बॉस की गर्लफ्रेंड:ऑफिस में पहले ही दिन राघव को देखकर शीना इस कदर डर गई कि चेहरे से पसीना टपकने लगा

2 महीने पहले
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राघव अपनी रेवॉल्विंग चेयर पर पीछे की ओर मुंह किए मिनी प्रोजेक्टर पर शीना का प्रोजेक्ट देख रहा था। तभी शीना कमरे में दाखिल हुई। “आप पूरे बारह मिनट लेट आई हैं,” सख्त स्वर में कहते हुए वो पलटा तो उसकी नजर शीना पर पड़ी।

गेहुंआ रंग, खुद अपने भीतरी गौरव से ही चमकता पूरी तरह से नो मेकअप चेहरा, एक प्यारी सी पोनी में बंधे सादगी की पहचान कराते लंबे घने बाल, बच्चों सी निश्छलता और कौतुहल भरी बड़ी-बड़ी आंखें। आंखों में थोड़ा सा सहमे होने और थोड़ी सी नाराजगी के विपरीत भाव। माथे पर उभर आई पसीने की दो बूंदें उसकी खूबसूरती को बिल्कुल वैसे ही बढ़ा रही थीं जैसे किसी गुलाब पर गिरी ओस की बूंदें।

न चाहते हुए भी राघव के चेहरे से नाराजगी बिल्कुल गायब हो गई। उसने शीना को बैठने का इशारा किया।

कुछ ट्रैफिक की गफलतें थीं और कुछ इमिडिएट बॉस और उनके ऊपर वाले बॉस ने टॉप बॉस की समय की प्रतिबद्धता को लेकर इतना डरा दिया था कि शीना जैसी बोल्ड और बिंदास लड़की भी थोड़ा घबरा गई थी। थी तो वो इस कंपनी में सिर्फ दो हफ्ते पहले आई अप्रेंटिस ही। तो क्या हुआ कि उसका आइडिया इतना पसंद किया गया कि उसकी टॉप बॉस के साथ मीटिंग फिक्स हो गई थी।

बॉस को खुश करने के तीन-तिकड़म न उसने सीखे थे, न सीखना चाहती थी। उसके प्राकृतिक स्वभाव के अनुसार उसका सच्चा दर्द जुबां पर आ गया, वो भी बिना किसी औपचारिकता में लिपटे आर्टिफीशियल आदर के, “सर, मैं घर से तो मार्जिन लेकर चलती हूं, पर सड़कें तो चौड़ी नहीं कर सकती! न ही ट्रैफिक कम कर सकती हूं। जाम के कारण इतना समय खराब हो जाता है कि मैं खुद परेशान हूं। और आज तो...”

शीना के इस मासूम से दोस्ताना उत्तर पर राघव के होंठों पर ही नहीं, पूरे चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान फैल गई, तो शीना को एहसास हुआ कि वो टॉप-बॉस से बात कर रही है। वो संभल गई, “जी, मैं अपना प्रोजेक्ट समझाऊं?”

“वेरी गुड! परमीशन ग्रांटेड! गो अहेड! और हां, इस आइडिया के इम्प्लीमेंटेशन के लिए हेड तुम ही रहोगी। तुम चार लोगों को अपनी टीम में चुन सकती हो। लेकिन डेडलाइन में कोई समझौता नहीं होगा। मंज़ूर?” कहते हुए राघव ने बधाई की मुद्रा में हाथ मिलाने के लिए आगे कर दिया।

“सच? थैंक यू सर! थैंक्स अ लॉट!” शीना खुशी से उछल पड़ी। उत्साह में उसने राघव से हाथ मिलाने के लिए जल्दी में हाथ आगे बढ़ाया तो उसका हाथ मेज पर रखे पानी के गिलास से टकराया और सारा पानी राघव के ऊपर गिर गया।

शीना फिर हड़बड़ा गई, “ओह! सॉरी सर...” कहते हुए घबराहट में उसने अपने दुपट्टे से राघव का कोट पोछना शुरू कर दिया।

अब राघव की मुस्कान हंसी में बदल गई, “इट्स ओके!”

