पति की प्रेमिका:जिस सेजल को अपना समझा उसने ही तारा के पति को छीना, लेकिन जब सुशांत से मिली तो जिंदगी बदल गई

3 महीने पहले
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तारा को अच्छी तरह याद है उन दिनों अक्तूबर का महीना था जब वो इस स्कूल में आई थी। पहाड़ों पर ठंड पड़ने लगी थी। पहाड़ यानी मसूरी। यहां के दिन भी छोटे हो रहे थे और धूप जो सड़क मैदान पर पसरी रहती, पलक झपकते ही पेड़ों की टहनियों पर जा बैठती थी।

मसूरी का वो कॉन्वेंट जहां उसकी सखी कनिका प्रिंसिपल थी। कनिका का सहारा ले कर ही वो इतनी दूर आई थी। उस समय उसे नौकरी की सख्त जरूरत थी। अमीश और सेजल के रहमोकरम पर वो नहीं रहना चाहती थी। उसे अपना स्वाभिमान प्यारा था ।

कितना समय हुआ। तारा ने विवाह किया था। प्रेम विवाह। प्रेम के लिए उसने अपना घर परिवार छोड़ा। मां-बाबू जी, बहन सभी से रिश्ता तोड़ लिया। घर और समाज के विरुद्ध जा कर उसने विवाह किया। घर पर सबको कैसे समझाती? अनीश का जिक्र छेड़ते ही सबसे पहले जाति का हंगामा मचता। फिर उसके घर परिवार का स्तर, फिर नौकरी। उन दिनों अनीश की कोई बहुत अच्छी नौकरी भी तो नहीं थी।

तब अनीश ने ही प्रस्ताव रखा, “हम दोनों कहीं भाग चलें और ब्याह कर लें तो कैसा रहे?” लेकिन भागने की नौबत नहीं आई। अनीश के परिवार ने उसे स्वीकार कर लिया और तारा के परिवार ने चुपचाप उसे छोड़ दिया।

तारा को उस समय ये इतनी बड़ी बात नहीं लगी थी। अनीश का प्यार मां-बाप के प्यार के आगे जीत गया। सुख-चैन से दिन कट रहे थे। लेकिन जिंदगी जब करवट लेती है तब कुछ बातें अनचाहे ही हो जाती हैं। डूबते को तिनके का सहारा लेना ही पड़ता है। वरना उपाय ही क्या है? तारा ने भी तो कनिका का सहारा लिया।

तारा प्रेग्नेंट हुई और उसे डॉक्टर ने बेड रेस्ट बता दिया। ससुराल में बूढ़ी बुज़ुर्ग सास के बस का नहीं था तारा की घर-गृहस्थी संभालना। उन्हीं दिनों उनके पड़ोस में सेजल सान्याल रहने आई। उसी ने तारा का साथ दिया। स्मार्ट, युवा, खूबसूरत और बिंदास सेजल। दीदी कहती थी तारा को। वो अल्हड़, मस्त, खिलंदड़ लड़की अपनी हंसी और बातों से घर गुलजार किए रहती थी।

तारा के साथ-साथ अनीश की भी खूब देखभाल करी थी सेजल ने। कहीं कोई कसर नहीं छोड़ी। लेकिन छठे महीने ही तारा का गर्भपात हो गया। तन मन से टूट गई थी तारा। आंसू बस आंसू। सेजल उसकी देखभाल के लिए उनके फ्लैट में ही रहने आ गई। उस दौरान भोली तारा नहीं समझ सकी कि सेजल आहिस्ता-आहिस्ता उसके घर परिवार पर ही डाका डाल रही थी।

उस रात अगर अनायास उसकी नींद नहीं टूट जाती तो उसे कुछ भी पता नहीं चलता। उसने देखा कि उसकी बगल में लेटा अनीश बिस्तर पर नहीं था। उसे लगा कि शायद वो बाथरूम गया होगा, लेकिन जब काफी देर तक वो नहीं लौटा तो तारा आहिस्ता से उठी। सेजल के कमरे का दरवाजा भिड़ा हुआ था। झिर्री से उसने झांका और उसका मानो खून जम गया।

