बाइक से बढ़ी नजदीकियां:पति के शहर से जाते ही वंशिका को आजादी मिल गई, जॉन के करीब आना उसे अच्छा लग रहा था

2 महीने पहले
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आज वंशिका आराम से जगी। उसकी शादी के बीते छह महीनों में मयंक पहली बार शहर से बाहर गया है। ये दो दिन वंशिका के पूरे अपने हैं। इन्हें वो जैसे चाहे खर्च करे। उसके अपने दिन और अपनी रात। काली, ऊदी, चंदौसी रात और वंशिका की मन भर नींद। सुहावने मौसम वाला दिन जिसमें वो जी भर कर अपनी इच्छा से घूमे। उसने बिस्तर पर लेटे ही लेटे करवट ले ली।

खिड़की से आसमान दिख रहा था। तीन दिन से धूप नहीं निकली थी। कभी बारिश, कभी कोहरा, कभी बादल। सर्दियों के बादल। मीठे, उदास और मन मस्तिष्क में गुदगुदी करने वाले बादल। कभी गरजते, कभी बरसते और कभी सिर्फ बहते। सब कुछ मीठा-मीठा सा लग रहा है वंशिका को, लेकिन मयंक के बिना। आश्चर्य की बात है न? लेकिन ये सच है।

कभी-कभी नियमों को तोड़ कर भी जी लेना चाहिए। वैसे तो वह एक अच्छा पति है, लेकिन मयंक के साथ वो न जाने कितने नियमों से बंध जाती है। घड़ी की सुइयों के साथ बंध जाती है। अपने मन का कुछ भी नहीं हो पाता। सच, शादी के बाद वो अपने समय के लिए तरस कर रह गई है। अपना समय, अपने लिए समय यानी उसका ‘मी टाइम’।

वैसे वो मयंक को प्यार करती है, लेकिन इन पिछले छह महीनों में वंशिका एक पल भी अपने मन का नहीं जी सकी। आज बस इसीलिए वो खुश है। महक से मन भरा हुआ है। कब सुबह हुई, पता ही नहीं चला। उसने देखा घड़ी ने नौ बजा दिए थे। अखबार किवाड़ों की सेंध से झांक रहा था।

वंशिका ने आराम से बिस्तर छोड़ा। इत्मीनान से नहा कर उसने बड़े दिनों के बाद अपनी फेवरिट स्किनी जीन्स पहनी। फेडेड जीन्स और उस पर ढीला मैरून पुलोवर। धुले, रेशमी, भूरे बाल कंधों पर ऐसे ही खुले बिखरे रहे। न सिंदूर, न मंगलसूत्र। बस आज भर के लिए वो खुद को आजाद रखना चाह रही थी। पतले अधरों पर हल्की गुलाबी लिपस्टिक लगाई तो गोरा चेहरा और भी दमक उठा। आईना देखा तो स्वयं पर इतरा लेने को जी चाहा।

ग्यारह बजे तक दिन ही नहीं निकला इस कोहरे में। मेघ छाए हुए हैं पूरे आसमान में। सर्द, ठंडी हवा बह रही है, उड़ रही है। सुख ही सुख। जब लोग धूप के लिए तरस रहे हैं तब वंशिका इस मौसम को थैंक्स कह रही है। है न अजीब बात?

फिलहाल, सबसे पहले ऑटो करके वो ‘बुक कैफे’ ही गई। उसके घर से काफी दूर था ये बुक कैफे, लेकिन आज समय था उसके पास तो जाना ही था उसे। किताबें पढ़ना उसके लिए ऑक्सीजन जैसा होता है, ये मयंक क्यों नहीं समझता? डूब जाती है वंशिका कहानियों के संसार में। इस शहर के इस बुक कैफे में आज दूसरी बार आना हुआ है उसका। पिछली बार कुछ किताबें खरीदी थी जब वो मयंक के साथ आई थी। दो महीने हो गए, एक पन्ना भी पलटा नहीं गया। पढ़ने के लिए समय और माहौल भी तो होना चाहिए।

उसने शेल्फ से एक किताब उठाई और किनारे के काउच पर कुछ आराम से बैठ कर पढ़ने लगी। हल्का सा झुका हुआ सिर और किताब पर झुकी हुई आंखें। उसके कोमल से चेहरे के दोनों तरफ बालों की अमरबेल झूल आई थीं और उसका ये दमकता हुआ रूप किसी की आंखों में बस गया।

आधे घंटे तक वंशिका एक ही भंगिमा में बैठी किताब पढ़ती रही थी कि बेयरा और वो अजनबी एक साथ ही उसके पास आए। बेयरा तो कॉफी रख कर चला गया, लेकिन वो अजनबी अपना कॉफी का मग लेकर वंशिका के पास ही बैठ गया।

“हेलो!” इस समय वो वंशिका के बेहद निकट बैठा था। इतने निकट कि वंशिका को संकोच हो आया। उसने थोड़ा किनारे सरकना चाहा, लेकिन तब तक उस अजनबी युवक ने एक स्केच उसके सामने रख दिया, “आपकी तस्वीर!’’

