E-इश्क:जो खुद जिंदगी था, उसकी जिंदगी की इतनी कम उम्र? ये सोचकर हिमानी पूरी तरह टूट चुकी थी

17 दिन पहले
  • कॉपी लिंक

एलेक्सा, प्लीज प्ले- 'बहती हवा सा था वो, उड़ती पतंग सा था वो, कहां गया उसे ढूंढो...' जैसे ही कोयल ने ये कहा, उस गाने की आवाज और उसके लिरिक्स हिमानी के दिमाग में पुरानी यादों को खींच लाए। केबिन में बैठी हिमानी उस गाने को सुनते ही कुछ साल पहले के दौर में पहुंच गई। गाने को सुनते हुए वह मुंह में पेन लेते हुए बुदबुदाने लगी कि सचमुच ऐसा ही तो था, सूरज। हमेशा मस्ती में रहता। खुद बच्चे जैसी हरकतें करता और बच्चों के इर्द-गिर्द ही रहता।

हिमानी से सूरज की मुलाकात तब हुई थी, जब वह लाइफ में निराशा के दौर से गुजर रही थी। मेडिकल एंट्रेंस एग्जाम में हिमानी सिलेक्ट नहीं हो पाई थी और बस रोए जा रही थी। सोच रही थी कि एक डॉक्टर की बेटी को ही अगर मेडिकल में एडमिशन न मिले, तो लोग क्या कहेंगे? यही सोचकर हॉस्पिटल के टॉप फ्लोर पर जा खड़ी हुई थी। कूदने के लिए जैसे-जैसे कदम बढ़ा रही थी, एक आवाज़ आकर हिमानी के कानों में टकराई, 'कुदरत ने सभी को अवसर दिए हैं और वह आज़माइश भी करती है, लेकिन हकीकत तो हकीकत है। दुख-सुख, अच्छे-बुरे… जिंदगी जैसी भी मिले, उसके हर एक लम्हे को एंजॉय करो।'

'कौन हो तुम?'

उसने कहा, 'जिंदगी...'

ये कहकर वह भाग गया, पर हिमानी के दिल पर दस्तक दे गया। हिमानी नीचे उतर आई और रात भर उसके बारे में सोचती रही। हिमानी उसका ठीक से चेहरा नहीं देख पाई, क्योंकि उस दिन बहुत कोहरा था। दूसरे दिन वही आवाज हिमानी के कानों में फिर से टकराई। मुड़कर देखा तो सफेद कोट पहनकर मरीजों को हिदायत दे रहा था 'जिंदगी'- 'दवा समय पर खाओ, एक्सरसाइज़ ज़रूर करना… खाने में ये लेना समझे..'।

हिमानी ने सोचा पापा ने शायद कोई नया डॉक्टर अपॉइंट किया है। उसकी आवाज में मासूमियत घुली हुई थी, जो हिमानी को दीवाना बनाकर उसकी तरफ खींचे जा रही थी। दिन हो या रात, हिमानी अब पापा के हॉस्पिटल में किसी न किसी बहाने से आने-जाने लगी। वो 'जिंदगी कभी हिमानी को ड्रेसिंग करता मिलता, तो कभी किसी बीमार बच्चे के साथ खेलता हुआ। कभी किसी बुज़ुर्ग के साथ जोक्स क्रैक करता रहता। वह सचमुच 'जिंदगी ही था और ऐसा जिंदादिल इंसान भी, जो अपने आसपास हंसी की चादर ओढ़े रहता। उससे भला दिल कैसे न लगता। उसने जिंदगी के लिए हिमानी का नजरिया ही बदल दिया था।

एक दिन सूरज हिमानी से कॉरिडोर में टकरा गया। अरे, आप तो वही हैं न...। हिमानी ने कहा और आप ‘जिंदगी। फिर दोनों कुछ देर हंसते रहे। उसने बताया कि उसका नाम सूरज है। उस दिन से सूरज उसकी जिंदगी ही बन गया था। हिमानी का सूरज को देखने का सिलसिला ऐसे ही कई महीने तक चलता रहा। हिमानी उससे बात करने को हमेशा की कोशिश करती, पर उसके आसपास मरीजों की भीड़ देखकर आगे नहीं बढ़ पाती। विंडो में लगे शीशे से ही उसको दूर से वेव कर देती। कभी वो वेव पहले करता, तो हिमानी का दिन बन जाता।

