E-इश्क:अंकित ने हौले से नेहा का हाथ छुआ तो वह सिहर उठी, मन हुआ कि उसे रोक ले

6 महीने पहले
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“एक्सक्यूज मी, क्या आपके पास सेफ्टी पिन होगा। साड़ी का पल्लू बार-बार सरक रहा है,” वह वॉशरूम से बाहर निकल रही थी, किसी ने पीछे से टोका।

चालीस-पैंतालिस साल की महिला थीं, जिनके चेहरे पर एक आभा थी। बैग टटोलकर मैंने पिन ढूंढा तो उन्होंने पल्लू सेट करने की गुजारिश की। वह बाहर निकलने ही लगी थी कि फिर एक सवाल गूंजा, “वर्किंग हो?”

“हां।” उसने संक्षिप्त उत्तर दिया। अपने बारे में ज्यादा बात करना उसे पसंद नहीं था।

“कहां काम करती हो?” एक और सवाल।

“इस मॉल की रिटेल मैनेजर हूं।”

“दैट्स वंडरफुल, बाई दे वे मैं पामिस्ट हूं। एस्ट्रोलॉजर भी। तुम्हारी हथेली पर नजर पड़ी थी। अच्छा हाथ है। कभी आओ,” उन्होंने झट से अपना कार्ड उसे थमा दिया।

“अच्छा समय चल रहा है तुम्हारा। प्रोफेशनल लाइफ बढ़िया है, लव लाइफ में कुछ परिवर्तन आ सकता है। मैं तो कहूंगी प्यार के मामले में कभी देर नहीं करनी चाहिए, वरना बाद में सिर्फ पछतावा ही हाथ आता है। उम्र हाथ से सरक जाती है। इनिशिएटिव लेकर देखो। चलती हूं। मन की बात कहने में हिचक कैसी।”

“कमाल है, न जान, न पहचान, भविष्य भी बांच दिया। लव लाइफ भी...” उसे हंसी आ गई।

काम करते-करते भी मन बार-बार उन्हीं शब्दों की ओर भाग रहा था, ‘इनिशिएटिव लेकर देखो।’

इनिशिएटिव लेने का क्या मतलब है? यानी जाए और उसका हाथ पकड़कर बोले कि वह उसे अच्छा लगता है, उसे उससे प्यार हो गया है। उसे मुझमें कोई दिलचस्पी हो या न हो, बस वह जाकर अपने दिल की बात उसे बता दे। जरूरी तो नहीं कि जिसे आप पसंद करो या चाहो, वह भी आपको चाहता हो।

अंकित का चेहरा उसकी आंखों के सामने घूम गया। उसके दिलो-दिमाग पर एक तिलिस्म की तरह छाता जा रहा है वह। पहली बार उसकी अंकित गुप्ता से मुलाकात एक क्लाइंट के रूप में हुई थी जो उनके मॉल में अपना शोरूम खोलना चाहता था। क्लाइंट की जरूरत के अनुसार स्पेस एलॉट करना और आवश्यक संसाधानों को उपलप्ध कराने जैसी औपचारिकताओं की वजह से वह मुलाकात मात्र एक बिजनेस डील से ज्यादा और कुछ नहीं थी। बेशक वह उसकी स्माटर्नेस और प्रोफेशनल एटिट्यूड की कायल हो गई थी। उसका बिजनेस काफी फैला हुआ था और यह शोरूम उसके बिजनेस का छोटा-सा एक्सपेंशन था। ऑ़डी जैसी बड़ी कारों में सफर करने और महंगे सूट व जूते पहनने और कीमती मोबाइल हाथ में पकड़े होने के बावजूद, था वह एकदम सहज। कोई घमंड नहीं था पैसों का।

डील फाइनल होने के बाद उसने कहा, “मिस पांचाल यू हैव एन एक्सीलेंट क्वालिटी ऑफ डीलिंग विद योर क्लाइंट्स। यू आर एन एक्सपर्ट इन एवरी डिटेल्स, आप जैसा इंसान तो हमारी कंपनी में होना चाहिए। बोलिए, जॉयन करेंगी हमारी कंपनी?”

उस वक्त उसके अंदर कुछ रंग-बिरंगे, चटकीले फूलों ने अपनी सुगंध फैलाई थी।

“एक कप कॉफी तो बनती है,” वह मुस्कुराया तो लगा जैसे उसके पूरे केबिन में एक उजास फैल गया है। स्मार्ट, गोरा, लंबा... हर तरह से परफेक्ट और सबसे बड़ी बात कि इतना अमीर होने का एहसास तो उसे छू भी नहीं रहा था।

“चलिए हमारे मॉल के ही बेहतरीन कॉफी कैफे में चलते हैं। वैसे आप मुझे नेहा कह कर बुला सकते हैं।”

अच्छा लगा था उसका साथ नेहा को। एक अच्छा दोस्त बन सकता था वह, पर उसने अपने और उसके बीच एक रेखा खिंची रहने दी, कहीं अंकित कोई गलत मतलब न निकाल ले। वैसे भी उन दोनों के बीच सामाजिक स्तर की एक लंबी दूरी थी। मिडिल क्लास के लिए उसकी दुनिया में अच्छा खाना और सलीकेदार जिंदगी जीना तो संभव था, पर शानो-शौकत और लक्जरी जैसे शब्दों के लिए उसमें जगह नहीं थी।

प्रोफेशनल होना निहायत जरूरी होता है, जिसके लिए अपनी भावनाओं को छुपाए रखना जरूरी है। पामिस्ट की बात सोच नेहा का मन हुआ कि वह अंकित को फोन करे।

तभी उसका मोबाइल बजा। “हेलो नेहा, अंकित दिस साइड, कैसी हैं? मैंने आपको डिस्टर्ब तो नहीं किया?”