उसने देखा सेजल के हाथ अनीश की पीठ पर बंधे थे और अनीश का चेहरा सेजल के अधरों पर झुका हुआ था। दोनों सुधबुध खोए एक दूसरे के बेहद करीब, मानो उनके शरीर ही नहीं ह्रदय भी जुड़े हुए हैं।

दरवाजे पर आहट सुन कर दोनों चौंक कर एक दूसरे से मुक्त हुए और तारा शर्म और ग्लानि के दलदल में धंसती चली गई। वो समझ गई कि उसका गोरा उजला रूप-रंग सांवली सेजल के आगे हार गया है। और पुरुष को क्या मात्र स्त्री का रूप ही बांधता है? घोर सांवली सेजल के पास थी अजंता की यक्षिणी मूरत जैसी लचीली, गठीली देहयष्टि।

अगले दिन से तारा ने स्वयं ही अपने अधिकार छोड़ने शुरू कर दिए। वो समझ चुकी थी कि अनीश अब उसका नहीं रहा। सेजल से क्या शिकायत करती? जब अपना ही सिक्का खोटा हो गया।

सेजल ने तारा के छोड़े हुए अधिकारों को बेशर्मी से बटोरना शुरू कर दिया। लेकिन आने वाली हर रात जब वो पूरे अधिकार से अनीश को अपने कमरे में ले जा कर सिटकनी बंद करती तब तारा रात भर अपने आंसुओं से लड़ती। तारा अपने ही घर में बेघर होती चली गई।

फिर एक दिन बिना किसी से कुछ कहे तारा ने चुपचाप अनीश का घर छोड़ दिया। अनीश के लिए एक व्हाट्सएप मैसेज किया था उसने, “तुम कभी मुझे याद करोगे तो बस एक बार फोन करना। मेरा ये फोन नंबर तुम्हारे इंतजार में हमेशा सुरक्षित रहेगा।” लंबा समय बीत गया इंतजार करते, लेकिन कभी कोई फोन नहीं आया।

कनिका के आश्वासन की डोर थामे तारा पहाड़ों के इस कॉन्वेंट में आ गई थी। उन दिनों उसे अपने जीवन में अंधेरा ही अंधेरा दिखाई देता था। उसने अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़ कर अनीश से ब्याह किया था। इस मनःस्थिति और बिना किसी आर्थिक संबल के नए सिरे से पढ़ाई भी कैसे करती? कनिका ने उसे न केवल रहने के लिए स्कूल के कैंपस में क्वार्टर दिलाया, बल्कि स्कूल में ही बोर्डिंग के छोटे बच्चों की देखभाल के लिए उसे नियुक्ति भी दे दी।

वो सर्दी का एक बेहद खुशनुमा दिन था। आज कनिका, तारा के साथ उसके क्वार्टर पर थी। वो उसके लिए एक रिश्ता ले कर आई थी। सुशांत, कनिका का चचेरा भाई था- इंडियन आर्मी में मेजर। सुशांत की पत्नी ने उसका साथ उस समय छोड़ा जब वो पुंछ में देश के लिए आतंकवादियों से लड़ रहा था। एक भयानक धोखा झेला था सुशांत ने। शायद ‘अचानक’ मूवी के जैसा ही कुछ कुछ। लेकिन ये सच तो सच में सच था।

सुशांत के मित्र और उसकी अपनी पत्नी मेनका का संबंध झूठा नहीं था। जिस मित्र को पत्नी का ख्याल रखने को कह गया था, उसी मित्र से उसकी पत्नी का तन मन जुड़ गया। उसके वापस आने पर मेनका ने स्वयं ही कह दिया था कि अब वो सुशांत के साथ नहीं रहेगी। ये एक तमाचा था सुशांत के मुंह पर। भीतर से टूटा हुआ सुशांत बहुत दिनों तक अटकता भटकता मन में रोता रहा।

कुछ बरसों के बाद तारा मिली थी- कनिका के ही घर पर। बहुत अपनी सी लगी थी तारा उसको। फिर एक औपचारिक दूरी के साथ वे लोग कई बार मिले। तारा जान रही थी कि सुशांत उसे पसंद करता है, लेकिन अनीश को कैसे भुला दे तारा? अनीश के लिए कितने व्रत-उपवास किये थे उसने। ब्याह से पहले भी और बाद में भी। लेकिन कोई व्रत-उपवास अनीश को नहीं बांध पाया।

