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अरे कुछ अक्ल है या घास चरने गई...:सास ने चिल्लाते हुए बहू से कहा, रोज-रोज के ताने और ड्रामे से बहू और इकलौते बेटे की जान गई

3 महीने पहले
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बहू...ओ बहू...कहां मर गई…कमला ने आवाज लगाई.. वो अभी सारा काम निपटाने के बाद नहाने के लिए गई थी और सास की हर दो मिनट में ऐसी आवाज सुनने की उसकी आदत पड़ चुकी थी, जरा सी नजरों के सामने से हटी कि सास चिल्लाना शुरू कर देती। इस बार आवाज कुछ ज्यादा तेज थी। कोई अनहोनी न हो गयी हो, उसने जैसे तैसे अपने ऊपर दो मग पानी डाला और कपड़े पहन कर बाथरुम से दौड़ते हुए सास के कमरे में पहुंची। अरे मरी, तुझसे एक काम भी ठीक से नहीं होता, कमला देवी फिर चिल्लाई। क्या हुआ मां जी उसने ने डरते डरते पूछा। हुआ क्या है? दिखता नहीं कमबख़्त, ये कमरे में पानी पड़ा है, आज पोछा नहीं लगाया था क्या? अभी कहीं मैं गिर जाती तो मेरी हड्डी पसली टूट जाती! कमला देवी ने चिल्ला कर कहा। 'लगाया तो था मां जी' ! उसने धीरे से कहा। तो ये कहां से आ गया, हे भगवान मेरी तो किस्मत ही फूटी है, जो ऐसी लड़की पर मेरे बेटा लट्टू हो गया। न जाने कहां कहां से, बड़े बड़े घरों से उसके लिए रिश्ते आ रहे थे।

अच्छा अब चल जल्दी से इसे साफ़ कर दे, सास ने चिल्लाते हुए कहा। उसको पता था कि नहाने जाने से पहले ही उसने पूरा घर साफ़ किया और ये पानी जान बूझ कर उसकी सास ने ही उसे तंग करने और ताने सुनाने के लिए गिराया है। फिर भी उसने बिना कुछ बोले गिरे पानी को साफ़ कर दिया और अपने कमरे में आकर थोड़ा आराम करने बैठ गई और सोचने लगी, सास की चिल्लाहट अब कौन से काम के लिए बुलाने वाली होगी।

उसके लिए ये कोई आज की बात नहीं थी, जब से वो शादी कर इस घर में आयी थी, उसके पति के ऑफिस जाते ही ये रोज का नियम था। आज किसी बात पर, कल किसी बात पर। बस उसकी सास को एक बहाना चाहिए था, अगर नहीं मिलता था तो बहाने बनाने कि कला में वो माहिर थी।

इस रोज रोज की किचकिच से अक्सर वो तंग आ जाती थी, पर कुछ पति के प्यार, कुछ सास कि उम्र और कुछ घर की नई बहू होने की वजह से सब बर्दाश्त कर रही थी। उसे खुद ही समझ नहीं आ रहा था कि उसके खुद के वजूद में इतना परिवर्तन कब और कैसे आया। उसको यह भी याद नहीं की कब उसके अपने घर में उसकी मां या पिता ने कभी उससे ऐसे सुर में बात की। अपने कॉलेज और स्कूल के समय तो वो बिंदास लड़कियों में से एक थी। पूरे स्कूल या कॉलेज में, कहीं भी किसी के साथ कोई गलत बात होती थी तो वो लड़ने के लिए सबसे आगे खड़ी मिलती थी, किसी के भी हक़ के लिए वो पूरे सिस्टम से लड़ जाती थी, पर आज अपने ही खिलाफ हो रहे।

अन्याय को चुप चाप सह रही थी। सोचती थी क्या यही शादी के मायने होते हैं, जब एक लड़की को अपने स्वाभिमान और सम्मान को एक नए परिवार की सूली पर चढ़ा देना पड़ता है?

शाम को पति के आने पर बहुत सारी बाते कहने का मन होता था, एक दो बार कहीं भी थी पर एक तो थके होने से वो इस पर ज्यादा ध्यान नहीं देते थे और फिर अपनी मां के खिलाफ वो एक भी शब्द नहीं सुन सकते । उनकी मां भी अपने बेटे के सामने उस से बड़े दिखावे के साथ बात करती थी पर जैसे ही बेटा घर से बहार निकलता था, उनके तेवर बदल जाते थे, जो उसे समझ में ही नहीं आता था कि

एक इंसान पल भर में दो तरह के व्यवहार कैसे कर सकता है।

कमला देवी को सबसे ज्यादा तकलीफ तो उसकी शादी में मिले दहेज से थी, जबकि उसके माता पिता ने अपनी हैसियत से बढ़ कर उसकी शादी में खर्चा किया, लेकिन दहेज में या दूसरे से कुछ भी मुफ्त में मिलने की उम्मीदों और अभिलाषाओं का कोई अंत नहीं होता। हर चीज़ कम लगती है। और उसके आने पर सबसे पहले उन्होंने घर की महारिन की छुट्टी कर दी और घर में उसके कदम रखते

ही, हाथों की मेहंदी का रंग छूटने के पहले ही बाकी कामों के अलावा बाई के सारे काम भी उसके ऊपर आ गए। और कमला देवी ने कभी भी उसे एक नौकरानी से ज्यादा नहीं समझा।

