बाइक वाला रांझा:कंगना के बताने पर शुभा को पता चला कि रोहान उसे पसंद करता है, लेकिन उसके लिए इतना काफी नहीं

6 दिन पहले
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“हां, मैं हीर हूं।”

“हां, मैं रांझा हूं।”

“हम दोनों हीर-रांझा हैं, पर हमारा मिलन जरूर होगा। हमारी कहानी का अंत दुखद नहीं होगा… हम मिलेंगे, जरूर मिलेंगे, बेदर्द दुनिया...।”

“हीर-रांझा? देखकर तो नहीं लगता?” शुभा और रोहान, दोनों आगे कुछ बोलते, उससे पहले ही कंगना उन दोनों के बीच आकर कमर पर हाथ रख खड़ी हो गई। उसके चेहरे पर हैरानी थी और आंखों में असमंजस के भाव तैर रहे थे।

“मतलब?” शुभा ने उसे कोहनी मारी।

“मतलब यह है कि तुम दोनों को साथ देखकर कोई ऐसी केमिस्ट्री दिखाई नहीं दे रही जिससे लगे कि तुम्हारे बीच हीर-रांझा जैसा प्रेम है।”

“हे भगवान!” शुभा सिर पकड़कर बेंच पर बैठ गई। “तेरा कुछ नहीं हो सकता, झांसी की रानी। हमेशा या तो बिंदास जो भी आएगा बोल देगी या आक्रामक मुद्रा में खड़ी हो जाएगी।”

“अरे-अरे,” रोहान बोला और वह भी बेंच पर सिर पकड़कर बैठ गया।

“असल में कॉलेज फेस्ट के दौरान कल होने वाले हीर-रांझा प्ले में हम दोनों हीर-रांझा की भूमिका निभा रहे हैं। रिहर्सल करके फ्री हुए थे तो सोचा इसे कुछ मॉडर्न टच देकर देखते हैं। आखिर कब तक हीर-रांझा मरते रहेंगे। कुछ इम्प्रोवाइज करना तो बनता है, वही कर रहे थे। यूं समझ ले कि असल के हीर-रांझा की प्रेम कहानी के दर्द को कम करने के लिए हम तो बस यूं ही मजा-मस्ती कर रहे थे। इतने दिनों से इस प्ले की रिहर्सल करते-करते लगने लगा है कि जैसे हीर की रूह मेरे अंदर आकर बैठ गई है,” हंसते हुए शुभा बोली।

“वैसे किसी को बुद्धू बनाने का कोई इरादा तो नहीं था, लेकिन अपनी सबसे प्यारी सखी के चेहरे पर आए भावों को देख मजा बहुत आया।”

शुभा ने कंगना को रोहान से मिलवाते हुए कहा, “रोहान इससे मिलो। यह मेरी सबसे प्यारी दोस्त कंगना। यह इंदौर में पढ़ती है और हमारे शहर में विमेंस कॉलेज में इंटर कॉलेज प्रतियोगिता में हिस्सा लेने आई है। बहुत अच्छी कविताएं लिखती है।”

फिर कंगना की तरफ मुखातिब होकर बोली, “अब गले तो लग। अचानक आकर खड़ी हो गई। बताया तक नहीं कि कितने बजे पहुंचेगी।”

“बता देती तो ऐसे डायलॉग सुनने को कैसे मिलते? कितनी देर से तुझे ढूंढ रही थी। जानबूझकर फोन नहीं किया, मिला न अच्छा सरप्राइज?” कंगना, शुभा से लिपटते हुए बोली, “वही तो मैं सोच रही थी कि तुझे प्यार हो गया और तूने इतनी बड़ी बात मुझसे कैसे छिपाई।”

रोहान अभी भी हक्का-बक्का खड़ा उन दोनों को देख रहा था।

शुभा उसके गाल पर एक चपत लगाते हुए बोली, “तुझसे कभी कुछ छिपाती हूं क्या?”

“वही तो मैं सोच रही थी।” कंगना ने अपनी गोल-गोल आंखें मटकाईं।

“रोहान मुझसे एक साल सीनियर है। हम दोनों ने इतनी प्रैक्टिस की है कि उम्मीद है हमारा प्ले हिट होगा। हमारे डायरेक्टर सर का कहना है कि हम दोनों के अभिनय को देखकर लगता है जैसे हम हीर-रांझा की भूमिका में सच में उतर गए हों। जबकि हमारे बीच ऐसी कोई केमिस्ट्री नहीं है, जैसा कि तूने भी कहा। इस प्ले के रिहर्सल से पहले रोहान और मेरा कुछ खास परिचय भी नहीं था।”

शुभा की बात सुन अचानक रोहान बोल उठा, “परिचय नहीं था, लेकिन मैं तुम्हें जानता था। आई मीन तुम पर कई बार नजर पड़ी थी। मेरा मतलब है… जूनियर स्टूडेंट्स के बारे में थोड़ी-बहुत जानकारी रखनी ही पड़ती है। वैसे भी तुम्हारा और मेरा सब्जेक्ट कोर्स एक ही है। हालांकि…”

रोहान की झिझक देख शुभा बोली, “ओहो, इतनी एक्सप्लेनेशन देने क जरूरत नहीं। इट्स ओके। अच्छा रोहान, मैं इसे कैंटीन ले जाकर कुछ खिलाती हूं, वरना यह हमारा भेजा खा जाएगी।”

“कैंटीन में समोसे के किनारे कुतरते हुए कंगना बोली, “मुझे परखने में थोड़ी भूल हुई। तेरे मन में बेशक रोहान के लिए कुछ न हो, पर उसकी आंखें तो कुछ और ही बोल रही थीं। उसके दिल में कुछ तो बुलबुले फूटते हैं तेरे लिए।”

“कुछ भी बोलती है। कितनी बार कहा, फिल्में कम देखा कर। लेकिन फिल्मों को क्या दोष दूं। मैडम ठहरीं कवयित्री, बोलते हुए शब्द नहीं कविताएं बहती हैं। चुपचाप खा, फिर हम घर चलते हैं। सामान कहां है तेरा?”

