आगरा की छोरी:धाकड़ डॉली को जब इंस्पेक्टर अशोक की झड़प मिली, तो गुस्सा प्यार में बदल गया, मशहूर हो गई उनकी लव स्टोरी

3 महीने पहले
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आगरा में पेठे के अलावा कुछ फेमस था तो वो था डॉली का गुस्सा, और गुस्सा भी ऐसा कि धुरंधर से धुरंधर इंसान उसके गुस्से के आगे चाय कम पानी लगता।

डॉली आज बहुत गुस्से में घर से बाहर निकली थी।

"अब न जाने किसकी शामत आई है?" बड़ी काकी ने धीरे से कहा ।

हुआ यूं था कि डॉली कल रात अपनी स्कूटी रोड के पास ही पार्क कर आई थी और न जाने किस पुलिस वाले की इतनी जुर्रत हुई कि वो डॉली की स्कूटी उठा ले गया।

हाथ-पैर पटकते हुए जब डॉली पुलिस स्टेशन पहुंची तो थाने में एक युवा इंस्पेक्टर को देख कर हैरान रह गई। पुराने इंस्पेक्टर शर्मा जी का तबादला हो चुका था।

डॉली ने नए आए इंस्पेक्टर से ऊंची आवाज में कहा "मेरी स्कूटी कहां है? किसने हाथ लगाया उस पर?"

उसकी बातें सुन कर इंस्पेक्टर दंग रह गया और बोला, "मैडम शांत हो जाइए, ये पुलिस स्टेशन है, कोई जंग का मैदान नहीं कि आप बस लड़े जा रही हैं।"

डॉली से इस तरह पहले किसी ने भी बात नहीं की थी। इससे पहले वो समझ पाती कि क्या जवाब देना है, इंस्पेक्टर ने कुर्सी की ओर इशारा कर कहा, "बैठ जाइए और ये पेपर साइन कर दीजिए। आप पर हजार रुपए जुर्माना है वो भर दीजिए। फिर आप अपनी स्कूटी की चाबी राम सिंह जी से ले सकती हैं।"

वो आंखें बड़ी कर इंस्पेक्टर का नाम पढ़ने की कोशिश ही कर रही थी कि इंस्पेक्टर बोल पड़ा, "जी मेरा नाम अशोक धीमन है… और आपका डॉली..?”

"डॉली सिंह," डॉली ने चिढ़ते हुए जवाब दिया।

उसने गुस्से में पर्स से हजार रुपए निकाल कर इंस्पेक्टर की तरफ बढ़ा दिए।

इस पर अशोक बोल उठा, “मुझे नहीं, वहां काउंटर पर चालान भर दीजिए। और हां, अगली बार से स्कूटी को नॉन पार्किंग पर पार्क मत करना।"

डॉली ने ‘हां’ में सिर हिला दिया। आज न जाने क्यों वो कुछ बोल नहीं पाई। उसने चुपचाप से फाइन भर कर स्कूटी की चाबी उठा ली।

डॉली के जाते ही अशोक ने साथ के हवलदार से पूछा, "कौन है ये तूफान? बाप रे! कितने गुस्से में थी।"

"जी ये डॉली है, इसका यहां आना-जाना लगा रहता है, खुद को डॉन समझती है। बचपन में बाबा गुजर गए इसके, तब से घर यही चला रही है। अंदर से बहुत नर्म दिल है सर।"

‘ओके’ कह कर अशोक अपने काम में लग गया।

अगले दिन यही कोई शाम के 5 बजे अशोक पैट्रोलिंग के लिए शहर के दूसरे भाग में गया। वहां कुछ भीड़-भाड़ देख वह रुक गया और धीरे धीरे आगे जाकर देखने लगा कि आखिर माजरा क्या है?

देखा तो हैरान हो गया, 4 लड़कों ने डॉली को पकड़ रखा था और उसे मारने ही जा रहे थे कि अशोक ने जाकर उन चारों को रोक लिया और हवलदार को कहकर जीप में बिठा कर थाने भेज दिया।

इन सब से डरी हुई डॉली ने अशोक को पीछे से कस कर पकड़ लिया। अशोक ने डॉली का हाथ पकड़ा और उसे आगे ले आया।

फिर उसे शांत कराते हुए बोला, “चुप हो जाओ, रोती क्यों हो?”

डॉली इतना डर गई थी कि अशोक को उसे शांत करने के लिए गले लगाना पड़ा।

वह उसकी हालत समझ रहा था इसलिए उसे तसल्ली देते हुए बोला, “शांत हो जाओ, वह लोग अब थाने में हैं। मैं तुम्हे सुरक्षित घर पहुंचा दूंगा।”

डॉली अशोक की बाइक पर बैठ गई। रास्ते में अशोक ने उस से पूछा, “आखिर वे लोग थे कौन? और तुम फालतू में इतना लड़ती-झगड़ती क्यों रहती हो लोगों से? देखो, तुम अच्छी लड़की हो, इस तरह के काम तुम्हें बिल्कुल शोभा नहीं देते। तुम्हें कुछ हो जाता तो?”

डॉली लगातार रोये जा रही थी इसलिए अशोक ने एक जगह पर बाइक रोकी और दोनों के लिए चाय लेकर आया। डॉली चाय पीते हुए अशोक के साथ खुलने लगी।

उसने बताया कि अपने बाबा की जमीन पर चल रही फैक्ट्री से किराया वसूलने गई थी, क्योंकि वे लोग उसके पिता की मौत के बाद जमीन हड़पना चाहते हैं।

यह सब सुन कर अशोक ने उसका हाथ थाम लिया और कहा, “तुम अकेली नहीं हो, कभी भी कोई परेशानी हो तो मुझे कॉल कर सकती हो। ये रहा मेरा नंबर।”

इस पर डॉली ने अपने शरारती अंदाज में पूछा, “अच्छा तो किस नाम से सेव करूं?”

अशोक ने कहा, “वैसे तो अपना दोस्त ही समझिए, बाकी आप चाहें तो उस से ज्यादा भी समझ सकती हैं।” इस पर दोनों हंस पड़े।

अब डॉली कभी अशोक को कॉल कर लेती, तो कभी उसके पसंद का खाना लेकर सीधे थाने पहुंच जाती।

अशोक भी पैट्रोलिंग के बहाने उसकी गली के कई चक्कर लगा लिया करता।

इनकी दोस्ती पर धीरे-धीरे प्यार का रंग कब चढ़ गया पता ही नहीं चला।

आगरा की तंग गलियों में जो प्यार का फूल खिला था उसकी महक से पूरा शहर महक रहा था।

-हेमा काण्डपाल

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