पति की बेवफाई का सबूत:सविता के ईमेल से पति के अफेयर का राज खुला, दीना इस रिश्ते को अंजाम तक पहुंचाना चाहती है

4 महीने पहले
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दीना ने ईमेल पढ़ा। उसकी पलकें भीगती गईं और पता नहीं कब ऐसा लगा जैसे कोई ग्लेशियर पिघलकर झरना बनने लगा हो। तभी सुकेश ने कमरे में प्रवेश किया और चौंक पड़े, “क्या हुआ? क्या पढ़ रही हो? ऐसा क्या है...”

दीना अचकचा गई। उसने झटके से ईमेल बंद किया और खुद को समेटने लगी, “कुछ नहीं, एक मार्मिक कहानी है और कुछ नहीं..” शुक्र है, सुकेश को कोई शक नहीं हुआ।

“तुम भी न! इतना सेंटीमेंटल होना भी ठीक नहीं,” कहते हुए वे मुड़ गए तो दीना ने चैन की सांस ली।

सुकेश के ऑफिस जाने के बाद दीना का दिल स्वार्थ और संवेदना के पहलवानों की लड़ाई का अखाड़ा बन गया। स्वार्थ कहता, ‘मूर्ख हो क्या? उस लड़की से अपने पति को मिलाने की बात सोच रही हो जिससे कभी उन्होंने टूटकर प्यार किया था? आज वो उससे नफरत करते हैं और तुम हो कि प्रेम की उस सरिता को दोबारा बहाना चाहती हो?’

पर संवेदना रह-रहकर कसक उठती। प्रेम की उस पावन मूर्ति को क्या जीवन के आखिरी क्षण में इतना भी अधिकार नहीं कि वो उसे देख सके जिसके लिए उसने जीवन भर त्याग किया, तपस्या की?

दीना, सुकेश और सविता एक ही कॉलेज में थे। सुकेश और सविता की प्रेम कहानी के बारे में थोड़ा-बहुत सुना तो था। शादी से पहले सुकेश ने बताया था सब कुछ। वो निश्छल प्रेम, वो उसे उसके घर से भगा लाने की योजना बनाना, तमाम खतरे उठाकर उसे उसके घर से निकालकर अपने घर तक लाना और वहां आकर उसका बताना कि वो किसी और को प्यार करती थी और उस तक पहुंचने के लिए मोहरा बनाया था सुकेश को।

फिर उस लड़के ने दरवाजा खटखटाया। सुकेश और उसके माता-पिता को स्तब्ध छोड़ दीना चली गई थी उसके साथ। दीना को सुकेश की इन बातों पर सहज विश्वास तो तब भी नहीं हुआ था। दीना सविता को जानती थी। व्यवहार से तो सात्विक प्रवृत्ति की लगती थी। अति कठोर अनुशासन में पली डरी-सहमी सी। पर सुकेश पर अविश्वास करने का भी कोई कारण न था। सबको पता था कि सविता अचानक विवाह करके कहीं चली गई थी।

और आज! आज ईमेल से पता चला उस दिन का सच। उसके घर वालों को पता चल गया था और उसके कट्टर धार्मिक चाचा पहुंच गए थे वहां। सुकेश और उसका पूरा परिवार पिस्टल के साए में था और उन्हें छोड़ने की शर्त थी भेजे गए लड़के के साथ घर लौट आना। वो जानती थी कि सुकेश सच जानकर जान दे देंगे पर उसे नहीं छोड़ेंगे। और ये भी कि उसके घर वाले किस हद तक जा सकते हैं। तो वही कहा जिससे वो उससे टूट जाएं।

ईमेल के अंतिम कुछ वाक्य प्रेम-तपस्या की गवाही थे… मैंने कभी विवाह नहीं किया। आप नेट पर सर्च करोगी तो मेरी संस्था के बारे में पता चल जाएगा, जिसमें सेवा करते हुए मैंने जीवन व्यतीत किया है। कैंसर की लास्ट स्टेज में हूं। शायद कुछ दिन बचे हैं। एक बार उन्हें देखने की आस है, अगर आप ठीक समझें तो। इसीलिए उन्हें मेल न करके आपको किया है ताकि जो उनके और आपके रिश्ते के हित में हो, आप वो निर्णय लें...

उनका हित? दीना समझती है कि उस शिद्दत से किए गए प्यार की नफरत उनके दिल में एक दर्द बनकर रहती है। तो क्या ये दर्द उनके दिल से निकाल देने में उनका हित है? शायद हां..और दीना स्वार्थ से ऊपर उठती गई।

सुकेश उसके बेड के पास पहुंचे तो दीना साथ थी। सुकेश की आंखें झरना बन गईं, “ये क्या हाल बना रखा है?”

उसकी आंखों में चमक आ गई, “बिल्कुल ठीक है। हाल को क्या हुआ? आंखें तो सलामत हैं न तुम्हें देखने के लिए। तुम्हें याद है, हमने एक नाटक में साथ काम किया था। उसमें लड़की कौवों को आमंत्रित करती है और कहती है- ‘कागा चुन-चुन खाइयो। दोऊ नैना मत खाइयो, इन्हें पिया मिलन की आस…’ कहते हुए उसकी पलकें स्थिर हो गईं।

सुकेश के साथ दीना की पलकें भी झरना बन गईं।

- भावना प्रकाश

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