“रिसेप्शन पर रखा है। हमारा उसी कॉलेज में ठहरने का प्रबंध था, लेकिन पता है वहां रुकती तो तू मुझे कच्चा ही चबा जाती।”

शुभा ने आंखें तरेरीं, फिर दोनों हंसने लगीं।

ऐसी ही है उनकी दोस्ती, एकदम साफ पानी की तरह। दोनों एक-दूसरे से कुछ नहीं छिपातीं। कंगना ने रोहान को लेकर जो कहा, वह सोचकर शुभा मन ही मन सोचने लगी कि पूरी पागल है, न जाने क्या मनगढ़ंत बातें बना लेती है। कुछ नहीं है रोहान के मन में।

हीर-रांझा प्ले की जमकर तारीफ हुई। शुभा और रोहान का अभिनय इतना जीवंत था कि दर्शकों की आंख में आंसू आ गए। ग्राफिक्स की मदद से चेनाब नदी का दृश्य तैयार किया गया था पृष्ठभूमि में।

“तुम ही मेरे सपनों की शहजादी हो हीर, तुम्हारे लिए मैं कुछ भी कर सकता हूं,” रोहान ने शुभा की आंखों में झांकते हुए कहा। उस पल उसे लगा जैसे वह सच में उसकी आंखों में डूब जाएगी।

बड़ी मुश्किल से खुद को संभालते हुए तब मंच पर उसने कहा, “जानती हूं। तभी तो जमींदार के बेटे होकर भी मेरी खातिर मवेशी चराने का काम करते हो।”

तालियां बज उठीं। उनके हर संवाद पर, अभिव्यक्ति की हर मुद्रा पर लोग तालियां बजा रहे थे। सीटियां बज रही थीं और वाह-वाह की आवाजें ऑडिटोरियम में गूंज रही थीं।

प्ले खत्म होने के बाद जैसे ही वह ग्रीन रूम की ओर जा रही थी, रोहान ने आकर उसका हाथ पकड़ लिया। “बधाई हो इतना अच्छा अभिनय करने के लिए। तुम एक उम्दा कलाकार हो। जानती हो, सब कह रहे हैं कि हमारी जोड़ी हिट है।” रोहान ने इससे पहले उससे इस तरह कभी बात नहीं की थी। रिहर्सल के दौरान भी वह कम बोलता था, केवल अपने संवादों पर ध्यान लगाता था।

शुभा ने अपना हाथ छुड़ाते हुए कहा, “तुम्हें भी बधाई हो। तुमने अभिनय के दौरान मुझे इतना कंफर्टेबल महसूस कराया कि मैं अपनी भूमिका में खो सी गई थी। तुम भी एक बेहतरीन कलाकार हो। हम जल्दी ही एक थिएटर ग्रुप बनाने वाले हैं, तुम भी उसमें शामिल हो सकते हो, अगर चाहो तो?”

“जरूर। तुम्हारे साथ काम करने को मिलेगा, और मुझे क्या चाहिए?”

शुभा अचकचा गई। वह तेज कदम रखते हुए ग्रीन रूम की ओर बढ़ गई। तब तक वहां शोर मचाती हुई कंगना भी पहुंच गई।

“हाय, मेरी जान क्या पर्फोमेंस थी तेरी। दिल लूट लिया तूने मेरा। तुझे पता नहीं आज तूने कितनों को अपना आशिक बना लिया। एक तो बला की सुंदर है, ऊपर से क्या एक्टिंग की तुम दोनों ने। मेड फॉर इच अदर लग रहे थे। मान ले मेरी बात, रोहान तुझसे प्यार करता है। कैसे उसने तुझे बांहों में भरा था। काश! मेरा भी ऐसा आशिक होता!”

“तेरी बक-बक खत्म हो गई तो घर चलें?”

“नहीं यार। आज मुझे कॉलेज में ही रहना होगा। कल सुबह ही कंपटीशन है। मैडम की सख्त हिदायत है कि वहीं रहना होगा। कल सुबह मिलते हैं। तू टाइम से पहुंच जाना मेरी कविताओं का स्वाद चखने के लिए।”

रात हो गई थी। शुभा ने सोचा कैब ले लेती है।

“मैं तुम्हें घर तक छोड़ सकता हूं?” रोहान मोटरसाइकिल पर उसके पास से गुजरा तो रुक गया।

मना नहीं कर पाई शुभा।

मोटरसाइकिल पर पीछे बैठे रोहान के शरीर को छूने से बचने का प्रयास करती वह, बार-बार उससे टकरा जाती। एक अजीब-सा नशा उस पर हावी हो रहा था। रोहान अच्छा है, उसके मन ने कहा। उसे अच्छा लगने लगा है, या पहले से ही… उनके बीच की केमिस्ट्री उसे समझ आने लगी।

मोटरसाइकिल तेज गति से दौड़ रही थी और उसे लग रहा था कि वह सचमुच हीर है। चेनाब नदी पार करके मिलने न सही, नौका पर न सही, मोटरसाइकिल पर बैठी रांझा के साथ जा रही है। ऐसे ही हौले-हौले होता होगा शायद प्यार…

मॉडर्न टच के साथ हीर-रांझा की प्रेम कहानी… शायद शुरू हो गई थी।

- सुमन बाजपेयी

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