आज मैं चांद की हो जाना चाहती:ये रात तू गवाह है, मेरी उन नींदों की जो करवटें बदल-बदल कर काटी हैं...

2 महीने पहले
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खिड़की से झांकता चांद और मैं आज चांद की हो जाना चाहती हूं। ये रात तू गवाह है, मेरी उन नींदों की जो करवटें बदल-बदल कर काटी हैं मैंने… पर आज मैं चाहती हूं कि रात जरा थम-थम के गुजरे...सुगंधा ने अपने आप से कहा। सुगंधा आज खुश थी बहुत खुश...सुगंधा को अशोक से हमेशा शिकायत रहती थी कि वो उसे प्यार नहीं करते। सुगंधा के दिल में इस बात की हमेशा कसक बनी रहती कि उन्होंने कभी घुटनों के बल बैठकर सर झुकाकर एक हाथ को पीछे रखकर हाथ में सुर्ख गुलाब लेकर उसके सामने वो तीन प्यार भरे शब्द नहीं कहे।

अशोक के दोस्त विराज भी तो उसी के उम्र के थे, पर वो अपनी पत्नी से कितना प्यार करते, कहीं भी जाते तो दोनों पति-पत्नी एक जैसे ही रंग के कपड़े पहनते,विराज एक पल के लिए भी शोभा का हाथ नहीं छोड़ते। रोमांटिक किरदारों की तरह एक-दूसरे की आंखों में आंखें डाले दोनों अपनी ही दुनिया में खोये रहते। उनका...प्रेम विवाह हुआ था, जिसका परिवार वालों ने बहुत विरोध किया, पर बाद में सबकुछ ठीक हो गया। सुगंधा को भी तो ऐसा ही प्रेम चाहिए था, कोई उसे टूट कर चाहे पर...अशोक ने सुगंधा के कंधे पर कभी हाथ रखकर फोटो तक नहीं खिंचवाई।

वो जीवन भर पति में प्रेमी तलाशती रही, पर उसे वो ढूंढने पर भी नहीं मिला। उसे मिले तो सिर्फ अशोक...शादी के पहले खूबसूरत लम्बा कद,चौड़ा ललाट, रेशमी पलकों और मजबूत कंधों वाले पुरुषों को देखकर वो सहज ही आकर्षित हो जाती, शायद वो उम्र ही ऐसी थी। एक सजाधजा सा प्रेमी जो उसकी हां में हां मिलाए। चुटकियों में आसमान के तारे तोड़ लाने का वादा करे। दिन उसके कहे पर ढले और उसके कहे पर शाम हो, पर उसकी यह तलाश अधूरी ही रही। न उसे प्रेमी में पति मिला और न ही पति में प्रेमी...हर औरत अपने जीवन में कम से कम एक बार ये अवश्य चाहती है, कि कोई सजीला सा राजकुमार न सही वो हाड़-मांस का पुतला ही क्यों न हो। जो उसके मन की किवाड़ों को धीरे से खटखटाये और दिल के उस अथाह सागर में डुबकी लगाकर मन में हिलोरें मारे।

अचानक से आवाज से आई "धाड़…" हवा से टकराने खिड़की के टकराने की आहट से सुगंधा अपने सोच के दायरे से बाहर आई। अशोक के माथे पर बिखरे हुए बाल और कस कर सीने से दबाए तकिया, वो नींद में मुस्कुरा रहे थे। चादर तन से खिसकर जमीन पर पड़ी थी।सुगंधा ने दबे कदमों से अशोक की ओर बढ़ी और जमीन पर पड़ी चादर को उठा कर अशोक को उड़ा दिया।

नींद में कितने मासूम लग रहे थे वो…"क्या तुम मुझे प्यार नहीं करती।" शाम को चाय पीते वक्त यही तो कहा था उन्होंने… और वो अचकचा गई थी,जैसे अशोक ने उसकी चोरी पकड़ ली हो। आज शाम को वो फिर शिकायतों का पुलिंदा खोलकर बैठ गई थी। शोभा ने उसे फोन पर बताया था,विराज ने वैलेंटाइन डे पर उसे कितने सारे उपहार दिए। हर रोज एक नया उपहार लेकर वो उसे चौंका देता है। कुछ ही दिन पहले विराज उसे शहर के महंगे रेस्तरां में कैंडिल लाइट डिनर देकर आश्चर्य में डाल दिया था। सुगंधा कितना कसमसाई थी, "ये अंग्रेजों के चोचलें हैं" तुम भी किन झमेलों की बात करती हो।" अशोक की बात सुनकर सुगंधा चिढ़ गई थी, "आप से तो कुछ भी कहना ही बेकार है, विराज अपनी पत्नी से कितना प्यार करते हैं..." "पर क्या शोभा भी?" अशोक की बात सुन सुगंधा चौंकी। "सुगंधा! मैं शोभा को आज से नहीं बहुत पहले से जनता हूं, जब उन दोनों की शादी भी नहीं हुई थी। जानती हो, शोभा हस्बैंड के इस लापरवाही के व्यवहार से बहुत परेशान है। हर समय सरप्राइज के नाम पर पैसा पानी की तरह बहाना उसे भी पसंद नहीं, पर विराज का मन रखने के लिए वो खुश होने का नाटक कर करती है। वो आज भी प्रेमी बनकर ही जी रहा है। पति और पिता तो वो बन ही नहीं पाया। बचत के नाम पर ठन-ठन गोपाल है, उसने...कल का तो सोचा ही नहीं, वो आज में जीता है। भले ही उसका आज कल पर कितना ही भारी क्यों न पड़ जाये। बच्चे बड़े हो रहे हैं, उनके भविष्य का भी नहीं सोचता...घर और गाड़ी की ईएमआई अभी पूरी नहीं हुई हैं, और वो शहर के बीचों-बीच मकान खरीदने की सोच रहा है।"

