E-इश्क:शीना इन दिनों खुश रहने लगी थी, फेसबुक पर उसकी दोस्ती उदय से हुई तो लगा उसे उसका प्यार मिल गया

22 दिन पहले
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“जब देखो ताने देती रहती हो या किसी न किसी बात पर लड़ती रहती हो। कुछ कहो तो मुंह फुलाकर बैठ जाती हो। तंग आ गया हूं तुम्हारी रोज-रोज की चिक-चिक से।” पराग चिल्लाया।

“तो मैं ही कौन-सा खुश हूं तुमसे। जब से शादी हुई है तुम्हारी हीन भावना को झेल रही हूं। तुम से ज्यादा पढ़ी-लिखी हूं और ज्यादा कमाती हूं तो इसमें मेरा क्या दोष है। शादी से पहले तो ये सब तुम्हें मेरी योग्यता लगती थीं और अब तुम्हें इन्हीं बातों से कॉम्प्लेक्स होता है। तुम्हारा फॉल्स ईगो हमारे रिश्ते को कभी पनपने नहीं देगा।” शीना भी चिल्लाई।

दोनों की अरेंज मैरिज थी, लेकिन उसे शुरू से ही इस बात का डर था कि उसका ज्यादा पढ़ी-लिखी होना और ज्यादा कमाना कहीं पराग के पौरुष को आहत न करे।

“खुश नहीं हो तो क्यों रह रही हो मेरे साथ? मेरे घरवालों के साथ भी बुरा व्यवहार करती हो।” शादी के तीन साल हो गए थे और उनकी रोज ही किसी न किसी बात पर बहस या लड़ाई हो जाती थी।

“अपने घरवालों की बात मत करो, एकदम जाहिल लोग हैं। हर बात पर टोकते हैं। आने में देर भी हो जाती है, तो तुम्हारी मां के सवालों की बौछार शुरू हो जाती है। इतने ही दकियानूसी हो तो नौकरी वाली बहू लानी ही नहीं चाहिए थी, पर पैसों का लालची तो पूरा परिवार है।” यह सुन पराग का हाथ शीना पर उठने ही वाला था कि उसका रौद्र रूप देख वह रुक गया।

“बस बहुत हुआ। अच्छा यही होगा कि हम अलग हो जाएं।”

दोनों के घरवालों ने बहुत समझाया कि तलाक लेना समाधान नहीं है, पर दोनों ही नहीं माने।

अलग हो जाने के बाद बीती यादों से निकलना आसान नहीं होता।

शीना को उसकी दोस्त ने सुझाया कि वह अपने नाम का फेसबुक अकांउट बंद कर नई पहचान से अकाउंट बना ले ताकि पराग उसे किसी भी तरह से तंग न कर सके।

एक साल हो गया था उन्हें एक-दूसरे से अलग हुए। शीना इन दिनों खुश रहने लगी थी। फेसबुक पर उसकी दोस्ती उदय से हुई तो लगा उसे उसका प्यार मिल गया है। चैट करते हुए उसे हमेशा लगता कि वही उसके लिए परफेक्ट साथी है। कितनी अच्छी सोच थी उसकी।

“तुम कितनी टैलेंट्ड होऔर इतने बड़े ओहदे पर होने के बावजूद एकदम डाउन टू अर्थ हो। अपनी फोटो भी अपलोड करो।”

शीना जो छाया बनकर चैट करती थी, ने लिखा, “फोटो अपलोड करने का अभी टाइम नहीं आया है, थोड़ा इंतजार करो। तुमने भी नहीं लगाई है अपनी फोटो।”

चैट करते-करते दोनों एक-दूसरे की पसंद-नापसंद, आदतें और शौक अच्छी तरह से जान गए थे। यहां तक कि एक-दूसरे से राय भी लेने लगे थे।

“छाया, तुम्हारे पास हर समस्या का समाधान होता है।” वह सोचती कितना फर्क है पराग और उदय की सोच में। पराग को लगता था कि वह केवल समस्या पैदा करना जानती है, समाधान ढूंढना नहीं और उदय है कि उसे उसकी हर बात अच्छी लगती है। पराग तो हमेशा उसमें कमियां निकालता रहता था। महीना शुरू होते ही वह उसका वेतन मांगना शुरू कर देता था। वह पराग से प्यार चाहती थी।

पर वह क्यों सोच रही है उसके बारे में। …पराग न सही, पर उसने तो उसके करीब जाने की बहुत कोशिश की थी, उसे सच्चे दिल से अपनाना चाहा था पर उसने तो जैसे अपने चारों ओर मोटी-मोटी दीवारें खड़ी कर रखी थीं। उसकी जिस काबीलियत की पराग ने हमेशा अवहेलना की, उदय को वही पसंद है। उदय से चैट करते समय अक्सर उसे पराग की याद आ जाती और वह सोचती कि काश, पराग भी ऐसा होता तो अलग होने की नौबत न आती। कहां चूक हो गई थी उससे?

