खूबसूरती का घमंड:जिस शरीर पर उसे नाज था आज उसकी हालत ऐसी है कि अपने तन से नफरत होने लगी उसे

6 महीने पहले
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हाथ बार-बार वहीं चला जाता था। एकदम सख्त गांठ थी। गांठ को छूते हुए उसके इर्दगिर्द की गोलाइयों का स्पर्श करता हुआ उसका हाथ दो पल के लिए कांपा। रिपोर्ट आने की देर भर है, बस फिर सब कुछ बदल जाएगा। उसका सौंदर्य, उसकी छरहरी काया, उसकी सुखी जिंदगी।

कितनी अजीब बात है न कि सौंदर्य की परिभाषा कुछ ही मिनटों में औजारों की पैनी धार के संपर्क में आते ही बदल जाती है। मात्र कुछ उपकरण प्रकृति के साथ खिलवाड़ करने की ताकत रखते हैं। सौंदर्य हो तो अभिमान आ ही जाता है। अभिमान करना भी चाहिए। बिस्तर से उठ वह शीशे के सामने जा खड़ी हुई। इस वक्त उसने स्कर्ट और ढीला-सा टॉप पहना हुआ था, फिर भी कसाव और एक-एक कटाव का बोध किसी पारदर्शी कांच की तरह प्रदर्शित हो रहा था। उसके परिचित, मित्र, कुलीग यहां तक कि पल्लव भी इस बात को कहता है कि उसकी फिगर एकदम परफेक्ट है। सबके सामने कहने से भी नहीं चूकता, ''माई वाइफ इज मिक्सर ऑफ ब्यूटी एंड ब्रेन।’’ उस वक्त उसकी आंखों में गर्व होता है।

''बहुत कम पति ऐसे होते हैं जो अपनी बीवी की खूबसूरती की तारीफ करते हैं। ही रियली लव्ज यू।’’ मानसी अक्सर कहती।

''नॉट ओनली लव्स हर, बट एडोर ओल्सो,’’ सुमेधा भी मानसी के साथ सुर मिलाने लगती।

''तुम दोनों ऑफिस क्या मेरी सुंदरता पर थीसिस लिखने आती हो या काम करने?’’ वह उन्हें प्यार से डांट तो देती, पर कहीं न कहीं असीम सुख की अनुभूति से भर जाती।

''इस पर तो हर तरह का कपड़ा फबता है,’’ मम्मी कहतीं।

पल्लव उसकी नाजुक कमर को बांहों में कस कहता, ''आखिर है किसकी बीवी?’’ शादी के इतने वर्षों बाद भी पल्लव के छूने भर से उसके चेहरे पर लालिमा बिखर जाती है।

अपनी फिगर को परफेक्ट बनाने व अपने हर अंग को कसे रखने के लिए वह भी तो कितनी मेहनत करती है। 35 वर्ष की हो गई है वह। चेहरे से लेकर पूरा जिस्म किसी कुशल कारीगर की छेनी से तराशा लगता है। बच्चा बहुत कोशिशों पर भी नहीं हुआ तो इस बात का इश्यू बनाने के बजाय दोनों ने एक तरह से चुप्पी साधकर अपने मन को समझा लिया था। अब तो खैर बच्चा होने की बात वह सोच भी नहीं सकती।

टॉप पर से सरकते हाथ फिर से गांठ पर जाकर रुक गए। अंदाजा तो हो ही गया है उसे। हालांकि रिपोर्ट कल आनी है। उसी के बाद अंदाजे पर यकीन की मोहर लग पाएगी। अचानक यह सब क्यों कर और कैसे हो गया। कल के बाद जैसे उसकी सुंदरता पर खालीपन और बेडौल होने का शाप चिपक जाएगा। प्यार के अंतरंग क्षण तक कितने बेमानी हो जाएंगे। अपनी लहराती केश राशि को उसने मुट्ठी में बांध जूड़े की तरह सिर पर ठहरा दिया। मानो वह बहते हुए तमाम वेगों को रोकना चाह रही हो।

