E-इश्क:उसने अपने चारों तरफ जो मजबूत दीवार खड़ी कर रखी थी, किसी ने उसमें छेद कर झांकने की गुस्ताखी कर दी

7 महीने पहले
  • कॉपी लिंक

”हेलो निवि, कैसी हो?” लंच टाइम में अचानक कंप्यूटर स्क्रीन पर ये चार शब्द देख कर आईएएस निवेदिता मांजरेकर चौंक पड़ीं। “लंच टाइम में काम करने की तुम्हारी आदत अभी तक गई नहीं?”

गुस्से में निविदेता का चेहरा तमतमा गया। ऑफिस में कोई उससे आंख मिलाकर बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था, फिर उसे "तुम"और उसके निकनेम से संबोधित करने का दुस्साहस कौन कर रहा है? अगले दिन कंप्यूटर पर पासवर्ड डालते ही वही संदेश उभरा, साथ ही उसका पूरा बायोडेटा भी अटैच्ड था।

निवेदिता सोच में पड़ गई। बायोडेटा तो कोई भी ऑफिस से लेकर भेज सकता है, लेकिन निवि? जरूर कोई पुराना परिचित या सहपाठी होगा। ”तुम्हारा सोचना सही है। तुम्हें याद होगा, एक दिन तुमने मुझे कस कर डांटा था। सच पूछो तो आज मैं जिंदगी में जो कुछ भी बना हूं, तुम्हारी उसी डांट की वजह से बना हूं। वैसे एक बार अपना आईएएस का मुखौटा उतारकर देखोगी तो मेरा परिचय याद आ जाएगा।” घर लौटकर वह चुपचाप लेट गई। मां ने पूछा तो ‘तबियत खराब है’ का बहाना बनाकर वह अपने कमरे में चली गई। कैसे बताती कि वर्षों से उसने अपने चारों तरफ जो एक मजबूत दीवार खड़ी कर रखी थी, किसी ने उस दीवार में छेद कर झांकने की गुस्ताखी कर दी है।

ख्यालों में आईएस का मुखौटा उतारकर वह महोबा के महादेवी राजकीय कन्या महाविद्यालय में पहुंच गई। परीक्षाओं, खेलकूद व वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में वो हमेशा शीर्ष पर रहती। इसी कारण अपनी सहेलियों के बीच वह ‘अपराजिता’ के नाम से मशहूर थी। निवेदिता के प्रथम आने का सिलसिला तब से ठहर सा गया, जब उसी स्कूल में राघवेंद्र ने प्रवेश लिया। साधारण बेमेल सी वेशभूषा, बालों में तेल चुपड़ा रहता और बोलचाल निपट देहाती। हर परीक्षा में दोनों को समान रूप से पहला स्थान प्राप्त करते देखकर एक दिन एकांत में राघवेंद्र ने अपना दिल खोल दिया, “निवि, पिछले कुछ समय से हम दोनों हर क्षेत्र में सफलता के पायदान पर समान रूप से खड़े हैं। क्या हमारा ये साथ हमेशा के लिए नहीं हो सकता?” ”शीशे में अपनी शक्ल भी देखी है? कपड़े पहनने तक का तो शऊर नहीं है और मेरा हाथ थामने की गुजारिश कर रहे हो?” राघवेंद्र की आंखें छलछला आयीं। शिष्टाचार से बोला, “निवि, तुम भी इंसान के बाहरी रूप को ही देखती हो? इंसान के भीतरी गुणों का तुम्हारी नजर में कोई कीमत नहीं है?” निवेदिता का मन पश्चाताप से भर उठा, आखिर वह इतनी निष्ठुर कैसे हो गई! शायद इसके पीछे उस ‘अपराजिता’ को हर क्षेत्र में राघवेंद्र से मिल रही चुनौती की कड़वाहट और किसी तरह पछाड़ने की अतृप्त अभिलाषा ही मुख्य कारण थी। बोली, “देखो, मुझे गलत मत समझना, तुम्हारे घरवालों ने तुम्हें अपनी शिक्षा पूरी करने के लिए शहर भेजा है। पहले कुछ बन जाओ, फिर इन बातों की तरफ ध्यान देना।” निवेदिता सफलता के सोपान चढ़ती हुए आईएएस बन गई। एक नई जिंदगी मिलते ही पुराने साथियों से संपर्क बिल्कुल टूट ही गया। सच तो यह था कि उसने इन संपर्क सूत्रों को जिंदा रखने की कोशिश भी नहीं की, फिर ये दुस्साहसी कौन था? वो अपने अंदर एक अजीब सी बेकरारी महसूस कर रही थी। धीरे धीरे इस बेकरारी ने बेचैनी का रूप ले लिया। जब-तब अपने नीचे काम करने वाले अधिकारियों पर बरस पड़ती। एक शाम उसके मोबाइल पर एक मैसेज उभरा, "निवि, क्या हो गया है तुम्हें? अपने प्रशासन को कुशासन में मत बदलो। खुद को टटोलने की कोशिश करोगी तो अपने भीतर एक असहाय नारी नजर आएगी तुम्हें, जिसने जीतोड़ मेहनत के बाद खुद को आईएएस बनाया, लेकिन बदले में तुमने उसे क्या दिया, अधूरेपन का अभिशाप? हो सकता है, तुम खुद को अधूरा न मानती हो, पर इस बात से इनकार नहीं कर सकती कि प्रकृति ने स्त्री और पुरुष को एक दूसरे का पूरक बनाया है। हो सकता है, तुम्हें किसी की जरूरत न हो, पर ये भी तो हो सकता है कि किसी और को तुम्हारी जरूरत हो। जब तक मेरे प्रश्नों का उत्तर नहीं खोज लोगी, तुम्हें शांति नहीं मिलेगी। प्रकृति के नियमों को स्वीकारना ही पूर्णता की परिभाषा है और जीवन की अंतिम परिणति।" सच तो यह है कि उसके अंदर की स्त्री ने अनजाने में नहीं, बल्कि जान बूझकर अपने जीवन की आवश्यक सूची में से ‘वैवाहिक जीवन’ नामक के शब्द को दूर हटा दिया था। ऐसा नहीं कि वह शादी नहीं करना चाहती थी, पर सत्ता और शक्ति पाने की हवस के आगे ये प्राकृतिक लालसा पीछे हट गयी थी। अपने अंदर स्फूर्ति लाने के लिए उसने शीशे में अपना चेहरा देखा, तो चांदी के तार से चमकते कई बाल उसका मजाक उड़ा रहे थे। उनका अस्तित्व पहले ही से था या समय ने उसको हराने की ठान ली थी। ऊहापोह की स्तिथि से वह जब तक बाहर निकलती चेयरमैन साहब आर. वी. धीर का फोन आ गया, “विश्व बैंक की टीम के साथ आपको कान्हा फॉरेस्ट चलना होगा। कोई विशेष तैयारी...?” ”जी नहीं, जब भी चलना चाहें मै तैयार हूं।” शाम पांच बजे ऑफिस की गाड़ी में धीर साहब आ गए। वो निवेदिता से एक वर्ष सीनियर आईएस थे। निवेदिता की उनसे ये दूसरी मुलाकात थी। कान्हा अतिथि ग्रह में उन दोनों के रहने का इंतजाम किया गया था। रात में अलाव के इर्द गिर्द अन्य स्टाफ के लोगों ने कविता पाठ और मजाकिया जोक्स सुनाकर उनका खासा मनोरंजन किया।