नेहा का मन हुआ कहे कि वह चाहती है कि वह उसे डिस्टर्ब करे, पर खुद को संभालती हुई प्रोफेशनल अंदाज में बोली, “गुड, मिस्टर गुप्ता, कहिए आज हमारी याद कैसे आई? आप बहुत दिनों से आए नहीं?” एक ही सांस में वह सब पूछ गई। उसे डर था कि उसकी आवाज का कंपन कहीं उसके दिल का राज न खोल दे।

“थोड़ा बिजी था। पर आपने भी तो फोन नहीं किया,” दोस्त की तरह उलाहना दिया उसने। अच्छा लगा उसे, सहजता से कही गई ऐसी बातें संकोच और झिझक की दीवार गिरने में मदद करती हैं।

“आपने कभी कहा भी तो नहीं था फोन करने को,” उसने भी हंसते-हंसते उलाहना दिया।

“आप मुझे कभी भी फोन कर सकती हैं।” यह सुन नेहा को लगा कि कहीं उसके जोर-जोर से धड़कते दिल की आवाज वह न सुन ले।

“कहां आप इतने बड़े बिजनेसमैन और कहां मैं एक रिटेल मैनेजर, कहीं से आपका मुकाबला नहीं कर सकती, मिस्टर गुप्ता।”

“अंकित ही कहें मुझे। दोस्ती में ये पैसों की दीवार कब से आनी लगी, क्या हम दोस्त बन सकते हैं? चाहें तो कॉफी पीने आ सकता हूं।”

“इंतजार करूंगी।”

कॉफी पीते हुए उस महिला की ही बातें उसके कानों में गूंज रही थीं। वही इनिशिएटिव ले ले क्या, क्या वही कह दे..?

“नेहा, तुम अगर मेरी दोस्त बनना पसंद करो तो मुझे अच्छा लगेगा। सच कहूं, मैं जब भी किसी लड़की से मिलता हूं तो वह मेरे पैसों की वजह से मुझे इम्प्रेस करने में लग जाती है। तुम मुझे सबसे अलग लगीं।”

“किसी के बारे में इतनी जल्दी किसी निष्कर्ष पर पहुंचना ठीक नहीं,” नेहा मुसकराई।

“आखिर हमारी मुलाकातें ही कितनी हुई हैं, आप मुझे जानते ही कितना हैं।”

“जानती तो आप भी मुझे बहुत नहीं हैं, पर आपको देखकर लगता है कि आप मुझे पसंद करने लगी हैं। वैसे किसी को जानने के लिए बहुत सारी मुलाकातों का होना कोई जरूरी तो नहीं।”

अंकित की स्पष्टता से नेहा के गाल आरक्त हो गए। एक अजीब सी मदहोशी उस पर छाने लगी। नीले सूट में उसके सामने बैठा अंकित इस समय उसे किसी कामदेव से कम नहीं लग रहा था। सत्ताइस साल की नेहा को लगा कि वह सोलह साल की हो गई है। कैसे जान गया है वह उसके दिल की बात, कहीं वह चेहरा पढ़ने में तो माहिर नहीं?

“याद है मैंने कहा था कि आपको तो हमारी कंपनी में होना चाहिए, तो क्या आप ऐसा चाहेंगी? आई मीन, क्या तुम मुझे अपना थोड़ा वक्त देना पसंद करोगी? बेशक हमारी कंपनी न ज्वायन करो, पर मेरे साथ कभी-कभी कहीं बाहर घूमने तो चल ही सकती हो। मुझे अच्छा लगेगा।”

नेहा समझ नहीं पा रही थी कि यह सपना है या सच। वह तो खुद अंकित का साथ चाहती है।

नेहा की आंखों में तैरते प्रश्नों को पढ़ अंकित बोला, “परेशान न हों, टेक योअर टाइम। और हमारे बीच हाई क्लास और मिडिल क्लास जैसी बातों को नहीं आना चाहिए। चलता हूं,” अंकित ने हौले से नेहा के हाथ को छुआ तो वह सिहर उठी। मन हुआ कि उसे रोक ले।

“जाऊं मैं?” उसने ऐसे पूछा मानो कहना चाह रहा हो कि रोक लो मुझे।

दिल कह रहा था कि कह दे अपने मन की बात। इंद्रधनुषीय एहसासों की बांसुरी मधुर तान छेड़ रही थी, लेकिन चुप ही रही।

“चलता हूं।” इस बार अंकित ने उसके गालों को थपका।

“प्यार को हो जाने दो,” अंकित ने कहते हुए हवा में हाथ लहराया और कैफे से बाहर निकल गया।

- सुमन बाजपेयी

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