पल्लव और उसके रिश्तों की गहरी आंच जो आज तक सुख और सुकून का पर्याय बनी हुई थी, कल रिपोर्ट आने के बाद भीषण आग का रूप न ले ले। दिव्या सिहर उठी। दर्द के साथ-साथ इस बार डर की भी फांस उसे भीतर तक दहला गई। जब से यह गांठ उसके शरीर पर उभरी है, पल्लव के बर्ताव में उसे कोई अंतर नजर तो नहीं आया, लेकिन वही एक दूरी बनाकर रखने का प्रयत्न करने लगी थी। कहां उसे पल्लव के सीने पर लगे बिना नींद नहीं आती थी और कहां अब वह पलंग के किनारे इस तरह आंख बंद कर लेट जाती है, मानो गहरी नींद में हो। पल्लव के पास आने, उसके चेहरे को चूमने को वह महसूस करती है, पर कोई प्रतिक्रिया नहीं करती। उसकी मनःस्थिति को वह बखूबी समझता है, लेकिन वह उसके साथ भी अपना दुख शेयर करने से घबराने लगी है।

''घबराने की कोई जरूरत नहीं, तुम कतराने लगी हो। पल्लव से ही नहीं हम सबसे भी। सब तुम्हारे अपने हैं, दर्द समझते भी हैं और दर्द में साथ देने को तैयार भी हैं, लेकिन तुम ने ही अपने को समेट लिया है। दर्द के सारे सैलाब में खुद ही कूदने की तैयारी कर ली है।’’ मानसी ने उसके निरंतर होने वाले टेस्ट की बात सुनने के बाद कहा था।

''तुम कोई अनोखी तो नहीं, जिसके साथ ऐसा हो रहा है। फिर आजकल तो यह बहुत मामूली बात है। अगर कंफर्म हो भी जाता है तो सर्जरी के बाद जीवन खतम नहीं होता,’’ सुमेधा ने भी उसे समझाने की कोशिश की थी।

कोई उसे लाख समझाए, यह तो तय है कि सर्जरी होते ही उसके सौंदर्य का तिलिस्म शीशे की तरह चूर-चूर हो जाएगा। पल्लव का सारा गर्व मात्र उपहास बनकर रह जाएगा।

''मेरे प्यार में कोई कमी नहीं आएगी। तुम्हारे शरीर की सुंदरता से कहीं ज्यादा मेरे लिए तुम मायने रखती हो। मेरा वजूद तुम्हारे बिना कुछ नहीं है,’’ पल्लव ने उसे अपनी बांहों में भर चूमा था।

दिव्या किसी की भी बात से मन को समझा नहीं पा रही थी। वह आशंकित थी, भयभीत थी और जिस्म से कट जाने वाले हिस्से को लेकर सशंकित भी।

डॉक्टर के केबिन में बैठे हुए उसके माथे पर पसीने की बूंदें चमक उठीं। ठंड में पसीना, पल्लव ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

''यह गांठ कैंसर ही है। हमें जल्दी से जल्दी आपकी राइट ब्रेस्ट रिमूव करनी होगी। यू विल बी ऑल राइट दिव्या इन ए मंथ और सो। डोंट वरी,’’ डॉक्टर ने प्रोफेशनल अंदाज में कहा और रिपोर्ट पल्लव को पकड़ा दी।

''सर्जरी कब करेंगी?’’ पसीने को पोंछते हुए दिव्या ने पूछा।

'नेक्स्ट वीक।’’

बस एक और हफ्ता…

घर आकर कमरे का दरवाजा बंद कर लिया दिव्या ने। पल्लव ने बहुत आग्रह किया खोलने के लिए पर वह तो जैसे बुत बन गई थी। शीशे के सामने बैठे-बैठे रोए जा रही थी। क्या होगा उसके परफेक्ट फिगर का। अब तो उसे कटे अंग के लिए कृत्रिम आवरण को लपेटना होगा। कैसा क्रूर मजाक किया है नियति ने उसके साथ। सिल्क का एक ब्लाउज निकालकर उसने पहन लिया। कितने खूबसूरत हैं उसके उभार, पर कुछ दिनों बाद वहां होगी सपाट जमीन।