अचानक केयर टेकर ने निवेदिता से पूछा, “मेमसाहब, जानती हैं यहां के आदिवासियों के पिछड़ेपन का सबसे बड़ा कारण क्या है?” ”नहीं” ”इनके समाज में पुरुषों को हमेशा हेय दृष्टि से देखा जाता है।” निवेदिता ने कश्यप साहब की ओर देखा जो, कॉफी की चुस्कियां लेते हुए केयरटेकर की बात बड़े ध्यान से सुन रहे थे। ”खुद को श्रेष्ठ समझने का जो पाप इन लोगों ने किया है उसका दंड उनका समाज आज तक भुगत रहा है।” केयर टेकर के जाने के बाद धीर साहब ने पूछा, “क्या सोच रही हो अपराजिता?” चौंक पड़ी निवेदिता, फिर वही पुराना नाम? ”मुझे नहीं पहचाना तुमने? मैं हूं आर. वी. धीर,” चेयरमैन साहब ने अपना चश्मा उतारते हुए कहा, “तुम्हारा पुराना सहपाठी।” ”सॉरी, मैं आपको पहचान नहीं पायी।” ”कैसे पहचानती? तुमने जिस राघवेंद्र को देखा था, वह तो बालों में तेल चुपड़े रहता था, उसे बात करने की तमीज नहीं थी।” ”आप मुझे शर्मिंदा कर रहे हैं।” ”निवेदिता, तुम्हारी वो डांट मेरे लिए प्रेरणा बन गई। तुम्हारे पीसीएस में चयन होने के एक वर्ष में ही मेरा चयन आईएस में हो गया। संकोचवश तुमसे मिलने के लिए आ नहीं सका। जब किस्मत से मेरा ट्रांसफर तुम्हारे ऑफिस में हुआ तब पुरानी यादें ताजा हो गईं।” ”तो कंप्यूटर पर मैसेज आप ही भेजा करते थे?” ”तुम्हारा अपराधी हूं, लेकिन यकीन मानो मुझे आज भी तुम्हारा इंतजार है, तुम्हारे बिना मैं आज भी अधूरा हूं।” ”अधूरे आप नहीं मैं हूं,” निवेदिता ने दर्द भरे स्वर में कहा। ”ये तुम कह रही हो?” ”बहुत थक गई हूं इस अकेलेपन से लड़ते-लड़ते, एक बार मेरी मदद नहीं करोगे?” निवेदिता ने अपना हाथ राघवेंद्र की तरफ बढ़ाते हुए पूछा, तो राघवेंद्र जी ने उसका हाथ कस कर थाम लिया। एक सुखद एहसास और तृप्ति की भावना दोनों के चेहरे पर चमक उठी।

-पुष्पा भाटिया

E-इश्क के लिए अपनी कहानी इस आईडी पर भेजें: db.women@dbcorp.in

सब्जेक्ट लाइन में E-इश्क लिखना न भूलें

कृपया अप्रकाशित रचनाएं ही भेजें