एक भूल की सजा:सुधाकर पत्नी के सामने अनुपमा को घर ले आता, उसके लिए फैसला लेना मुश्किल हो रहा था

3 महीने पहले
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छह गज की सोने की जरी के बॉर्डर वाली गुलाबी रंग की भारी रेशमी साड़ी में रेणुका बहुत प्यारी लग रही थी। सोने के आभूषण उसके शरीर पर चमक रहे थे और कलाई में दमकती हीरे की चूड़ियों से उसके चेहरे पर भी एक खास रोशनी फैल जाती थी। बगल में बैठा उसका दूल्हा बार-बार उसके मेहंदी सजे हाथों को पकड़ रहा था। वह उसे निहारे ही जा रहा था और हम सब सहेलियां उसे छेड़ रही थीं।

बहुत अजीब बात है न कि शादियां जहां चेहरों पर हंसी-खुशी ले आती हैं, मन खिल-खिल उठता है, वहीं दूसरी ओर अधूरेपन की याद भी दिला देती हैं। रेणुका की शादी में मैं बहुत खुश थी। उसे अपना प्यार मिल गया था। लेकिन अपने साथ सुधाकर को न देख मन में कसक उठ जाती थी। कितना नाची थी रेणुका उसकी और सुधाकर की शादी में, लेकिन आज वह उसकी शादी में अकेले आई है। आठ महीने बाद ही उनके बीच जैसे सब कुछ बिखर गया था।

मेरी जिंदगी में सब कुछ होने के बावजूद, यानी अच्छी नौकरी, अच्छे, दोस्त, शहर की अच्छी कोलोनी में खुद का घर, फिर भी अकेला और उदास महसूस करती हूं, सुधाकर के जाने के बाद।

रेणुका को लगता था, या कहूं हर किसी को लगता है कि चूंकि मैं अकेली हो गई हूं, इसलिए मैं डिप्रेशन का शिकार होने लगी हूं। लेकिन मैं यह कहते हुए खुद को डिफेंड करती हूं कि सुधाकर जैसे आदमी के साथ रहने से बेहतर है कि मैं अकेली रहूं। सुधाकर से अलग होने के बाद मैंने खुद से वादा किया कि कभी उससे बात नहीं करूंगी, उसके बारे में सोचूंगी नहीं। लेकिन ऐसा हो नहीं रहा था।

जितना अधिक मैंने उसके बारे में सोचने से बचती, उतना ही उसके बारे में सोचने लगती। वह बहुत स्मार्ट था। उसके नैन-नक्श गढ़े हुए लगते, आम पुरुषों की तरह मोटी नाक या लटकते हुए होंठ नहीं थे। उसके मर्दाना चौड़े कंधे, लंबा कद और सबसे बढ़कर, उसकी गहरी और मंत्रमुग्ध करने वाली आवाज, जिस पर मैं बुरी तरह मरती थी।

लेकिन शादी के बाद मुझे समझ आ गया था कि इतना आकर्षक आदमी हमेशा के लिए मेरे जैसी लड़की के साथ नहीं रहेगा, जो इतनी औसत दिखती है।

शादी के जल्दबाजी में लिए गए फैसले के पहले कुछ महीनों के बाद, जीवन सुंदर था। मेरे जीवन में एक पुरुष था जिसे मैं कभी खोना नहीं चाहती थी। लेकिन मेरे प्रति उसका आकर्षण जल्दी ही खत्म हो गया जब उसकी मुलाकात हद दर्जे की खूबसूरत और सेक्सी बिंदास अनुपमा से हुई।

उसके साथ बीते पल मुझे हमेशा याद आते रहेंगे, यह उससे अलग होने के बाद मैं जान चुकी थी। उसके साथ रहते हुए भी मैं हम दोनों के बीच आने वाली दूरियों को महसूस करने लगी थी। शादी के बाद मेरा आकार भी बड़ा हो गया था। कुछ किलो वजन में बढ़ोतरी हुई थी।

लेकिन आपके जीवनसाथी को धोखा देने का यह कोई बड़ा कारण तो नहीं होना चाहिए। प्यार करने के लिए वजन या शरीर का आकार-प्रकार कोई पैमाना नहीं हो सकता। मैं शिक्षित थी, अच्छी नौकरी करती थी और उसे मेरे साथ किसी तरह की हीनता का बोध हो, ऐसी कोई वजह मुझे नजर नहीं आती थी। न तो मैं उसके दोस्तों के बीच मिसफिट थी, न ही उसकी पार्टियों में।

