E-इश्क:धीरे-धीरे मेरे लिए सब कुछ करते हुए वो मेरी रूह की गहराइयों में उतरने लगा

8 दिन पहले
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“उत्तरकाशी की वादियों में! तीस साल बाद! कितने दिन का काम है आपको? खैर जितने भी दिन का हो” हर्ष और रोमांच से मेरे रोंगटे खड़े हो गए। “हां, हां, जरूर चलूंगी। अपनी छुट्टियों का मैं देख लूंगी। आप बुकिंग्स करा लीजिए।” पति का फोन रखकर मैं बॉलकनी में आ गई। काली घटाएं घिर आई थीं। पता ही नहीं चला कब अतीत की यादों की तरह रिमझिम फुहारों ने मुझे पूरा भिगो दिया। उत्तरकाशी की बात हो और उसकी याद न आए...

‘इकोलॉजी’ मेरा विषय था और शोध के सिलसिले में दो-तीन वर्ष हिमालय क्षेत्र में रहना आवश्यक था। पापा ने अपने संपर्क खंगालने शुरू किए तो उनके कोई अधीनस्थ रहे सुपरिचित उत्तरकाशी के एक उच्च प्रशानिक अधिकारी निकल आए और उन्होंने सारे इंतजाम करा दिए।

वहां पहुंची तो पहले दिन वहां की वादियां देखकर जैसे बौरा ही गई। सामने खिलौने जैसा बर्फ का पहाड़ कैमरे की दृष्टि से देखते हुए चली जा रही थी कि किसी ने अचानक मजबूती से कमर में हाथ डालकर अपनी ओर कस लिया। इस औचक हुए ‘प्रहार’ से हाथ से छूट गए कैमरे को उसने जमीन पर गिरने से पहले फुर्ती से दूसरे हाथ से पकड़ लिया। अचकचाकर पलटी नजर ने जब देखा कि ये धृष्टता एक युवक की थी, तो हाथ अनायास ही एक जोरदार थप्पड़ के रूप में उठ गए, “छोड़ो मुझे, ये क्या बदतमीजी है?”

“बदतमीजी नहीं, जान बचाना। वो देखिए।” वो मुझे पकड़े हुए ही बोला। सामने देखते ही चक्कर सा आ गया। सैकड़ों फीट गहरी घाटी से एक कदम दूर थी मैं।

“बड़े स्मार्ट हो तुम। जानते थे कि मेरे हाथ से कैमरा गिर जाएगा। धन्यवाद! मेरी जान बचाने के लिए भी और मेरा महंगा कैमरा बचाने के लिए भी।” गेस्ट हाउस पहुंचकर मैं चाय की चुस्की लेते हुए उसकी तारीफ करते हुए मुस्कुराई। “अरे धन्यवाद की जरूरत नहीं, ये तो मेरी ड्यूटी है। मैं आपका सब कुछ जो हूं।”

उसका भाषायी ज्ञान बहुत कमज़ोर था, तभी तो मेरी तमतमाई नजर से उसे पता चल पाया कि वो कुछ गलत बोल गया है। ”मेरा मतलब है कि आपके लिए सब कुछ करना है मुझे। जो शेफ आपका खाना बनाएगा, जो ड्राइवर आपको घुमाएगा, सबका इंतजाम... सबको मैं देखूंगा और आपको भी, मतलब आपको कब किस चीज की जरूरत है, क्या जानकारी चाहिए...”