ये भी सच है कि तारा जब-जब भी सुशांत से मिली उसने महसूस किया जैसे एक अदृश्य आकर्षण की डोर उसे सुशांत तक खींचे लिए जा रही है। सुशांत के लिए उसके मन में एक कोमल भावना जग रही थी जिसे वो स्वीकार करने से डरती थी।

कनिका जब उसके घर आई तब कुछ देर पहले ही बर्फ गिरी थी। ठंड काफी बढ़ गई थी। तारा उठ कर खिड़की खोलने लगी तो कनिका ने उसे टोका, “काफी ठंड है, खिड़की मत खोलो। वैसे भी मुझे सर्दी-जुकाम हुआ है।’’

उसके मना करने पर तारा ने अपना हाथ सिटकनी से हटा लिया और कांच के पार बर्फ से ढकी पहाड़ियों को देखते हुए बोली, “तुझे पता है कनु, मेरे मन के भीतर की उमस मेरे तन को भी व्याकुल करती है, इसीलिए शीतलता ढूंढती हूं मैं।’’

पहाड़ियों पर बर्फ और धूप की छायाकृतियों का सिलसिला ऊपर दूर तक चला गया था। देवदार के वृक्ष भी बर्फ से ढके थे। कहीं से बार बार किसी पंछी का स्वर सुनाई दे रहा था। कनिका ने महसूस किया कि तारा खिड़की के पार देखती हुई कुछ बेचैन थी मानो कुछ कह देने की छटपटाहट।

“कितना प्यारा मौसम है, कनु। लेकिन जानती है मेरे भीतर मौसम की सारी अनुभूतियां मर चुकी हैं और ये भी तो एक तरह से मेरी भावनात्मक मौत हुई न?’’ तारा जैसे स्वयं से कह रही थी।

“तारा, छोड़ इन बातों को। अतीत को भूल, वर्तमान में जीना सीख। सुशांत को अपना कर तो देख। तू बहुत खुश रहेगी उसके साथ।’’

“मैं कितना भी चाहूं अपने अतीत को नहीं भुला सकती। हर पल मेरे मन के भीतर कोई न कोई अतीत दंश देता रहता है। लेकिन तब भी यही मन है जो कहता है कि वर्तमान सत्य है, उसे नष्ट मत करो।’’

“तू दार्शनिक नहीं, प्रैक्टिकल बनना सीख, वरना जीना मुश्किल हो जाएगा,’’ कनिका धीरे से हंसी। तारा ने एक ठहरी हुई दृष्टि से उसे देखा। कनिका का हितैषी भाव वो समझ रही थी।

कनिका दुलार भरे स्वर में कह रही थी, “मेरा विश्वास कर तारा, तू सुखी रहेगी उसके साथ। उम्र की ढलान पर हमेशा एक साथी की जरूरत महसूस होती है। और एक चोट खाया हुआ आहत इंसान तेरा दुख समझ सकता है। सुशांत एक सच्चा और अच्छा इंसान है। तू आज मिल ले उससे। मैरियट होटल में अपने और तेरे लिए एक टेबल बुक करवा रखी है उसने।’’

अंततः तारा मान गई। आज की शाम के लिए अरसे बाद उसने जरी बॉर्डर की रोज पिंक साड़ी बांधी। अपने लंबे बालों का रखरखाव उसने हमेशा ही किया था। कमर तक लहराते घने बाल जिनको उसने ऐसे ही खुला रहने दिया। संध्या के अधूरे अंधेरे में भी कनपटी के इक्का-दुक्का सफेद बाल झलक गए। अधरों पर हल्की गुलाबी लिपस्टिक और माथे पर नन्ही सी काली बिंदी लगी तो चेहरा दमक उठा। पुरानी तारा स्वयं में आज नई तारा को खोज रही थी। परिपक्वता का भी अपना एक अलग आकर्षण होता है।

