E-इश्क:मेरे जाने के बाद एक दिन भी शीशा नहीं चमका और न ही बालकनी में सोना बरसा

2 महीने पहले
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बड़े दिनों के बाद मीना मेरे घर आई है और हमारी बातें हैं कि खत्म होने का नाम नहीं ले रही हैं। बातों-बातों में वो कई बार मुझे बचपन की बातें याद दिला देती है। आज तो हद ही हो गई जब पेपर पढ़ते हुए वो जोर से चिल्लाई, “दीदी-दीदी, देखो तो सोना कितना महंगा हो गया।” उसके चिल्लाने पर ये भी उसे घूरकर देखने लगे और मैं मन ही मन मुस्कुरा पड़ी, लेकिन मीना का बचपना गया नहीं और उसने पूरे चटकारे लेकर इन्हें ‘सोना जी’ वाला किस्सा सुना डाला।

दिसंबर का महीना था। मैं अपनी बुआ के घर फूफा जी से मैथ्स पढ़ने के लिए गई थी। वह मैथ्स बहुत अच्छे से पढ़ाते थे और जिस तरह समझाते थे वह दिमाग में घुस जाता था। उनका घर छोटा सा था और तीन तरफ बालकनीनुमा छज्जे थे। घर तक पहुंचने का रास्ता तंग गलियों से होकर जाता। दोनों तरफ लॉज हुआ करते थे, जो लड़कों से भरे रहते। हमें आते-जाते लड़कों की नजर और जुमले झेलने पड़ते थे। वहीं एक तरफ एक छोटा प्ले ग्राउंड था जहां कुछ लड़के बैडमिंटन खेलते थे। ठंड के कारण मुझे बालकनी में आती धूप में बैठ कर पढाई करना अच्छा लगता था। एक लड़का शरारत में मेरे ऊपर आइना चमकता रहता। इस कारण मैंने कमरे में बैठकर पढ़ाई करना शुरू कर दिया। मैं बालकनी में बैठकर जब नहीं भी पढ़ रही होती, तो भी शीशा चमकता और दीवार पर अपने मौजूदगी का एहसास कराता। शायद लड़का ये कहना चाहता था कि उसे मेरे बालकनी में आने का इंतजार है।

एक दिन मैं बुआ की बेटी मीना के साथ बाजार जा रही थी, तो सुनने को मिला, “ठंडे कमरे में बैठकर पढ़ाई करने से कुछ होने वाला नहीं, सब याद किया जम जाएगा।” मैंने आंख उठाकर देखा और शीशा चमकाने वाले को पहचान लिया। जैसा कि उस उम्र में होता है, मैंने अपनी बहन का हाथ पकड़ कर दौड़ लगानी शुरू की और घर के नुक्कड़ पर आकर ही सांस ली।

शीशा चमकाना बंद नहीं हुआ, बल्कि उसके साथ कंकड़-पत्थर में लिपटे पुर्जे बालकनी में गिरने लगे। इन पुर्जों की बरसात को मैं बुआ से छुपाने में कामयाब हो गई, लेकिन मीना से छुपा पाना मुश्किल बना रहा। मीना पर पुर्जों का ये राज उस दिन खुला जब एक मोटा पुर्जा मीना के कंधे पर आकर गिरा। इससे पहले कि मैं उसे लपकती, मीना ने उसे पढ़ना शुरू कर दिया। लिखा था, ‘कभी कभी चमकने वाली चीज ही सोना होती है।’ अब बारी मीना के चौंकने की थी। उसके हाथ ऐसी लॉटरी लगी थी जिसे वह हर समय भुनाने के लिए तैयार रहती। फिलहाल उसकी जिद थी कि मैं उसे सारे पुर्जे पढ़वाऊं, जो मेरे लिए पूरी तरह नामुमकिन था। मैंने तुरंत झूठ बोला और कहा कि मैं पुराने सारे पुर्जे फाड़ चुकी हूं। क्या कहती कि सारी प्रेम पातियां मैंने किताब के कवर में छुपाकर रखी हैं। मीना हाथ लगे पुर्जे पर मुझे रोज ब्लैकमेल करती और उसे फाड़कर फेंकने को बिल्कुल तैयार नहीं होती। उसने ‘सोना’ नाम का एक कोडवर्ड बना लिया जो मुझे तंग करने के लिए काफी था।

एग्जाम सिर पर थे और मैं मैथ्स की तैयारी कर अपने घर आ गई। पेपर देने के बाद मीना के बहुत बुलाने पर मैं फिर बुआ के घर आई। मीना की शिकायत थी कि मेरे जाने के बाद एक दिन भी शीशा नहीं चमका और न ही बालकनी में ‘सोना’ बरसा।

अगले दिन शाम को बुआ सिलबट्टे पर मसाला पीसने बरामदे में बैठी थी। मीना और मैं उनके आसपास मंडरा रहे थे। तभी उनके कंधे पर एक बड़ा सा पेपर का गोला आकर गिरा। मीना ताली बजाकर ‘सोना-सोना’ चिलाने लगी और मेरी स्थिति ‘काटो तो खून नहीं’ वाली थी। मीना ने तुरंत पेपर का बॉल उठाया और गुस्साती बुआ को वहीं छोड़ बालकनी की तरफ भागी जैसे किसी को पकड़ने जा रही हो। मैं भी उसके पीछे पीछे भागी। बुआ हम दोनों पर चिल्लाने लगीं। बुआ को लगा कि हम किसी को पकड़ने के लिए भागे हैं, जबकि हम दोनों को ‘सोना’ की तलाश थी। हमें वही गली के नुक्कड़ वाला जाना पहचाना चेहरा देखने को मिला, जो अपनी पूरी मित्र मंडली के साथ खड़ा खिलखिला कर बातें कर रहा था। मीना वहीं हंसकर चिल्लाई, “सोना जी, कभी आकर मिलो तो!” मैंने देखा बुआ हम दोनों के पीछे खड़ी मुस्कुरा रही थी, लेकिन ‘सोना जी’ आज भी दिल के किसी कोने में मौजूद हैं और मीना है कि ‘सोना जी’ को भूलने नहीं देती।

- शम्मी झा

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