वह। लेकिन उससे पहले ही अनुराग ने अपना फैसला सुना दिया था।

“भइया नहीं रहे, तो आप यहां रहकर क्या करेंगी” आपको प्रॉपर्टी में हिस्सा देने का तो सवाल ही नहीं होता। घर में सारा दिन बैठी रहती हो, नौकरी कर रही होतीं तो कम से कम अपना खर्च तो उठा लेतीं। “मैं आपको खर्चा नहीं उठा पाऊंगा” “ मुझे भी अपना घर बसाना है” अनुराग ने कहा।

“वैसे भी जब आप इस घर को एक चिराग न दे सकीं तो आपकी वेल्यू ही क्या है” अनुभूति के शब्द किसी थप्पड़ की तरह उसके गाल पर लगे थे।जब उसने मणी ने घर छोड़कर जाने से मना कर दिया, तो उन दोनों ने उसे जलाने की कोशिश की, पर शायद सास के अंदर की मां अभी जीवित थी, जैसे उनकी सेवा कर जो पुण्य कमाए थे, वही उसके काम आ गए। उन्होंने उसे बचा लिया, बस हाथ जल गया था। दिल और हाथ पर फफोले लिए वह मां के पास आ गई थी, चाहती तो अपने हक के लिए कोर्ट में जा सकती थी, पर जब मन पर ही अलगाव और कटुता के मोटे-मोटे ताले पड़ गए हों, तो अदालत के दरवाजे खटखटाने का क्या फायदा था।

कितना समझाया था तुझे। समय रहते खुद की पहचान को खोने न देती तो, आज यह स्थिति न आती। उन्होंने तो तेरा हाथ ही जलाया है, पर तूने तो उनके लिए अपनी निजता को ही राख कर दिया, नारायणी फिर से रोने लगी थीं।

मां, आपकी बेटी कमजोर नहीं है। सच है कि मेरी निजता राख हो गई है, पर मां यह मत भूलो कि अपनी राख से ही फिनिक्स पक्षी दुबारा जन्म लेता है। मैं हार नहीं मानूंगी। उसने कहीं पढ़ा था फिनिक्स नाम का पक्षी जब मरने वाला होता है, तो गाने लगता है। उसकी आवाज़ से उसके शरीर से आग पैदा होती है और वह उसी में जल जाता है। जल कर राख हो जाता है, फिर उस राख पर जब बारिश पड़ती है, तो एक अंडा बन जाता है। जिसमें से कुछ समय बाद एक और फिनिक्स निकलता है। ऐसे ही उसका जीवन चक्र चलता रहता है, वह मरने के बाद भी जीवित हो जाता है।।

उसे लगा वह भी कुछ समय के लिए फिनिक्स ही बन गई थी, लेकिन जलने के बाद फिर से वह भी जीएगी फिनिक्स की तरह। वैसे भी अनुभव का प्यार व विश्वास सदा उसके साथ रहेगा। मां समझ लो, राख होने के बाद मेरा दूसरा जन्म हुआ है। मैं फिर से एक नई राह तलाशूंगी।

अभी अंत कहां हुआ है, बस विराम आ गया था और विराम का अंतराल थोड़े समय के लिए ही होता है… शाम गहरा गई थी। अचानक तेज बारिश होने लगी। वह बाहर बरामदे में भागी। उसे भीगना था, ताकि फिनिक्स फिर से जी उठे।

-सुमन बाजपेयी

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