E-इश्क:सिंदूरा इसलिए उसके साथ सटकर चलती थी कि उसकी खुशबू, उसके स्पर्श को अपने जिस्म के हर रेशे में उतार सके

7 महीने पहले
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पुचके... …हां, अब तक दस पुचके खा चुकी थी। हैरानी क्यों? दिल्ली की तरह यहां कोलकाता में पुचके यानी गोलगप्पे बड़े-बड़े थोड़े मिलते हैं। एकदम छोटे होते हैं। मुंह में रखो और गप गायब। वह विक्टोरिया मेमोरियल के ठीक सामने खड़ी होकर एक खोमचे वाले से पुचके खा रही थी। बहुत ही छोटी-सी टोकरी और मटकीनुमा घड़े में पानी रखे वह बिना स्वाद वाली चटनी के साथ धीरे-धीरे खिला रहा था। न जाने क्यों दिल्लीवालों की तरह इनके हाथ नहीं चलते। जायकेदार तो कतई नहीं थे, पर वह खा रही थी, क्योंकि कोलकाता के पुचके का स्वाद (चाहे वे कितने बेस्वाद ही क्यों न हों) एक बार लेना तो बनता ही है। टशन ही कह लें!

“ऐ सेंदूरा, केमौन आछे? यू स्टिल लाइक पुचकाज? नॉट चेंज्ड ए बिट।”

हिंदी, बांग्ला, अंग्रेजी… भाषाओं का सम्मिश्रण…... शुक्र है फ्रेंच और जर्मन भाषाओं का प्रयोग नहीं किया था। बिना गर्दन घुमाए सिंदूरा ने एक और पुचका अपना मुंह में रखा और मुस्काते हुए पलटी। “अच्छी आदतें क्यों बदलनी? बुरी चीजों को तो कब का पीछे छोड़ आई हूं। बदले तो तुम भी नहीं। सेंदूरा ही बोलते हो।”

वह हंसा और आदतन उसने आपने माथे को दो उंगलियों से सहलाया। इस बात के लिए वह कितना छेड़ती थी उसे। “दिमाग शार्प करने की कोशिश करते हो क्या ऐसा करके?” वह तब उसके हाथ को हल्के से छूकर कहता, “ना-ना, चिंतन-मनन करता रहता हूं। सामने ऐसी विदूषी हो, ऐसा करिश्माई चेहरा हो, तो मन सोचने के लिए मजबूर हो ही जाएगा न। कहीं खो न दूं तुम्हें यही डर सताता रहता है।”

“ड्रामा किंग! कहां टेक्सटाइल की दुनिया में आ गए। तुम्हें तो किसी नाट्य मंच पर होना चाहिए था।”

अपलक निहारती रही वह उसे। सच है, आज भी नहीं रह सकती वह उसे टकटकी बांधे देखे! सुदर्शन व्यक्तित्व, बंगाली अंदाज और हमेशा की तरह वेल ड्रेस्ड। सांवली रंगत पर नेवी ब्लू सूट खूब खिल रहा था। चाहे समय उनके बीच कितनी ही दूरियां बनाकर खड़ा रहे, लेकिन वह जानती है कि जब भी नीलोत्पल बैनर्जी उसके सामने आकर खड़ा होगा, वह उसे टकटकी लगाए आंखों में भरे बिना नहीं रह पाएगी।

वह चाहे जिंदगी से कितनी भी दूर न हो जाए, उसके साथ बेशक कोई ऐसा रिश्ता न हो जिसे नाम दिया जा सके, लेकिन नील को अपने मन के कपाटों से बाहर निकालना सिंदूरा के लिए संभव ही नहीं है। उन कपाटों पर वह एक झिर्री भी नहीं लगने देती है।

“बाल इतने छोटे कर लिए? कितना सुंदर जूड़ा बनाती थीं तुम। ओरे बाबा! लटें भी झूल रही हैं। माई ब्यूटीफुल लेडी इज गेटिंग यंग डे बाई डे।”

चलते-चलते दोनों विक्टोरियल मेमोरियल के सामने बने बाग में आ गए थे। टहलकदमी करना तो शुरू से ही दोनों का पसंदीदा शगल रहा है। वह कहता, “फिट रहने के लिए चलना सबसे बेहतरीन ऑप्शन है।”

और सिंदूरा तो इसलिए उसके साथ सटकर चलती थी कि उसकी खुशबू, उसके स्पर्श को अपने जिस्म के हर रेशे में उतार सके।

दीदी ने जबर्दस्ती भेजा था कोलकाता उसे। “तेरी पसंद खूब है। मेरे बुटीक के लिए तांत की साड़ियां ले आ। रेडीमेड ब्लाउज भी खूब मिलते हैं वहां।” गडियाहाट से लेकर कॉलेज स्ट्रीट, श्याम बाजार और बड़ा बाजार, हर जगह वह दौड़ती-भागती रही थी। कभी ट्राम, कभी टैक्सी और कभी हाथ रिक्शा में, कोलकाता के न जाने कितने बाजारों और सड़कों को नाप लिया था उसने। के.सी.दास के रसगुल्ले भी खूब छककर खाए थे और वहां के पुचकों का स्वाद भी तो पहली बार लिया था।