" ये बात तो विराज ने यहीं घर पर कही थी तुम्हें याद है उसने क्या कहा था, ये बात शोभा को पता न चले । मैं उसे उसके जन्मदिन पर उपहार में देना चाहता हूं। आज मकान की बात वो शोभा से छुपा रहा है, पर पता नहीं वो कल और क्या-क्या छुपाएगा। पता नहीं आज तक क्या कुछ छुपाया हो।" अशोक की बात सुन सुगंधा सोच में डूब गई।

"सुगंधा! हमेशा प्रेमी बनकर कब तक रहा जा सकता है, कभी तो पति या पिता बनकर अपनी जिम्मेदारियां भी समझनी होगी। एक बात बताओ तुम मुझ से प्यार करती हो।" अशोक की बात सुन सुगंधा अचकचा गई,जैसे उसकी चोरी पकड़ी गई हो।

"शायद तुम्हारे पास आज इस बात का कोई जवाब नहीं पर मुझे पता है तुम मुझसे बहुत प्यार करती हो। हां ये बात अलग है कि ये प्यार रोमियो-जूलियट वाला नहीं, हीर-रांझा वाला भी नहीं और न ही लैला मजनू वाला है पर मैं ये यकीन से कह सकता हूं कि तुम मुझसे प्यार करती हो। सुगंधा मंत्र-मुग्ध सी अशोक की बात सुन रही थी।

"ऑफिस जाते वक्त मेरे बिना कुछ कहे बाथरूम में तौलिया, बेड पर रुमाल,मोजे,कपड़े और फ़ाइल रखने वाली तुम ही हो न...घड़ी की सुई पर डायनिंग टेबल पर नाश्ता रखने वाली तुम ही तो हो, पराठे थोड़े ठंडे, चाय एकदम गर्म और गुनगुने पानी का ध्यान रखने वाली भी मेरी सुगंंधा ही है...शाम को ऑफिस से लौटते वक्त जरा सी देर होने पर तुम्हारे मन की चिंता तुम्हें दरवाजे से गेट तक ले आती है। मायके जाने के चार दिन पहले से ही तुम सूखे नाश्ते बनाने लगती हो, अगर कहीं मुझे भूख लगे तब मैं क्या करूंगा।जबकि तुम जानती हो तुम जब घर पर भी होती हो, मैं खुद अपने हाथ से उठाकर कुछ नहीं लेता।

तुम नहीं चाहती कि ऑफिस की परेशानियों में उलझा मैं... घर की उलझनों से भी दबकर रह जाऊं। रिश्तों के रेशमी जाल को उलझने से पहले ही तुम सुलझा लेती हो।"

मां सही कहती थी माता-पिता द्वारा तय की हुई शादी में प्यार शादी के पहले नहीं बाद में होता है। सुगंधा एकटक अशोक को देख रही थी। अशोक ने कितनी सरलता से सुगंधा के प्यार को समझ लिया, पर क्या उसने भी...

"सुगंधा! विवाह एक अहसास है जो जीवन भर एक-दूसरे को कभी तन्हा नहीं होने देता।ज़रूरी नहीं कि कोई आपका हाथ पकड़ कर चले तभी आपके साथ है,ज़रूरी तो ये है कि कोई आपके पास मौजूद न होकर भी हमेशा आपके पास रहे। आपको कभी अकेला महसूस न होने दे..मेरे लिए तुम्हारा साथ कुछ इसी तरह का है।"

अशोक सच ही तो कह रहे थे,उनकी हंसी में उसकी खुशी कब शामिल हो गई उसे पता भी नहीं चला,अशोक के दर्द और तकलीफ में उसकी आंखें भी तो न जाने कब और क्यों नम हो जाती हैं। उनके आंसू उसके पलकों पर आकर आखिर क्यों ठहर जाते हैं... ये बस एक विश्वास है, जो आपको कभी कमज़ोर नही पड़ने देता। बस एक एहसास जो दो लोगो को आपस में जोड़े रखता है... हमारे बीच प्रेम नहीं था पर ऐसा कुछ तो था, जिसने हमें इतने सालों से बांधे रखा हुआ था। एक ऐसा बंधन जो खुशी में मजबूत और दर्द में और अधिक करीब ले आता। आज न जाने क्यों सुगंधा को टूटे हुए सपनों और आकांक्षाओं की चुभन महसूस नहीं हो रही थी। मन का उजास न जाने कब चुपके से उसके चेहरे पर पसर गया,आज सही मायने में उसे अपनी शादी का मतलब समझ आ गया था।

-डॉ. रंजना जायसवाल

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