“ओह केयर टेकर” मेरे शब्द को ठीक से समझने के लिए उसकी आंखों में प्रश्न उग आए, पर संकोचवश वो कुछ बोला नहीं।

बाद में संकोच खुलने के बाद कई बार उसने मुझसे पूछा, “आप अंग्रेजी में क्या बताती हो लोगों को, मैं आपका क्या हूं?” वो केयर टेकर बोल न पाता तो मैं मुस्कुरा देती, “तुम कहते हो ‘सब कुछ’, तो वही समझ लो। इस पर उसकी आंखों में आह्लाद का सागर दिखाई देने लगता। धीरे-धीरे मेरे लिए सब कुछ करते हुए वो मेरी रूह की गहराइयों में उतरने लगा। एक कदम तब जब बर्फबारी में मेरे लिए सब्जी लाने दो कोस गया और डांटने पर मासूमियत से बोला, “आप सब्जी के बिना खाना ठीक से नहीं खा पातीं और सब्जी यहां सप्ताह में एक बार ही आती है।” एक कदम तब जब श्वेत कमल तोड़ने मौत का तालाब कही जाने वाली झील में उतर गया। एक कदम तब जब मैं खुजली वाली झाड़ी के बीच फंस गई और मुझे बचाने के लिए उसने झाड़ी को अपने हाथों से पकड़ लिया। बिदाई के समय उसकी आंखें साफ कह रही थीं कि मैं भी उसकी रूह की गहराइयों में उतर चुकी हूं।

मेरा शोध स्वीकृत होते ही विख्यात विश्वविद्यालयों से आने वाली सर्वश्रेष्ठ नौकरियों और विवाह के लिए हर तरह से श्रेष्ठ प्रस्तावों की झड़ियां लग गईं और मम्मी-पापा को मुझे ये समझाने में कठिनाई नहीं हुई कि झुमरू मेरा वो क्षणिक आकर्षण है जिसे मैं आसानी से भूल जाउंगी।

पर उसकी यादें दिल के सबसे गहरे कोने में गुंथ चुकी थीं, तभी तो उत्तरकाशी पहुंचने के दूसरे ही दिन जा पहुंची झुमरू के गांव।

सब कुछ वैसा ही था, बस लाल-लाल सुंदर सेबों से लदा एक बगीचा और खड़ा था। मेरे स्मृतिपटल पर उस दिन का दृश्य एकदम साफ-साफ चलने लगा, “तुम्हारा गांव और तुम्हारा घर बहुत सुंदर है। बिल्कुल वैसा ही जैसा हम लोग बचपन में ड्राइंग में बनाते थे। ये फूलों का बगीचा भी सुंदर है, पर इतनी जगह में तो सेब का बगीचा उग सकता है। तुमने लगाया क्यों नहीं? मेरा बड़ा मन करता है कि सेब अपने हाथों से तोड़कर खाऊं।”

“ये फूल हमारी आमदनी का जरिया हैं। पेड़ लगाने के लिए फूल हटाने पड़ेंगे और जब तक पेड़ फल देने लायक नहीं हो जाते, हम खाएंगे क्या?” गहन विषयों की शोधार्थी के पास इस सीधे सरल प्रश्न का कोई उत्तर नहीं था, पर बिदा के दिन पनीली आवाज में कहा था उसने, “मैं आपके लिए सेब का बगीचा लगाऊंगा। आप आना देखने।”

खूब आवभगत हुई वहां पर भरी पलकों से। झुमरू अब इस दुनिया में नहीं था। पर उसके भाई-भाभी बता रहे थे... सनक सवार हो गई थी उस पर सेबों का बगीचा लगाने की। फूल काट डाले और पेड़ों के बड़े होने तक आमदनी की भरपाई के लिए क्या नहीं किया। घर में सबको बता रखा था कि वो शहरी मेम साहब जब आएंगी तो उन्हें बगीचा दिखाना और उनसे कहना अपने हाथों से तोड़कर खाएं। ...और जितने भी सेब उस समय उगे हों, उन्हें उपहार में दे देना... उसकी पत्नी के बारे में पूछने पर रो पड़ी उसकी भाभी...”बहुत समझाया शादी के लिए, पर माना ही नहीं। कहता था किसी का ‘सब-कुछ’ बन चुका है। अब किसी और का नहीं हो सकता...

मैं स्तब्ध सी बस उन्हें देखती रह गई। झुमरू ‘केयर टेकर’ का मतलब भले न समझे पर ‘सब-कुछ’ का मतलब समझता था और मैं!

- भावना प्रकाश

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