“काफी अच्छा कलेक्शन है आपके पास। ब्रिलिएंट, खूब भालो!” वह एक दुकान पर साड़ियां पैक करा रही थी कि साड़ियों को कलात्मकता से छूते और उनकी फोटो उतारते व्यक्ति पर नजर गई थी। ऐसा नहीं लगा था कि वह साड़ियां खरीदने आया है। मैरून कलर की टी-शर्ट और जींस, बात करते समय हाथ की दो अंगुलियों से माथे को सहलाता था। एक सादगी मिश्रित आकर्षण था, आंखों में एक तरह की बेचैनी थी, वरना किसी अजनबी को सिंदूरा क्योंकर टकटकी बांध देखने लगती।

डिजाइन बनाने वाले कारीगरों के बारे में उसने जानकारी ली। पल्लू और बॉर्डर काफी खूबसूरत तरीके से डेकोरेट किया जाता है, उसके बारे में पूछा। फ्लोरल, पैस्ले और अन्य डिजाइन व विभिन्न तरह के कलरफुल पैटर्न पर बात करता रहा। दुकानदार को बता रहा था कि वह अलग-अलग तरह के कपड़ों, बनावट, वर्क और डिजाइन पर रिसर्च कर रहा है। एक किताब भी लिखेगा, इसलिए कारीगरों और बुनकरों से बात करता है जगह-जगह जाकर। कोलकाता में रहता है, इसलिए शुरुआत यहीं से की है।

दिलचस्प लगा था सिंदूरा को उसका वह काम या हो सकता है शौक हो।

“आपकी पसंद भी लाजवाब है। सारी साड़ियां बेहतरीन खरीदी हैं,” अचानक वह उसके पास आकर खड़ा हो गया था। कशिश महसूस हुई थी सिंदूरा को। ऐसा महसूस हुआ था जो पहले किसी पुरुष के बगल में खड़े होने या बात करते समय नहीं हुआ था। प्रोफेसर है, उस पर से बहुत सोशल तो मिलने वालों की संख्या भी कम छोटी नहीं है उसकी। मन किया था सट जाए उससे। अजनबी है तो क्या हुआ!

“आपकी रिसर्च का विषय बहुत दिलचस्प है। नजर भी कम पारखी नहीं,” सिंदूरा के मुंह से निकला था।

“थैंक यू। बाई दा वे आई एम नीलोत्पल बैनर्जी,” आंखें किसी तिलिस्म की तरह चमकीं थीं और सिंदूरा के चेहरे पर जम गई थीं। कुछ तो था उनमें…, कुछ तो हुआ था उस पल। उसकी आंखों की बेचैनी उसके दिल में उतर आई थी।

“सिंदूरा,” ज्यादा बोल नहीं पाई थी।

“ओह, वॉट ए लवली नेम, सेंदूरा। तभी लालिमा से बिखरी हुई है आपके चेहरे पर।”

“सिंदूरा,” उसने दोहराया था।

“कोलकाता की तो नहीं लगतीं?” वह सड़क पर साथ-साथ चलने लगा था। सिलसिला खत्म नहीं हुआ उसके बाद। वह बार-बार उससे मिलने दिल्ली आता रहा और उसकी जिंदगी का ऐसा हिस्सा बन गया जिसके साथ न होने पर अधूरापन उसे घेर लेता। जगह-जगह घूमना उसका शौक भी था और काम भी। पर फोन पर रोज बात होती, वीडियो कॉल पर देर तक एक-दूसरे की आंखों में झांकते रहते।

सिंदूरा को अक्सर लगता कि वह कमिटमेंट करने से कतराता है। प्यार करता है, इजहार भी करता है, पर एक लकीर सी खींच रखी है। बंधन से दूर भागता है।

“सेंदूरा, मैरिज मेरी टू डू लिस्ट में नहीं है। ऐसे ही मेरे साथ चलना चाहती हो तो ठीक है, वरना तुम चाहो तो किसी और से शादी कर सकती हो।”

कितनी आसानी से कह दिया था। प्यार उससे करे और बंधे किसी और के साथ! नहीं, वह अपनी जिंदगी उलझाना नहीं चाहती। “नील, अपने प्यार के एहसास का सम्मान करूंगी मैं।”

“आफ्टर सिक्स ईयर वी आर मीटिंग। तुम रहीं हमेशा मुझमें। तुम भी तो अभी भी लिपटी हो मेरी यादों से।” नीलोत्पल ने उसका हाथ पकड़ लिया था। सिहर उठी थी। छुअन कभी बासी नहीं पड़ती!

“लेट्स मैरी। आमी तुमाके भालो बाशी।”

“नहीं नील, तुम्हारी खींची लकीर के पार मैं अपनी ही एक दुनिया बसा चुकी हूं। तुम हमेशा रहोगे उसमें, लेकिन तुम्हारा प्रवेश अब उसमें संभव नहीं। मैं जानती हूं, तुम कुछ पल की भावनाओं के आवेश में ऐसा कह रहे हो, कमिटमेंट भी तुम्हारी टू डू लिस्ट में नहीं है। प्यार के एहसास पर कोई बंधन मुझे मंजूर नहीं।” सिंदूरा उसका हाथ छोड़ दूर सरक गई थी।

- सुमन बाजपेयी

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