E-इश्क:उसका मन किया पहले की तरह उसके चेहरे को हाथों में भरकर चूम ले, कहां खत्म होती है प्यार की खुशबू

10 दिन पहले
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ट्रैफिक था, इसलिए कार की रफ्तार कम थी। वह रायपुर पहली बार आई थी, इसलिए ट्रैफिक की वजह से उसे कोफ्त नहीं हो रही थी। इस बहाने शहर की सड़कें और सड़क के दोनों तरफ बनी दुकानों के नाम देखने को मिल रहे थे। पता नहीं क्यों उसे बोर्ड पर लिखे दुकानों के नाम देखने में बहुत मजा आता था। कभी-कभी तो बहुत ही अतरंगी, अजीब नाम दिख जाते थे। उस याद है, इंदौर में एक जगह उसने पढ़ा था ‘ठडी-ठंडी जलेबियों की दुकान।’ वहां के लोकल गाइड से पूछा कि ऐसा अटपटा नाम क्यों है, तो वह हंसते हुए बोला था, “मैडम, नाम अटपटा न होता तो क्या आपकी नजर उस पर जाती? जलेबियां तो गरम-गरम ही मिलती हैं, लेकिन बोर्ड देखकर कौतूहल लोगों को वहां खींच ले जाता है।”

कार थोड़ा और सरकी तो बाईं तरफ की दुकान के बोर्ड को देख उसके होंठों पर मुस्कान आ गई। ‘चाय प्रेमियों का चार्जिंग पॉइंट।’ कितना दिलचस्प व इनोवेटिव नाम! जाहिर-सी बात थी कि यह ऐसा पॉइंट है जहां पर किस्म-किस्म की चाय मिलती होंगी। कार अब सरक भी नहीं रही थी। चाय…... कितनी ढेर सारी यादें जुड़ी हैं उसकी चाय की खूबसूरत पत्तियों और सुगंध के साथ। वह खुद बहुत चाय की शौकीन नहीं है, इसलिए उसकी चाय को लेकर दीवानगी देख उसे हमेशा हैरानी होती थी। चाय के व्यवसाय में हो तो समझ आता है कि जानकारी होती है गर्म प्याले में उड़ेले जाने वाली अनगिनत किस्मों की चाय की, पर एक आईटी क्षेत्र का व्यक्ति चाय के बारे में इतनी समझ रखता हो, यह सोच किसी को भी हैरानी हो सकती है।

‘‘पूरे के पूरे इंसाइक्लोपीडिया हो तुम। चाय पर थीसिस लिखने का इरादा तो नहीं है?’’

‘‘स्वाद और सुगंध का सही मेल हो तो एक कप चाय सारी थकान मिटा देती है। कितना मजा आता है जब एक-एक घूंट गले में उतरता है और हर घूंट जिंदगी में एक रवानगी भर देता है।’’ कहते हुए ऐसा लगता मानो सामने चाय का प्याला रखा है और उसकी सुगंध को अपने भीतर उतार रहा है। “तुम क्या जानो प्रोफेसर सुनयना साहिबा कि चाय के एक-एक घूंट की कीमत क्या होती है। तुम चाय पीती कहां हो, गटकती हो। न प्याले को प्यार से उंगलियों से पकड़ती हो, न उससे उठती भाप को महसूस करती हो, न ही उसके स्वाद और सुगंध को गले में उतारती हो।’’

‘‘मुझे डर है कि कहीं तुम कवि न बन जाओ।’’ वह उस छेड़ती तो वह गुनगुनाने लगता, ‘‘मैं कहीं कवि न बन जाऊं, तेरे प्यार में ऐ चाय!’’ उसकी जिद और चाय के लिए जुनून देख वह भी चाय के स्वाद को समझ उसे पीने लगी थी। ‘अपनी पसंद’ नाम से जब एक आउटलेट खुला था तो कितना एक्साइटेड था मुकुल।

‘‘मजा आ गया। बेहतरीन चाय मिलती है वहां। इतने फ्लेवर हैं कि लगता है रोज-रोज जाना पड़ेगा वहां। सोच रहा हूं टी-टेस्टिंग का कोर्स कर लूं।’’

उसके बाद तो ‘अपनी पसंद’ ही उनके मिलने की जगह बन गई। घंटों बैठे रहते। प्यार के कितने ही एहसास उन्होंने एक साथ बांटे थे वहां। भविष्य की प्लानिंग से लेकर अपने-अपने घरवालों की नाराजगी तक। नहीं, न तो जात-पात का चक्कर था, न ही धर्म का, न ही स्टेटस का। मुकुल की बढ़िया नौकरी थी, वह आईआईटीयन था और वह कॉलेज में प्रोफेसर। फिर भी दोनों का साथ परिवारों को स्वीकार नहीं था। पता नहीं दादा या परदादा के जमाने की कौन-सी दुश्मनी थी जिसे पीढ़ियों से दोनों परिवार निभा रहे थे।

‘‘माना कि मुकुल स्मार्ट है, उसका फाइनेंशियल स्ट्टेस है, लेकिन है तो हमारे दुश्मन का ही बेटा न,’’ पापा-भाई, दोनों ही सप्तम स्वर में चिल्लाए थे।

‘‘पर दुश्मनी है किस बात पर? और अगर है भी हमें कोई फर्क नहीं पड़ता, बल्कि अच्छा है न हमारा प्यार उसे खत्म कर देगा।’’

‘‘प्रोफेसरी घर पर मत झाड़,’’ मां क्रोधित हो उठी थीं।

‘‘और अगर हम फिर भी शादी कर लें तो?’’

