E-इश्क:लड़का इस बात से परेशान था कि लड़की को गंदा वॉशरूम इस्तेमाल करना पड़ रहा था

7 दिन पहले
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वह एक बड़े महानगर का एक छोटा फ्लैट था। माचिस के डिब्बे सरीखा। ऐसे डिब्बे इस महानगर की विशेषता थी।

उस फ्लैट में दो कमरे थे। कमरों को इस तरह बांटा गया था कि उसमें कम से कम चार-छः अनजाने लोग एक साथ रह सकें। फ्लैट के मालिक ने इसे बैचलर्स हॉस्टल में तब्दील कर दिया था और रेल की तरह बंक बेड लगा दिए थे। एक के ऊपर एक।

फ़्लैट के एक कमरे में तीन लड़के थे, दूसरे में दो लड़कियां। सब अस्थायी किस्म की नौकरियों वाले। बैचलर और जॉब की आपाधापी में व्यस्त। इस महंगे महानगर में इस तरह रहना उन्हें सस्ता पड़ता था। बस यहां एक दिक़्क़त थी। रसोई और शौचालय साझा था। हालांकि साझी रसोई परेशानी का सबब नहीं था। सबने टिफिन लगा रखा था। असली दिक्कत थी, लड़कों के साथ शौचालय साझा करना। लड़कियों के लिए यह असहज करने वाला था। लेकिन जब फ्लैट मालिक ने लड़कियों को आश्वस्त किया कि लड़कों की तरफ से कोई दिक़्क़त नहीं होगी, क्योंकि वे रात की नौकरियों वाले लोग हैं तो लड़कियां मान गयीं।

हुआ भी यही। जब तक लड़के अपने ऑफिस से लौटते, लड़कियां निकल चुकी होतीं। रविवार को छोड़ शायद ही कभी उनकी मुलाकात होती। इसलिए इतने लोगों के रहने पर भी फ्लैट कभी भरा हुआ नहीं लगता।

इस तरह रहते हुए सबको करीब तीन महीने हो गए थे। कभी कोई गड़बड़ी नहीं हुई। लड़के-लड़कियां दोनों इस माहौल के आदी हो गए थे। लेकिन दिक्कत तब शुरू हुई जब लड़कों की रात वाली पाली खत्म हो गयी। अब सुबह शौच से लेकर नहाने-धोने के लिए सबको इंतजार करना पड़ रहा था। तिस पर लड़के वॉशरूम की हालत खराब कर देते। लड़कियां सफाई पसंद थीं। लड़कों के निकलने के तुरंत बाद उन्हें गंदा वॉशरूम इस्तेमाल करना पड़ता। लड़कियों के सामने एक और चुनौती थी। नहाने के लिए उन्हें अपने सारे कपड़े वॉशरूम में ले जाने पड़ते। वे गीले वॉशरूम में ही ऑफिस के कपड़े गिरते-पड़ते पहनतीं।

लड़कियों ने अपनी परेशानी मालिक को बतायी। फ़्लैट मालिक ने कुछ उपाय करने का आश्वासन दिया। लेकिन यह केवल आश्वासन साबित हुआ।

लोरिक सांगा रांची का घुंघराले बालों वाला एक आकर्षक युवक था। वह फर्राटेदार अंग्रेजी बोलता था और एक कॉल सेंटर में काम करता था। उसने लड़कियों को परेशान देखा तो अपने फ्लैट के लड़कों को समझाया कि वे सुबह लड़कियों के उठने से पहले वॉशरूम का काम निपटा लिया करें। नहाने के बाद वाइपर से पानी हटा दें। और खड़े होकर पेशाब न करें। उस समय तो दोनों लड़कों ने हामी भर दी, लेकिन अगले दिन वे आठ बजे तक सोते रहे। और फिर वही हुआ, ऑफिस के ऐन वक्त पर वॉशरूम के लिए भीड़ और इंतजार।