व्यर्थ है जीवन अब। सर्जरी की प्रक्रिया के दौरान उसने पल्लव से एक दूरी बना ली थी। अंग के साथ-साथ मानो उसने भावनाओं के सेतु भी काट डाले हों। होश आने पर पीड़ा की अनंत लहरों के साथ-साथ हाथ फिर वहीं जाकर ठहर गया। कोई गांठ नहीं थी, कोई उभार नहीं था, सपाट जमीन भर थी। पल्लव ने उसके सिर पर हाथ रखा तो उसने मुंह फेर लिया। बिना किसी गलती के भी वह उसे सजा दे रही है, यह वह जानती थी।

उसके बाद वह मशीन की तरह काम करती, अपने को व्यस्त रखती। न संवरने का मन करता न ही अपने मन और शरीर को संभालने का। पल्लव के साथ बीते सुख के क्षणों को याद तो करती पर उन्हें दुबारा जीवित करने का प्रयास नहीं कर पा रही थी। पल्लव का प्यार उसके प्रति और बढ़ गया है, यह देख वह ग्लानि से भर जाती। उसका मन होता वह उसे खूब-खूब प्यार करे, पर अपने अधूरेपन के आगे विवश हो अपनी इच्छाओं का गला घोंट देती। पल्लव के धैर्य ने उसे एक दिन पिघला ही दिया। पलंग के किनारे से हट वह उसके सीने से जा लगी।

''आई एम प्रेगनेंट,’’ उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था। खुशी से उसका मन थिरकने लगा था। पल्लव के बांहों के सुरक्षित घेरे में अपने इन पलों को महसूस करते-करते अचानक दिव्या उससे छिटककर दूर जा खड़ी हुई।

''नहीं, मैं अपने अधूरेपन के साथ इस बच्चे को जन्म नहीं दे सकती। क्या कहूंगी मैं उससे कि मैं उसे अपने दूध से सींचने की क्षमता नहीं रखती। अपने सीने से कैसे लगाऊंगी उसे। मेरा खालीपन उसे चुभेगा नहीं। नहीं, मैं मां बनने के काबिल नहीं,’’ दिव्या के मन में खिलीं सारी कोंपलें मुर्झा गईं।

''डोंट बी फूल दिव्या। सारे बच्चे तो मां का दूध पीकर ही बड़े नहीं होते हैं,’’ डॉक्टर की बातें भी उसे तसल्ली नहीं दे पाईं। ''मुझे समझ नहीं आता कि इतनी पढ़ी-लिखी होकर भी तुम कैसे ऐसी बातें सोच पा रही हो?’’

''मैं एक औरत भी हूं, डॉक्टर। अपूर्ण औरत तो हो ही चुकी हूं, पर अधूरी मां नहीं बनना चाहती।’’

''किसने कहा तुम अधूरी हो। तुम अब भी उतनी ही सुंदर हो, पूरी हो दिव्या।’’ पल्लव की आंखों में पहले जैसा ही गर्व का भाव था।

शिशु को गोद में लेते ही न जाने कैसी पूर्णता उसने अपने अंदर महसूस की। अपने सीने से कसकर चिपटा लिया उसे।

''इसके लिए दूध की बोतल लेकर आता हूं’’ बहुत हिम्मत कर पल्लव ने कहा।

''कोई जरूरत नहीं,’’ दिव्या का गाउन गीला हो गया था। उसे महसूस हो रहा था मानो सहस्त्रों धाराएं फूट पड़ी हों।

''तुम सचमुच सुंदर हो,’’ पल्लव ने कहा तो दिव्या के चेहरे पर अनगिनत गुलाबों की लालिमा बिखर गई। फिर से एक बार अपने पर अभिमान करने को जी चाहा उसका।

- सुमन बाजपेयी

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