‘‘करके तो देख, चीर कर रख दूंगा मुकुल को,’’ भाई की आंखों में खून उतर आया था।

‘‘इक्कीसवीं सदी में हमारे परिवार सदियों पुरानी सोच कैसे रख सकते हैं,’’ मुकुल उस दिन चाय पी तो रहा था, पर स्वाद और सुगंध को भीतर नहीं उतार पा रहा था। ‘‘मरने-मारने की बातें हो रही हैं। मैं तुम्हारी जान को खतरे में नहीं डाल सकता सुनयना। कुछ समय के लिए नहीं मिलते। हो सकता है हालात सुधर जाएं।’’

वह कुछ समय कब एक लंबे अंतराल में बदल गया, पता ही नहीं चला। समय घाव भर देता है, लेकिन उसके घावों पर बाहर से बेशक मरहम लगा दिखाई दे, पर भीतर से तो आज भी रिसते हैं। न जाने कहां होगा मुकुल अब! चाय के हर घूंट के साथ उसकी याद आती है।

‘‘मैडम, लगता है आगे कोई एक्सीडेंट हुआ है। जाम लग गया है। न जाने कितनी देर लगे,’’ ड्राइवर ने कहा।

‘‘मैं यहीं उतर जाती हूं। चाय पी लेती हूं, सामने वाली दुकान पर। अगर रास्ता खुल जाए तो तुम घुमा कर कार यहीं ले आना।’’

टी पॉइंट में घुसी तो वहां का डेकोर देख वह हैरान रह गई। दीवारों पर चाय की पेंटिंग्स लगी थीं। किसी में भाप उठ रही थी, तो किसी में केवल चाय का रंग था, किसी में उंगलियों ने प्याले को थामा हुआ था। इतनी सुरुचिपूर्ण सज्जा देख वह दंग रह गई थी। अवश्य ही कोई कलाकार होगा इसका मालिक, उसने सोचा। फर्नीचर तक चाय के प्याले के आकार का था। कांच के छोटे-छोटे अलग-अलग आकारों के प्यालों का कोलाज जैसा बनाकर मेजों पर सजाया गया था।

‘‘वैलकम टू चार्जिंग पॉइंट।’’ व्हाट्सअप आया। नंबर अनजान था उसके लिए और कोई डीपी भी नहीं लगी थी। उसने सोचा कि ऑर्डर देकर ट्रू कॉलर पर जाकर नंबर चेक करती हूं।

‘‘मैम, योर इलायची, जिंजर फ्लेवर्ड टी विद सम चीज बॉल्स एंड रोस्टेड कैश्यू।’’

उसकी पसंद कैसे जान ली। ‘‘पर मैंने तो अभी ऑर्डर दिया भी नहीं।’’

‘‘सर ने भिजवाया है। यहां के मालिक। वह एक्सपर्ट हैं, न जाने कैसे आपकी पसंद जान गए।’’

‘‘थैंक्यू, लेकिन तुम मुझसे मिल सकते हो,’’ उसने व्हाट्सअप पर अनजान नंबर पर जवाब दिया।

मुकुल के अलावा कौन जानता है उसे इतनी अच्छी तरह।

‘‘सोचा नहीं था कि कभी फिर तुम्हारे साथ चाय पर डेटिंग करूंगा। सो गुड टू सी यू।’’

‘‘तो चाय के बिजनेस में आ ही गए?’’ सुनयना की नजरें मुकुल के चेहरे पर टिक गई थीं। बाल थोड़े हलके हो गए थे, बाकी कोई बदलाव नहीं आया था। उसका मन किया, पहले की तरह उसके चेहरे को हाथों में भरकर चूम ले। प्यार जलतरंग सा बजाने लगा था। कहां खत्म होती है प्यार की खुशबू।

‘‘प्यार छूटा गालिब, पर चाय नहीं छूटी,’’ वह हंसा।

‘‘प्यार छूटा गालिब, पर दुश्मनी नहीं टूटी,’’ आंखें नम हो गई थीं सुनयना की।

‘‘कोशिश है ज्यादा से ज्यादा शहरों में अपने आउटलेट खोलूं ताकि चाय प्रेमी यहां आकर अपने प्यार को चार्ज करते रहें। फिर आना अपने पति का साथ।’’ मुकुल क्या जानता नहीं कि उसके सिवाय किसी के लिए उसकी जिंदगी में जगह नहीं है, फिर भी ऐसा कह रहा है।

‘‘तुमने शादी नहीं की, फिर मेरे बारे में ऐसा कैसे सोच लिया,’’ मुकुल के हाथों पर अपना हाथ रख दिया था उसने। छुअन आज भी उसे अपनी लगी। प्यार के सारे बीते पल दोनों की आंखों में सपनों की तरह तैर रहे थे।

ड्राइवर ने फोन पर बताया वह बाहर खड़ा है।

‘‘चलती हूं। ध्यान रखना अपना।’’

‘‘मैं जिंदगी को चाय की भाप में उड़ाता चला गया,’’ मुकुल ने हौले से उसके गालों को छुआ मानो कहना चाहता हो, फिर मिलेंगे किसी मोड़ पर, किसी चार्जिंग पॉइंट पर।

- सुमन बाजपेयी

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