एक दिन देर रात लगभग 2.30 बजे के करीब लैंडलाइन पर ट्रिन-ट्रिन की आवाज़ हुई। फोन के बाद से लैंडलाइन कम ही बजता था, पर काफी देर तक ट्रिन-ट्रिन की आवाज ने हिमानी को उठा दिया। उसने फोन रिसीव किया। फोन के दूसरी तरफ घबराई हुई नर्स जूली ने बताया कि सूरज की तबीयत बहुत खराब है। सर कहां हैं? उनका मोबाइल नहीं लग रहा। सर यानी मेरे पापा डॉ. अतुल। हिमानी ने जूली से कहा, वह तुरंत पापा को बता रही है। फोन का रिसीवर रखने तक हिमानी की हार्ट बीट जैसे रुक-सी गई। पापा को जैसे ही बताया, वह तुरंत हॉस्पिटल भागे।

हिमानी भी उनके पीछे भागी, पर पापा ने कहा तुम कहां जा रही हो? पापा, वो सूरज...। पापा तेजी में थे, उन्होंने कहा, हां तुमने बता दिया।

सुबह 8 बजे पापा घर लौटे। मां को पापा ने बताया कि सूरज हमेशा के लिए ढल गया। पास खड़ी हिमानी एकदम से नीचे गिर गई। फिर हिमानी को उठाने जैसे ही पापा आए। हिमानी ने अपने दिल का हाल पापा को बता दिया। पापा गंभीर होते हुए बोले, मैं भी बहुत ख़ुश होता ऐसा दामाद पाकर, पर सूरज कैंसर पेशेंट था। एक दिन उसको डूबना ही था। यहां उसका इलाज चल रहा था। हमारी पूरी टीम को पता था कि उसके पास ज्यादा वक्त नहीं है। खुश रहने के लिए वह कभी बच्चा, कभी डॉक्टर और न जाने क्या-क्या बन जाता था।

हिमानी के पैरों तले जमीन खिसक गई। वह जिसे डॉक्टर समझती थी, वो मरीज़ निकला। जो खुद जिंदगी था, उसकी खुद की जिंदगी की इतनी कम उम्र? ये सब सोचते हुए हिमानी अब पूरी तरह टूट चुकी थी। तेरहवीं की रस्म पर पापा हिमानी को सूरज के घर ले गए। तस्वीर में भी वह खिलखिला रहा था। ऐसा लगा, जैसे कह रहा हो कि इस खिलखिलाहट में ही जिंदगी है। अपने अंदर इस खिलखिलाहट को हमेशा संजोकर रखना और यूं ही चहचहाती रहना। उस रोज हिमानी ने अपने दामन में प्यार की मीठी खुशबू को ताउम्र के लिए समेट लिया।

इस बात को पूरे 10 साल गुजर गए। आज भी उसके लबों की मुस्कुराहट हिमानी के मन में बसी है। उसकी हंसी को उसी के अंदाज में डॉक्टर बनकर दूसरों के जीवन में बिखरने की कोशिश में जुटी है हिमानी। हॉस्पिटल में एक कमरा 'जिंदगी’ नाम से है, जिसमें कैंसर पेशेंट बच्चों की सेवा खुद डॉ. हिमानी करती हैं। 'जिंदगी’ रूम में कोयल ने एलेक्सा पर अगला गाना प्ले किया, 'नगमे हैं, शिकवे हैं, किस्से हैं, बातें हैं...बातें भूल जाती हैं... यादें याद आती हैं...।'

- गीतांजलि

E-इश्क के लिए अपनी कहानी इस आईडी पर भेजें: db.women@dbcorp.in

सब्जेक्ट लाइन में E-इश्क लिखना न भूलें

कृपया अप्रकाशित रचनाएं ही भेजें