उस रात का जादू:संयम ने पहली बार सानवी का यह रूप देखा, उसे यकीन नहीं हो रहा था कि ये वही लड़की है

2 महीने पहले
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संयम और सानवी दोनों रसोई में थे। सानवी के हाथ रसोई से निकलने की जल्दी में फटाफट चल रहे थे और संयम के निर्देश स्पीड-ब्रेकर की तरह उनका रास्ता रोक रहे थे, “अदरक के गुलाबी होने के बाद लहसुन डालना।”

“न! न! हरी मिर्च हमेशा लंबी काटकर डालनी चाहिए।” रसोई में संयम के निर्देशों से सानवी के चेहरे पर कुछ वैसी ही कोफ्त बिखर जाती थी जैसे बहुत से स्पीड ब्रेकर के ऊपर से कार ड्राइव करते समय मन में बिखरती है। लेकिन वो चुप रह जाती थी।

अरेंज-मैरिज थी उसकी और शादी के सिर्फ छह महीने हुए थे। संयम की टोका-टोकी पर सानवी लड़ने चलती तो उसे याद आ जाता बाबूजी का गुस्सा और खाने में होने वाली कमियों पर उनका मूड ऑफ करके थाली सरकाकर सोने चले जाना। हालांकि वो बदलती दुनिया से वाकिफ और नए जमाने के रंग-ढंग से परिचित थी।

उसके भीतर की बेबाक आधुनिक महिला संयम की हर समय की टोका-टोकी पर गुस्से से उबलती, पर जाने क्यों वह संयम में अपने गुस्सैल बाबूजी की छवि देखने लगती और अधिकार पूर्वक उससे लड़ नहीं पाती थी।

इस समय उसके दिमाग में अपने नए प्रोजेक्ट का रफ स्केच बन रहा था और हाथ कचौरियां बेल रहे थे। तभी कचौरी तेल में डालने से पहले ही संयम ने उसका हाथ पकड़ लिया, “अरे! क्या कर रही हो? कच्चे तेल में कचौरी फूलेगी नहीं।”

सानवी ने गैस तेज कर दी तो संयम फिर बोल उठा, “अब इतनी तेज क्यों कर दी? इसमें डालते ही कचौरी जल जाएंगी।”

अब सानवी का पारा भी चढ़ गया। वह मन ही मन बुदबुदाने लगी, ‘दुनिया कहां से कहां पहुंच गई, पर ये मर्द! सारे के सारे पापा, चाचाओं की तरह… नहीं अब वो और नहीं सहेगी। वो भी बराबर की पढ़ी-लिखी और जॉब करती है।’

तभी संयम बोल उठा, “अगर तुम्हारा मन खाना बनाने में नहीं लग रहा है तो...”

“तो..?” सानवी ने आंखें तरेरीं और इस छोटे से शब्द में अपना पूरा गुस्सा और ‘तो क्या कर लोगे?’ की चुनौती उड़ेल दी।

“तो तुम छोड़ दो, मैं खुद बना लूंगा। तुम जाकर अपना प्रोजेक्ट ही पूरा कर लो, जो तुम्हारे दिमाग में चल रहा है।”

सानवी को झटका सा लगा। मन ही मन हंसी सी भी आई। वो संयम के भाव ठीक से पढ़ने के लिए उसका चेहरे देखने लगी।

“चिंता न करो, किचन जितना फैलाउंगा, उतना समेट भी दूंगा।” संयम के शब्द यही थे, पर अर्थ था कि तुम यहां से जाओ तो।

वह किचन से निकल गई। पर बेडरूम में आकर प्रोजेक्ट बनाने का मूड उखड़ चुका था। वो संयम को समझ नहीं पा रही थी, पर समझना चाहती थी।

कितना अजीब रिश्ता है। सुना था कि पति-पत्नी शादी के शुरुआती महीनों में प्रेमी-प्रेमिका होते हैं, पर यहां तो कुकिंग क्लासेस से ही फुरसत नहीं। यहां तक कि शरीर का मिलन भी कभी रोमांटिक नहीं रहा। बस जैसे अपने कल के प्रोग्रामों में उलझे दोनों काम खत्म करके सो जाते। हनीमून पर भी नहीं जा सके, क्योंकि कभी संयम को छुट्टी नहीं मिली, तो कभी उसे। बेखयाली में मोबाइल स्क्रोल करते उसका मनपसंद मेकअप ट्यूटोरियल का वीडियो खुल गया और बस मूड बन गया...

