E-इश्क:इस सफर ने दोस्ती के बीज बो दिए उनके बीच, अजनबी सा लगने वाला शशांक उसे अपना लगने लगा

7 महीने पहले
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अतीत की धरोहरों के बारे में जानने और उनका इतिहास खंगालने का जुनून उसे न जाने कहां-कहां ले जाता है। हिस्ट्री में एम.ए. करने के बाद उसके पैरो में जैसे पहिए लग गए हैं। पी.एच.डी. के लिए भी तो विषय तलाशना है। कई बार सोचती है कि भारत का कोना-कोना छानने के लिए एक पूरी जिंदगी भी कम है। हर कोने में पूरी की पूरी एक विरासत खड़ी है। सौ के नए नोट पर छपी रानी की वाव (बावड़ी) की फोटो देख चली आई थी पाटन। गुजरात की भूमि तो उसे वैसे भी बहुत रंगीला बना देती है।

सर्दियों की चटकीली धूप में वह सात मंजिला रानी की वाव की सीढ़ियां उतरती जा रही थी। मारू-गुर्जरा वास्तुशिल्प शैली में बहुत ही नायाब व योजनाबद्ध ढंग से बनी वाव की दीवारों पर बने पटोला साड़ी के डिजाइन देखे जा सकते हैं। सुना था कि यहां से 30 कि.मी. लंबी रहस्यमयी सुरंग भी निकलती है, जो पाटन के सिद्धपुर में जाकर खुलती है। इस खुफिया रास्ते का इस्तेमाल राजा और उसका परिवार युद्ध के वक्त करते थे। नजरें घूम रही थीं कि कहीं तो वह गुफा दिखाई दे रही थी। गाइड तो बस किसी मशीनी रोबोट की तरह बोलता जा रहा था।

वह उसे पीछे छोड़ अकेले नीचे उतर गई। अपनी आंखों में और कैमरे में वह खुद ही उस स्थापत्य कला को कैद कर लेना चाहती थी। बारीकी से अवलोकन न करे तो उसे अपना ज्ञान ही अधकचरा लगता है।

“फोटोग्राफर?” एक स्वर गूंजा। आवाज में भी संगीतमय सुर लहराते हैं। ऐसा लगा बावड़ी में बनी नागकन्या और योगिनी जैसी सुंदर अप्सराओं की कलाकृतियां अभी थिरकने लगेंगी।

“नॉट प्रोफेशनल फोटोग्राफर, शौक है।” वह अभी भी फोटो खींच रही थी। डायरी में लगातार नोट करती रहती है और जो छूट जाता है उसे बाद में फोटो देखकर लिख लेती है।

“संभलें, आखिरी सीढ़ी पर हैं,” चेताया उसने। ठिठक गई मंजरी। इस बार ध्यान से देखा। बाप रे कितना लंबा है। छह फुट 2 इंच तो होगा। उसके सामने मंजरी की पांच फुट छह इंच की काया बौनी लग रही थी। घुंघराले बाल, नाक के ऊपर किसी नजर के टीके की तरह आसन्न तिल। खादी का कुरता और जींस। कोल्हापुरी चप्पल और चेहरे पर एक बिंदासपन था। केयरफ्री अंदाज कह सकती है। हाथ में पीतल का कड़ा पहना हुआ था। उसका कैमरा देख समझ गई थी कि प्रोफेशनल फोटोग्राफर है।

“बच गई, वरना बावड़ी के न जाने कितने पुराने पानी में गोते लगा रही होती,” झेंप मिटाने के लिए वह जोर से हंसी।

“मैं गिरने नहीं देता। वैसे भी परफेक्ट स्विमर हूं। मेरे साथ सुरक्षित हैं आप।”

कुछ अजीब लगा। ‘मेरे साथ?’ न जान, न पहचान, लंबू मियां करें सलाम! वह अपनी तुकबंदी पर फिर से हंसी।

वह ऊपर चढ़ती हुई सीढ़ियों पर जाकर बैठ गई।

“एक कॉन्टेस्ट के लिए फोटो खींच रहा हूं।” वह उसकी बगल में आकर बैठ गया। वह डायरी में नोट्स लिखती रही।

“जानती हैं विश्वस्तरीय कॉन्टेस्ट है। उसमें फोटो सेलेक्ट हो गई तो मेरे कैरियर को काफी पुश मिलेगा,” वह अपनी ही रौ में बोलता जा रहा था।

“आप अतीत ही खंगालती हैं या वर्तमान में भी जीती हैं?” अचानक वह बोला। हिंडोले पर बैठकर जब झूलते हैं तो जो सुकून और सुरूर आता है, वैसे ही एक सुरूर ने उसे घेर लिया। डायरी बंद कर इस बार सारा ध्यान उस पर लगा दिया।

“मुझे गलत मत समझें। आपको फोटो खींचते देख सोचा कि आप इस फील्ड जुड़ी चीजें समझ सकती हैं। इसलिए बात करने लगा। आपको अन्कंर्फटेबल फील कराना नहीं चाहता था।” वह उठ गया।

”ऐसी बात नहीं। लिखने में इतनी तल्लीन हो जाती हूं कि...”

”बाहर बैठते हैं घास पर। धूप सुहा रही है,” उसकी बात पूरी होने से पहले ही वह बोला और सीढ़ियां फलांग गया।

असमंजस में पड़ गई। बैठ ही गई जाकर वह भी घास पर। दो मिनट सुन लेती है इसकी बातें। हो सकता है शेयर करने के लिए कोई न हो इसके पास।

“यह मेरा कार्ड है।”

शशांक शुक्ला, फोटोग्राफर, ब्लॉगर एंड ओनर ऑफ ‘इमेज्स ऑफ लव।’

“ईशा बजाज।”

जैसा कि होता है कि बातें शुरू होती हैं तो कड़ियां जुड़ती हैं और कोई न कोई धागा सिलसिले को बुनता जाता है। अहमदाबाद जाएगी और वहीं से कल मुंबई की फ्लाइट लेगी। उसे दिल्ली की फ्लाइट पकड़नी थी। कोई फोटो एक्जीबीशन थी, रहता वह बेंगलेरु में था। कैब से अहमदाबाद तक के इस सफर ने दोस्ती के बीज बो दिए उनके बीच। कुछ देर पहले अजनबी सा लगने वाला शशांक उसे अपना सा लगने लगा था। बिना खुद को थोपे, दूसरे की भावना को समझना उसके स्वभाव में है, यह समझना उसके लिए मुश्किल नहीं था।

रास्ते में उसने डायरी निकाली और परिवेश को शब्दों में उतारने लगी।

”डायरी में क्या हर बात लिखती हो?”

“कोशिश तो यही रहती है।”

“हमारी मुलाकात के बारे में लिखोगी?”

“सोचूंगी,” वह हंस पड़ी।

“तुम्हारी हंसी फूलों की पंखुड़ियों की तरह कोमल है और तुम खिले हुए गुलाब की तरह हो, जिस पर मचलने को ओस की बूंदें बेकरार रहती हैं।”

ईशा सिहर गई।

हवाई जहाज में खिड़की से झांकती धूप में अपने मन की बेचैनी को ताप देते हुए उसने डायरी में लिखा, ‘अतीत के झरोखे से छनकर आता वर्तमान।’

लौटते हुए अपने वर्तमान के साथ भविष्य भी बांध लाई थी। शशांक की आवाज के संगीतमय सुर उसे अभी भी सुनाई दे रहे थे। उसे लगा कि वह बावड़ी की सीढ़ियों पर खड़ी है, पर इस बार शशांक का हाथ थामे हुए।

- सुमन बाजपेयी

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