“ये क्या साहब, खाना नहीं खाया आपने? न आप टीवी देख रहे हैं, न मोबाइल, फिर मुस्कुरा क्यों रहे हैं?” नौकर ने पूछा तो राघव की तंद्रा भंग हुई।

“अरे, यूं ही काका, याद ही नहीं रहा।”

“खाना खाना याद नहीं रहा? कौन है वो मेमसाहब?” अनुभवी और मुंह लगे नौकर ने तुरंत प्रश्न दागा।

“कौन मेमसाहब? किसकी बात कर रहे हैं?” राघव ने जैसे चोरी छिपाई।

“अरे साहब, इश्क और मुश्क छिपाए से कहां छिपते हैं।” काका कहकर निकल गए, पर राघव और बेचैन हो गया।

क्या इसी को फर्स्ट साइट लव कहते हैं? ऑफिस में शीना के कमरे से जाने के बाद से ही जैसे किसी फिल्म का एक ही दृश्य लगातार राघव के दिल-दिमाग पर छाया रहा। ताजे खिले गुलाब जैसा शीना का चेहरा... उस पर ओस सी पसीने की बूंदें और उसकी सरल-मासूम बातें...

“और पापा, उनकी मुस्कान बिल्कुल आप जैसी है। जैसे आप मेरे कोई सयानी बात कहने पर मुस्काते हो! शाबाशी ऐसी जैसे टीचर्स दिया करते हैं फर्स्ट आने वाले स्टूडेंट्स को… और पता है, उनका कीमती कोट मैंने खराब कर दिया, पर वो गुस्साने के बजाए हंसकर मुझे नॉर्मल करने में लग गए।”

जब मम्मी उसके कमरे में आई तो शीना सो चुकी थी। सोते में भी मुस्कुरा रही थी। “खत्म हो गया इसका बॉस पुराण?” मम्मी ने हंसकर उसके सिर पर हाथ फेरा तो पापा चौकें। “तुम्हें भी?”

“आपको कितनी बार बताया?”

“यही कोई तीन-चार बार”

“मुझे यही कोई पांच-छह बार।” दोनो हंस पड़े।

छह महीने बीत गए। शीना और राघव के एहसासों के मीठे स्पंदन के अंकुर फलती-फूलती बेल बन चुके थे। ऑफिस में होने वाली शॉर्ट एंड क्रिस्प मुलाकातें जैसे कोई वीडियो क्लिपिंग बन जातीं जो उनके मन के डिवाइस पर बाकी के समय चलती रहतीं। हर दिन गफलत में ऐसा कुछ जरूर होता कि दोनों उस पर घर में हंसते रहते।

एक दिन राघव के प्रमोशन के साथ दिल्ली से बेंगलुरु की ब्रांच में ट्रांसफर का ऑर्डर आ गया। दोनों की आंखों में उदासी की गहरी परत उतर आई। आखिर राघव के नौकर ने उसे हिम्मत दी और उसने शीना के घर की घंटी बजाई।

“हमारा धर्म, भाषा, प्रांत सब अलग है। उस पर मैं अपने माता-पिता को कम उम्र में ही खो चुका हूं। अब अनाथ हूं इसीलिए आप लोगों से बात करने में डर रहा था, लेकिन मैं बस एक बार आपसे कहना जरूरी समझता हूं कि मुझे आपकी बेटी को खुश देखकर एक अनोखा सुकून मिलता है। मैं उसे हमेशा खुश और महफूज रखना चाहता हूं।” राघव की बात पर पापा की आंखों में खुशी के आंसू आ गए, “मेरे लिए अपनी बेटी के चेहरे पर चमक और आंखों में खुशी से बड़ा कोई धर्म नहीं। रही अनाथ होने की बात, तो जब तुम हमारे हो जाओगे तो अनाथ नहीं रहोगे।”

शादी की धूम में गाना बज रहा था, ‘आज से मेरी सारी खुशियां तेरी हो गईं’ तभी ऑफिस का ग्रुप खिलखिलाया। “हम इस गाने को इनके लिए सही नहीं मानते” सौम्या बोली।

“इससे बेहतर और कौन सा गाना हो सकता है इनके लिए?” रायना बिल्कुल सहमत न थी।

“इस गाने की पंक्तियां थोड़ी बदल दी जानी चाहिएं।” सौम्या चुहल से मुस्काई, “मैंने पहले दिन ही बॉस के कमरे से निकलते इसका चेहरा देखकर बोला था न! तो गाने की पंक्तियां कुछ यूं बनेंगी,” कहते हुए सौम्या ने माइक अपने हाथों में ले लिया, “उस दिन से मेरी सारी खुशियां तेरी हो गईं, उस दिन से तेरा ट्रैफिक जाम का सिरदर्द मेरा हो गया...” सारा ऑफिस खिल खिलाकर हंस पड़ा।

- भावना प्रकाश

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