लोरिक ने देखा, फ्लैट की सबसे कम बोलने वाली लड़की, जिसकी उसने आज तक दो-चार दफे से ज्यादा आवाज नहीं सुनी थी, नहाने जाने का इंतजार कर रही थी। वॉशरूम का दरवाजा खुला और एक लड़का जिसका नाम संदीप शर्मा था जो एमबीए के बाद कहीं सेल्समैन का काम करता था, अजीब तरीके से गमछा लपेटे निकला। लोरिक ने लड़की की तरफ देखकर कहा, “प्लीज..” और उसे पहले जाने का आग्रह किया। वह मुस्कुराकर भीतर चली गयी। संदीप ने वाइपर से पानी नहीं हटाया था और वॉशरूम किसी झील में तब्दील हो गया था। इसके पहले कि लड़की भीतर जाकर दरवाजा बंद करती, लोरिक ने “एक्सक्यूज मी..” कहते हुए उसे रोका। लड़की ने उसे सवालिया नजरों से देखा। लोरिक ‘बस एक मिनट’ कहता हुआ उससे बाहर आने का आग्रह किया। जब वह बाहर आयी, लोरिक अंदर घुसा। उसने वाइपर से पानी निकाला और बाहर आकर मुस्कुराता हुआ लड़की से कहा, “अब आप जा सकती हो।“

उस दिन लोरिक ने संदीप से वाइपर न मारने की शिकायत की। संदीप झगड़ने लगा। उसने कहा, उससे इतना नहीं होगा। अगला जाए और साफ करे। लोरिक समझ गया, उसे समझाने का कोई मतलब नहीं था।

दूसरे रोज भी यही हुआ। संदीप नहाकर निकला। वाइपर लोरिक ने चलाया। लेकिन अबकी लड़की ने उसे मना किया कि वह कर लेगी।

तीसरे दिन लोरिक ने लड़कियों के कमरे के दरवाजे को हल्का नॉक करते हुए कहा, “वॉशरूम साफ है। अभी लड़के सो रहे हैं। आप लोग चली जातीं तो अच्छा होता। दो मिनट के बाद दरवाजा खुला। सामने वही लड़की खड़ी थी, जम्हाई के साथ मुस्कुराती हुई। उसने अधखुली पलकों को झपकाते हुए कहा, “थैंक यू”।

उस शाम जब हल्की बूंदाबांदी हो रही थी, संयोग से वह बस स्टॉप पर मिल गयी। लोरिक ने ‘हाय’ किया तो उसने मुस्कुराकर उसका जवाब दिया। फिर दोनों चुप हो गए और पैदल अपनी बिल्डिंग की तरफ चलने लगे। कुछ देर की चुप्पी को लड़की ने तोड़ा, “मेरा नाम स्मिता है।”

“मैं लोरिक... लोरिक सांगा।”

“जानती हूं।“ लड़की ने कहा।

लोरिक ने उसे आश्चर्य से देखा। “कैसे?”

“फ़्लैट ऑनर ने बताया था। कहा था, कोई दिक्कत होगी तो फ़्लैट में महेंद्र सिंह धोनी के गांव का एक लड़का है, लोरिक। उसको बोलना, वह मदद करेगा। अच्छा लड़का है।“ लड़की मुस्कुरा रही थी।

लोरिक हंसने लगा। “मैं धोनी के गांव का नहीं हूं। मेरा घर पलामू है। रांची से कुछ घंटे दूर। लोग पलामू नहीं जानते तो सीधे रांची बोल देता हूं। और बाई द वे, रांची गांव नहीं है। राजधानी है झारखंड की।“

लड़की मुस्कुराई, “मुंबई वालों को मुंबई के बाहर की सारी जगहें गांव लगती हैं।“

यह उनके बीच दोस्ती की पहली शुरुआत थी। लड़की ने जाते-जाते अपना नंबर दिया था।

अगले दिन शनिवार का सूरज निकला था। नौकरीपेशा लोगों के लिए यह दिन एक खुशनुमा दिन होता है। लड़की जाग गयी थी, लेकिन आलस के मारे कुनमुना कर बिस्तर में पड़ी थी। तभी सिरहाने रखा उसका मोबाइल हल्का वाइब्रेट हुआ। उसने देखा, एक नए नंबर से व्हाट्सअप पर एक मैसेज था। उसने मैसेज खोला। लिखा था, ‘वॉशरूम क्लीन है, इसके पहले कि लड़के गंदा करें, नहा लो।’ नीचे लिखा था, लोरिक सांगा, धोनी के गांव का लड़का।

लड़की मुस्कुराई और मुस्कुराती रही।

- मिथिलेश प्रियदर्शी

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