कुछ ऐसे ही जिंदगी कट रही थी उसकी, रोज कोई नया बखेड़ा होता था और वो रोज शांति पूर्वक उन्हें संभालने की कोशिश करते हुए सोचती थी की जल्दी ही उसे अपने पति और सास के साथ बैठ कर शांति से इसका हल निकालना पड़ेगा पर बस रोज की ऐसी दिनचर्या में सबके साथ बैठ कर बात करने का समय नहीं मिल पा रहा था।

एक दिन वो रोज की तरह सुबह झाड़ू लगा रही थी, जब कमला देवी अपने बिस्तर के किनारे बैठी स्वेटर बुन रही थी, अचानक जैसे ही वह झाड़ू लगाते लगाते उसके पास पहुंची, उसने बिना कुछ देखे बहू को जोर से लात मारी और चिल्लाई,अरे कुछ अक्ल भी है या घास चरने गई है। जब मैं कुछ कर रही होती हूं, तभी तुझे काम सूझता है, अभी ही मेरे कमरे में झाड़ू लगनी थी तुझे, क्या तुझे नहीं पता कि मुझे धूल से कितनी एलर्जी है।

ये आज का नया बहाना था, उसे तंग करने का। क्योंकि घर में रोज ही ऐसे ही काम होते थे और पहले कभी भी ऐसी कोई बात नहीं हुई थी। फिर वो भी अपनी सास के व्यवहार को जानते हुए बहुत संभल के काम करती। वो उनके द्वारा दिखाई जगह पर सफाई के लिए जैसे ही थोड़ा झुकी, ना जाने किस झोंक में कमला देवी ने जोर से पैर चलाया और वह बहू के कंधे पर जा लगा, जब तक वो खुद को संभालती उसका सिर सामने की दीवार से टकराया और गिर पड़ी।

कमला देवी चिल्ला उठी, क्या हुआ कलमुंही, मर गयी क्या, उठ क्यों नहीं रही, बचा हुआ काम कौन करेगा, चल उठ, वो उनकी कुछ बातें सुन तो रही थी, पर समझ में कुछ नहीं आ रहा था और बड़ी हिम्मत करके जैसे तैसे वो उठने की कोशिश कर ही रही थी कि कमला देवी ने फिर ठोकर मार दी और सिर दोबारा दीवार से टकरा गया, इस बार बहू बेहोश हो गई थी। सास बड़बड़ाते हुए उसे कोसती रही, जब नहीं उठी, तो कमला देवी के हाथ पांव फूलने लगे और तुरंत अपने बेटे को घर आने के लिए फ़ोन किया।

पति उसे तुरंत हॉस्पिटल ले गया, तो कमला देवी भी साथ साथ आयी और एडमिशन कराने के समय भी बड़बड़ाए जा रही थी, सब पता है इसके त्रिया चरित्र का, सब करके कराने के और मुझे तंग करने के नाटक हैं। इसके जिससे घर में कोई काम न करना पड़े और हम सब इसकी सेवा करें।

यूं तो उसका बेटा काफी दिनों से घर में जो चल रहा था सब देख और समझ रहा था, पर आज मां के ऐसे व्यंग देख कर कुछ ज्यादा ही परेशान हो गया, लेकिन इस समय उसे अपनी पत्नी की जान बचाने की पड़ी थी। डॉक्टर कि तमाम कोशिशों के बावजूद, सिर के अंदर कोई नस फट जाने से पहले तो वो कुछ दिन कोमा में रही और अगले एक ही सप्ताह में उसने दुनिया छोड़ दी।

वक्त के साथ साथ बातें कहां छुपती हैं, धीरे धीरे पड़ोसियों की जुबान पर उसके प्रति, कमला देवी के बुरे बर्ताव की बातें सामने आने लगी, जिसमें कमला देवी के बेटे का भी नाम आ ही जाता था और जब उसको लेकर बातें कुछ ज्यादा बढ़ने लगीं, तो उनसे तंग आकर एक दिन कमला देवी के इकलौते बेटे ने पंखे से लटक कर सुसाइड कर ली।

अब पूरे घर में दिन भर सन्नाटा रहता था, कमला देवी कुछ दिनों तक लोगों को दिखाई पड़ती रही और अक्सर घर के अंदर से उनकी आवाज़ें सुनाई पड़ती थी। अरे कलमुंही कहां मर गयी, मेरे बेटे को भी साथ ले गयी। चल जल्दी आजा बहू घर बहुत गन्दा पड़ा है, चल थोड़ा झाड़ू पोछा कर दे।

फिर उसी लय में रोते रोते उनकी आवाज़ सुनाई पड़ती थी, बहुत अच्छी बहू थी, कभी शिकायत नहीं करी उसने, अभी हॉस्पिटल में है, ​​​​​​​इलाज़ चल रहा, मेरी वजह से उसका सिर फट गया था न, मेरे बेटा भी उसी के पास है, लेकिन अब तो वो ठीक हो गयी होगी, अरे कोई तो उन दोनों को वापस ले आये, अबकी उसे कुछ नहीं कहूंगी।

कुछ दिनों के बाद पता लगा कि उनके किसी दूर के रिश्तेदार ने उस मकान को आने पौने दामों में किसी को बेच दिया था, क्योंकि कमला देवी के पागलखाने में भर्ती होने के बाद उस मकान को देखने वाला कोई नहीं बचा था।

-संगीता खरे

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