उदय के बहुत बार कहने पर भी वह उससे मिलने को तैयार नहीं होती थी। उसकी सच्चाई जानने के बाद भी क्या उदय उससे दोस्ती रखना चाहेगा। डाइवोर्स होने का ठप्पा जो उसके ऊपर लगा था वह उसकी आने वाली जिंदगी पर अनेक सवाल उठा सकता था।

“तू ज्यादा ही डर रही है। पराग और तेरी नहीं बनी, अब इस वजह से आने वाली खुशियों के लिए दरवाजे बंद कर देना बेवकूफी होगी। उदय से मिल ले। अगर वह सचमुच तुझे पसंद करता है, तो उसे इस संबंध को आगे बढ़ाने में कोई आपत्ति नहीं होगी,” शीना की कुलीग संजना ने उसे समझाया।

धड़कते दिल के साथ शीना अपने पसंदीदा रेस्तरां में शाम पांच बजे जब उससे मिलने पहुंची, तो उसे एक झटका लगा। पराग भी रेस्तरां में प्रवेश कर रहा था। वह उससे नजर बचाकर एक कोने में जाकर बैठ गई। पर आंखें थीं कि उस पर हटने का नाम नहीं ले रही थीं। कमजोर लग रहा था, लगता था उसके जाने के बाद उसने अपना ख्याल रखना ही छोड़ दिया था। बहुत देर इंतजार करने के बाद भी जब उदय नहीं आया तो उसने फेसबुक पर उसे मैसेज भेजा, “बहुत देर से इंतजार कर रही हूं।”

तुरंत उसका जवाब आया, “कब से बैठा हूं रेस्तरां में, तुम कहां हो?”

“सबसे आखिर में कोने की सीट पर बैठी हूं। गुलाबी रंग का सूट पहना है।”

पराग ने जैसे ही मुड़कर देखा तो शीना की जैसे सांसें ही रुक गईं…।

वह मन ही मन बुदबुदाई, “नहीं, यह नहीं हो सकता, पराग उदय नहीं हो सकता।”

“ऐसा होना कैसे संभव है? शीना, …तुम छाया हो?” पराग की आवाज में कंपन था।

“और तुम उदय कैसे हो सकते हो? वह तो इतना सुलझा हुआ इंसान है। यह तो सरासर धोखा है।” शीना जाने के लिए उठ खड़ी हुई तो पराग बोला, “तुम्हारे जाने के बाद मुझे एहसास हुआ कि मैं कितना गलत था। असल में मुझे तुम्हारी जैसी ही लाइफ पार्टनर चाहिए थी, पर तब मैं तुम्हारी कद्र नहीं कर सका। पर तुमने मुझे फ्रेंड कैसे बना लिया फेसबुक पर? तुम्हें तो मेरी सारी आदतें बुरी लगती थीं।”

“उदय के रूप में तो तुम मुझे बिल्कुल रूखे नहीं लगे। असल में रिश्ता चाहे जो हो, प्रयास अगर दोनों तरफ से न हो तो वह कायम नहीं रह पाता, खासकर पति-पत्नी का।” शीना की आंखें नम हो गई थीं। उसे समझ नहीं आ रहा था कि जिंदगी ने उसके साथ कैसा खेल खेला है। दुबारा जिंदगी उसे वहीं ले आई थी, जहां उसने दुबारा कदम न रखने का फैसला किया था।

“असल में हम दोनों बने ही एक-दूसरे के लिए हैं, पर अब तक अपने-अपने अहम का एक आवरण डाले जी रहे थे। फेसबुक पर जब हम अपने असली रूप में सामने आए तो हम एक-दूसरे को पसंद करने लगे। मुझे लगता है, जब वक्त ने हमें दुबारा मिलाया है तो हमें दुबारा एक-दूसरे को फिर से मौका देना चाहिए,” पराग बोला।

“क्या तुम्हें ऐसा लगता है कि इस बार हमारा फेसबुक वाला प्यार सफल हो पाएगा,” शीना मुस्कराई।

“वादा करता हूं इस बार शिकायत का कोई मौका नहीं दूंगा।”

शीना ने तुरंत मोबाइल पर कुछ टाइप किया। पराग ने फेसबुक चेक किया। उसने स्माइली के साथ मैसेज भेजा था, “चलो, दिया मौका।”

- सुमन बाजपेयी

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