वंशिका चौंक गई।

“आपने कब बना ली मेरी तस्वीर?’’ वो कुछ घबरा गई थी।

“सॉरी, लेकिन आपका पोज इतना प्यारा था कि मैं स्केच बनाने से खुद को रोक नहीं सका। वैसे मैं शौकिया स्केचिंग करता हूं। कुछ चार्ज नहीं करूंगा आपसे। ये मेरी तरफ से आपको गिफ्ट है।” उस अजनबी के चेहरे पर एक शरारती, तिरछी मुस्कान खेल गई।

वंशिका ने ध्यान से देखा। लगभग उसी का हमउम्र, गेहुएं रंग और घने बालों वाला एक आकर्षक युवक जिसकी निगाहें एकटक वंशिका के चेहरे पर टिकी थीं।

“मुझे जॉन कहते हैं। आप अपना नाम बताएंगी मुझे प्लीज।’’ उसकी आवाज में कुछ ऐसा था कि वंशिका का संकोच काफूर हो गया और वो मुस्करा उठी।

“जॉन अब्राहम?’’ वो खिलखिलाई और उसकी हंसी जॉन को मुग्ध कर गई।

“जी नहीं, जॉन लुईस,’’ वो पल भर को रुका, “आप हंसते हुए खूबसूरत दिखती हैं।’’

वंशिका लाल पड़ कर रह गई।

“आय एम वंशिका,’’ उसने अपना परिचय दिया।

“हम साथ बैठ कर कॉफी पी सकते हैं अगर आपको बुरा न लगे तो। थोड़ा समय आपके साथ बिताना अच्छा लगेगा मुझे।’’ वंशिका की मुस्कान बता रही थी कि उसे जॉन का साथ अच्छा लग रहा था।

कॉफी खत्म हो गई थी। वंशिका अपने वॉलेट की जिप खोल ही रही थी कि जॉन ने पेमेंट कर दिया।

“अब मुझे चलना चाहिए। आपकी बातों में तो समय का पता ही नहीं चल पाया।’’ वंशिका चलने को उठ खड़ी हुई।

बुक कैफे से वे दोनों साथ ही बाहर निकले। बाहर सर्दी थी और बारिश। दोपहर ढल रही थी और बादलों का रंग गहरा हो गया था। सहसा वंशिका चिंतित दिखी। वो बार-बार अपना बैग टटोल रही थी। सेल फोन नहीं था उसमें। सुबह से वो इतनी रिलैक्स थी कि अपना सेल फोन घर पर ही चार्जिंग में लगा हुआ भूल आई थी।

शुक्र है कि मयंक को बार-बार फोन करने की आदत नहीं है। बुक कैफे शहर के बाहरी इलाके में था। वंशिका के घर से करीब बीस किलोमीटर दूर। अपना मी टाइम इंजॉय करने के लिए वो दो जगह ऑटो बदल कर इतनी दूर चली तो आई थी, लेकिन अब जाने की मुसीबत थी। बुक कैफे जिस जगह था वहां बहुत भीड़भाड़ नहीं रहती। सुनसान सड़क थी, उस पर ये मौसम। न तो कोई टैक्सी दिख रही थी, न ही कोई ई रिक्शा।

“आप कहें तो मैं घर छोड़ दूं आपको। बाइक है मेरे पास,’’ जॉन ने प्रस्ताव रखा, “मुझे अच्छा लगेगा आपकी मदद करके।’’ उसने मुस्करा कर हाथ बढ़ाया और वंशिका ने उसका हाथ थाम लिया।

मन में सोचा शायद जॉन कुछ देर और उसके साथ रहना चाहता है, वरना उसके लिए कैब तो वो भी बुक कर सकता था। सोचते हुए वो मुस्करा दी। एक छिपी, दबी हुई मुस्कराहट।

जॉन की बाइक सड़क के उस पार किनारे पार्किंग में खड़ी थी। उसका हाथ थामे एक छोटी बच्ची की तरह वंशिका ने सड़क पार कर ली। बाइक की पिछली सीट पर वो जॉन से थोड़ा डिस्टेंस मेन्टेन करके बैठी थी। सहारे के लिए उसने अपना हाथ डिकी के कोने पर टिका रखा था।

वंशिका को अच्छा लगा कि इतने लंबे अंतराल में जॉन ने एक बार भी जानना नहीं चाहा कि वो विवाहित है या अविवाहित। कोई व्यक्तिगत प्रश्न नहीं।

“आपको अगर घर पहुंचने की बहुत जल्दी नहीं हो तो मैं पहले लंच कर लूं?’’ जॉन ने झिझकते हुए पूछा।

“क्यों नहीं, जरूर। कोई जल्दी नहीं मुझे। आपने लिफ्ट दे दी, वरना घर जाने में तो मेरी आफत आ जाती। सर्दियों में तो वैसे भी अंधेरा जल्दी होता है, लेकिन इस बुक कैफे का बड़ा नाम सुना था इसलिए मैं इतनी दूर चली आई। क्या पता था कि यहां आप मिल जाएंगे।’’ वंशिका एक बार फिर खिलखिलाई और जॉन उसकी मोहक हंसी देखता रहा।

“आप भी लंच करना चाहेंगी क्या मेरे साथ?’’