उधर संयम के मन में भी उहापोह थी। वो कई बार मन में सानवी से रसोई का जिम्मा अपने ऊपर लेने का अनुरोध करने की सोच चुका था, पर उसे मम्मी की बातें याद आ जातीं। खाना बनाने का बचपन से ही बड़ा शौक था उसे। वो तो शेफ बनना चाहता था, पर मम्मी उसे किचन में आने न देतीं। उन्हें अपने किचन के जरा सा भी गंदा होने या बर्तन इधर से उधर हो जाने पर बड़ी गुस्सा आती।

मम्मी के ही व्यवहार के कारण उसकी एक बार भी सानवी के साथ छेड़छाड़ करने की हिम्मत नहीं पड़ी। मम्मी का पापा के करीब आने पर उन्हें अशोभनीय कहकर झटक देना याद आ जाता। उन्हीं की तरह सानवी भी हमेशा कैजुअल लुक में रहती और जल्दी से खाना बनाकर रसोई समेट देना पसंद करती।

वो सानवी में अपनी नीरस और अनुशासनप्रिय मम्मी की छवि देखता और मायूस हो जाता। ‘क्या रिश्ता है! हम कभी प्रेमी-प्रेमिका बनेंगे भी या नहीं?’ उसने आह भरी।

उधर सानवी ने अपनी सबसे सेक्सी नाइटी निकाली और अपने मनपसंद वीडियो ट्यूटोरियल से मेकअप करने लगी। अगर संयम का मूड खराब होगा तो उसे इस रूप में देखकर ठीक हो ही जाएगा। उधर संयम को भी डर था कि उसने सानवी के हाथ से उसकी रसोई छीनी है।

संयम ने खाना बनाकर टेबल बड़ी सुंदर सजा दी। अगर सानवी का मूड खराब होगा तो उसके बनाए खाने का स्वाद और सजावट उसे ठीक कर ही देगी। उसने कुछ मोमबत्तियां लगाकर लाइट बंद कर दी।

वह बेडरूम में सानवी को बुलाने गया तो उसे देखकर अवाक्‌ रह गया।

“तुम इससे पहले कभी ऐसे तैयार नहीं हुईं।” संयम सम्मोहित सा बोला।

“तुम्हारे कुकिंग ट्यूटोरियल से फुरसत ही नहीं मिली।” सानवी के चेहरे पर खुशी और आवाज में नकली नाराजगी थी।

“अगर मुझे पता होता कि इतना स्वादिष्ट खाना मेरा इस तरह इंतजार करेगा तो कौन बेवकूफ कुकिंग की ट्यूशंस में उलझता?” कहते हुए संयम ने उंगलियों से सानवी की ठोढ़ी पकड़ अपने अंगूठे उसके सुर्ख लाल होंठों पर फेर दिए।

सानवी के गाल आरक्त हो गए। उसे लगा जैसे संयम ने पहली बार उसे छुआ हो। “और मुझे क्या मालूम कि तुम्हें ये खाना भी अच्छा लगता है?” वो इठलाई।

उसकी सहमति देखकर संयम आगे बढ़ा और उसके होंठ अपने होंठों में ले लिए। कुछ देर दोनों एक-दूसरे में डूबे रहे, फिर सानवी की नजर कैंडल लाइट से सजी डिनर टेबल पर पड़ी।

वो चहक उठी, “कैंडल्स बुझने से पहले तुम्हारे हाथ का स्वाद भी चख लिया जाए,” सानवी ने प्यार से कहा तो संयम ‘अभी आता हूं’ कहकर दूसरे कमरे में चला गया।

खाना खाते हुए सानवी ने संयम की तारीफ की तो वो खिल उठा, “है न मेरे हाथ में जादू?”

दोनों बतिया ही रहे थे कि डोरबेल बजी। सयंम ने दरवाजा खोला और कुरियर लेकर बंद कर दिया। सानवी के प्रश्न करने पर कि इतनी रात को क्या मंगाया है, वह बोला, “बेडरूम में चलो बताता हूं।”

संयम ने पैकेट खोला और गुलाब की पंखुड़ियां बिस्तर पर फैलाते हुए बोला, “हम बिन मतलब अपने पूर्वाग्रहों के कारण एक-दूसरे को गलत समझते रहे। आज शायद पहली बार हमारे शरीर और मन एक साथ मिलेंगे। आज हमारी असली सुहागरात है। डेकोरेशन तो बनता है।” फिर तो चुंबनों की फुहार में नहाते आलिंगनबद्ध युगल को देखकर चांद भी शरमाकर बादलों में छिप गया।

- भावना प्रकाश

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