तारा होटल पहुंची तो सुशांत उसकी प्रतीक्षा में बाहर ही खड़ा था। आगे बढ़ते हुए उसने सुशांत का बढ़ा हुआ हाथ थाम लिया। होटल के रेस्टोरेन्ट में वे दोनों साथ ही अंदर गए। अंदर जा कर तारा ने देखा, सभी मेजें भरी हुई थीं। उनकी टेबल बिल्कुल एकांत कोने में थी। रेस्टोरेन्ट रंगबिरंगी रोशनियों से नहाया हुआ था। पूरे वातावरण में एक मोहक गंध फैली हुई थी। एक गहमागहमी थी।

सुशांत ने तारा को गहरी निगाह से देखा तो तारा सकुचा उठी। कुर्सी पर बैठते हुए बोल पड़ी, “मैं आने वाली नहीं थी। सिर्फ आपके लिए आई हूं।’’

“तुम बहुत प्यारी लग रही हो तारा, बहुत सुंदर।’’ उसने तारा के हाथ पर अपना हाथ रख दिया। तारा ने आंखें झुका लीं। उसका चेहरा आरक्त हो उठा। एकाएक उसे सुशांत बहुत अपना लगने लगा। तभी ऑर्डर लेने वेटर आ गया। तारा मेन्यु कार्ड देख ही रही थी कि वेटर ने कहा, “सर-मैम, आज के दिन होटल में ‘कपल्स नाइट’ मनाई जाती है। यहां आज इसीलिए नए-नए जोड़े इकठ्ठा हो रहे हैं। काफी अच्छा प्रोग्राम है। आप लोग भी शामिल होंगे न?’’

तारा और सुशांत ने एक साथ वेटर की आंखों में झलकते सतरंगी अर्थ को टटोलने का यत्न किया। उन दोनों के मन में भी एक जैसा कोई भाव घुलने लगा था। सहसा ही रेस्टोरेन्ट के दरवाजे की तरफ देखती तारा ने स्वयं ही सुशांत की बांह थाम ली जैसे एक सहारा ढूंढ रही हो। सुशांत ने उसके चेहरे का असंयत भाव देखा और उसे कंधे से पकड़ कर अपनी बांहों में भर लिया। उस क्षण तारा उसे एक नन्ही असुरक्षित बच्ची जैसी लगी।

“क्या हुआ, तारा?’’

“सामने उस जोड़े को देख रहे हैं,’’ उसका स्वर थरथरा रहा था, डूब रहा था।

“देख रहा हूं,’’ सुशांत ने देखा- एक पुरुष के साथ सितारों जड़ी नीली साड़ी में लिपटी एक औरत।

“इसमें एब्नार्मल क्या है?’’

तारा ने होंठों को भींचते हुए कहा, “ये औरत सेजल है और उसके साथ मेरा पति अनीश।’’ वो एक शिलाखंड की तरह जड़वत हो गई। सुशांत उसकी मनःस्थिति समझ रहा था।

“तुम्हें अनीश और सेजल को ले कर इतना भावुक नहीं होना चाहिए, तारा। उन लोगों की अपनी अलग दुनिया है अब।’’ उसने तारा को एक आहत शिशु सरीखा संभाल लिया।

“सुशांत, संबंध टूट भले ही जाएं, लेकिन उनकी टूटन भीतर ही भीतर रिसती रहती है, पीड़ा देती रहती है,” तारा ने भीगे स्वर में कहा।

सुशांत कुछ पल तारा को अपलक देखता रहा। एक अर्थपूर्ण चुप्पी उनके बीच छाई रही। फिर तारा स्वतः ही खिंच कर उसकी बांहों में सिमट गई। वह हल्के-हल्के कांप रही थी। सुशांत ने झुक कर तारा के बालों पर मोहकता के साथ अपने अधरों का स्पर्श दिया, “इस पल से हमेशा मैं तुम्हारे पास हूं… बहुत पास।’’

तारा समझ गई कि अब सुशांत ही उसके जीवन का तुष्टिमय सत्य संबल है। उसके स्पर्श ने तारा को आश्वस्त कर दिया कि अब वो जीवन में अकेली नहीं है।

- आभा श्रीवास्तव

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