“हां, बिल्कुल। लेकिन इस बार पेमेंट मैं करूंगी।’’

“ठीक,” जॉन ने थम्सअप किया।

वंशिका का संकोच अब काफी हद तक दूर हो चुका था और अब वो जॉन से ऐसे बातें कर रही थी जैसे उसे बरसों से जानती हो। जॉन उसकी बातों को, उसकी हंसी को मह्सूस करके आनंदित हो रहा था। उसने अपनी बाइक पेट्रोल पंप पर रोक ली। पेट्रोल पंप के कैंपस में ही रेस्टोरेंट था। शांत माहौल, वर्दी पहने स्मार्ट वेटर्स, बहुत कम लोग।

लंच करके वे दोनों बाहर निकले। जॉन ने अपनी बाइक का टैंक फुल करवा लिया। ठंड और अंधेरा बढ़ने लगा। इस बार वंशिका बाइक पर बैठी तो उसने सीट के दोनों तरफ पैर लटका लिए। उसके हाथ जॉन की कमर के इर्दगिर्द कस गए। इस बार उसके हाथों का घेरा कुछ अधिक तंग था जिसे जॉन ने महसूस किया। उसका सिर जॉन की पीठ से टिका था। कुछ देर में उसने सिर को जॉन की पीठ से हटा लिया और उसके कंधे पर अपनी ठुड्डी टिका दी।

बाइक के मिरर में जॉन ने देखा उसकी आंखें बंद थीं और वो कोई गीत बिना बोलों के गुनगुना रही थी। ऐसा लग रहा था मानो जॉन के साथ बाइक की राइड उसे अच्छी लग रही है। उसके खुले, रेशमी भूरे बाल हवा में उड़ रहे थे। ये सुहाना सफर अच्छा तो जॉन को भी लग रहा था और वो वंशिका के प्रगाढ़ स्पर्श से आनंदित हो रहा था। वंशिका के पास से आती इत्र की भीनी महक उसे भी महका रही थी। उसका सानिध्य जॉन को रोमांचित कर रहा था। उसका जी कर रहा था कि ये सफर कभी खत्म न हो, चलता रहे, बस चलता रहे।

लेकिन मंजिल तो आनी ही थी। वंशिका ने जिस तरह रास्ता बताया था उसके हिसाब से वो लोकेशन आ चुकी थी। नेहरू अपार्टमेंट का बड़ा सा गेट सामने था। वंशिका ने अब बाइक पर बैठे हुए ही उससे एक सतर्क दूरी बना ली थी। गार्ड ने बड़ा सा गेट खोल दिया और बाइक अपार्टमेंट के भीतर चली गई। पता नहीं कैसे एक अंतर्ज्ञान के तहत जॉन ने ठीक लिफ्ट के सामने ही बाइक रोकी। वंशिका किसी कॉलेज गर्ल की तरह बाइक से कूद पड़ी। उसे इस तरह उतरता देख कर जॉन मुस्करा उठा।

“हम दोबारा कब मिल सकते हैं?’’

“ दोबारा? आज मन नहीं भरा क्या?’’ वंशिका इठलाई।

“मैं तुमसे बार-बार मिलना चाहूंगा, वंशिका।’’

“लेकिन मैं अब तुमसे कभी नहीं मिलूंगी।’’ वंशिका ने कहा तो जॉन का चेहरा उतर गया। वंशिका का जी किया कि वो जॉन को दुलार ले। लेकिन कुछ मर्यादाएं थीं, कुछ सीमाएं थीं जिन्हें तोड़ पाना असंभव था उसके लिए। आज का दिन उसकी स्मृतियों में हमेशा सुरक्षित रहेगा।

“जॉन, मेरी एक बात मानोगे?’’

“कहो न,’’ जॉन उदास हो आया।

“हम एक शहर में रहते हैं। हो सकता है कभी, कहीं भी, किसी जगह दोबारा हमारा आमना सामना हो जाए। ऐसा हो सकता है न ?’’ वंशिका की आंखों में प्रश्न था।

“हां, क्यों नहीं, हम मिल सकते हैं, जरूर मिलेंगे। मैं मिलना भी चाहूंगा।’’ जॉन उतावला था।

“लेकिन जब कभी मिलना तो प्लीज मुझे पहचानना मत,’’ वंशिका ने एक झटके से कह ही दिया, “क्योंकि मैं एक शादीशुदा स्त्री हूं और अपने पति से बहुत प्यार करती हूं,’’ कहते हुए वंशिका मुड़ कर तेजी से लिफ्ट के भीतर चली गई।

जॉन काफी देर तक अपने दुख में डूबा वहीं स्तब्ध सा रुका रहा। भीतर-बाहर एक अजीब, अनजाना सन्नाटा। उसके भीतर ठहरा हुआ दिन भर का सुख अब बदलने लगा था। आंखें डबडबा आई थीं।

- आभा श्रीवास्तव

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