हालांकि, यह स्पष्ट था कि उसके और मेरे विचार पूरी तरह से विरोधी थे, जिन्हें मैं स्वीकार या बर्दाश्त नहीं कर सकती थी। मतभेद होते रहते थे, पर यह वैवाहिक जीवन को अंत कर देने का कोई ठोस कारण नहीं माना जा सकता। लेकिन ऐसा हुआ। मनभेद की वजह हमारे मतभेद नहीं थे, बल्कि अनुपमा थी।

वह कई बार अनुपमा को घर भी लेकर आया था बतौर कुलीग। लेकिन वह जिस तरह इतराती थी और सुधाकर के नजदीक बने रहने की कोशिश करती, उससे हमेशा मेरे मन में खटका लगा रहता।

सुधाकर से पूछती तो वह दस कमियां मुझमें निकालकर इसे मेरे मन का वहम करार कर देता। कभी-कभी वह मुझे सलाह देता कि मुझे किसी मनोचिकित्सक से अपना इलाज कराना चाहिए। मैं समझ रही थी उसके इरादों को, पर सच्चाई को स्वीकारने से कतराती थी।

बस कुछ कागजों पर हस्ताक्षर करने से सब झटके से खत्म हो गया। अभी एक महीना ही हुआ है सुधाकर से अलग हुए। मैंने अपने आपको पूरी तरह से काम में खपा दिया है। मैनेजमेंट मेरे काम से बहुत खुश है। फिर भी डिप्रेशन हावी हो ही जाता है।

सुधाकर ने अनुपमा से शादी तो नहीं की है, वे दोनों लिव-इन में रह रहे हैं। उसने शादी नहीं की, जानकर सुकून भी होता है। हालांकि जानती हूं कि मैं उसके पास कभी लौटकर नहीं जाऊंगी और उसका मेरे पास लौट आने का तो सवाल ही नहीं उठता।

एक बुरा विवाह भविष्य तय नहीं कर सकता, या उसे तय करने नहीं देना चाहिए। हो सकता है आगे कुछ सुखद होने वाला हो, मैं अपने आप को बीच-बीच में यह बात समझाती रहती हूं।

शादी में खाना इतना स्वादिष्ट था कि लगा जैसे साथ में सुधाकर का न होना मुझे अब बुरा नहीं लग रहा है। मेरी फ्रेंड्स जानती हैं कि खाना मेरा स्ट्रेस बस्टर है, इसलिए बार-बार मेरे लिए कुछ न कुछ लेकर आ रही थीं।

रेणुका की विदाई के बाद थोड़ा रोकर, थोड़ा उसे छेड़ने के बाद मैं घर चली गई। रेणुका काफी देर तक मुझसे लिपट कर रोती रही। वह हमेशा से ही मुझे लेकर चिंतित रहती थी। हमारी दोस्ती सबसे बड़ी धरोहर थी हम दोनों के लिए।

शादी की गहमागहमी और मस्ती करके आने के बाद घर का सन्नाटा ज्यादा ही खल रहा था। केवल सन्नाटा, या कोई और बात… पेट हद से ज्यादा भर गया था। एक अजीब सी घबराहट महसूस हो रही थी। मैंने हौले से अपने पेट पर हाथ रख दिया। फैसला ले चुकी थी मैं…

ब्लैक कॉफी का कप हाथ थामे हुए मैंने अपने अपार्टमेंट की खिड़की से बाहर झांका। मैं सोच रही थी कि जिस सुधाकर को मैंने दीवानों की तरह चाहा, जिस पर अपने से ज्यादा भरोसा किया, उसे समझने में मुझसे कैसे और क्योंकर भूल हुई।

लेकिन एक भूल के बाद मैं दूसरी भूल करने को तैयार नहीं थी। मेरे हाथ में अभी भी प्रेग्नेंसी टेस्ट की स्ट्रिप थी। माना मेरे अंदर जो पल रहा था, उसमें सुधाकर के साथ-साथ मेरा भी अंश है, लेकिन… आंखों से आंसू बहने लगे।

नहीं, मैं इस बच्चे के लिए तैयार नहीं हूं। अभी तो बिल्कुल भी नहीं, और सुधाकर के बच्चे के लिए तो बिल्कुल भी नहीं। मैं इस बार खुद को किसी तरह का धोखा नहीं देना चाहती।

- सुमना. बी

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