E-इश्क:ऑफिस जाने के लिए वो ट्रेन में बैठा, तो लड़की नहीं दिखी, उसे लगा जैसे उसका लकी चार्म खो गया

20 दिन पहले
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मुंबई की भीड़ में वह कहीं खो सा गया था। रोज की एक ही दिनचर्या, सुबह मां के हाथ का बना टिफिन लेकर ऑफिस जाना, दिनभर सिर झुकाएं काम करना, शाम को सात बजे वाली लोकल ट्रेन, जिसमें पांव रखने की भी जगह नहीं होती, पकड़ कर घर आ जाना। घर आकर भी कुछ खास नहीं, नहा-धोकर मां के हाथ का बना खाना खाकर थोड़ी देर टीवी देखना, फिर सो जाना। ऐसी बेरंग थी उसकी जिंदगी।

अब मां शादी के लिए जोर देने लगी थी, “कब तक मैं घर के काम करती रहूंगी, कोई आकर जिम्मेदारी संभाल ले, तो मैं निश्चिंत हो जाऊं।”

रोज-रोज यही बातें सुनकर उसने मां से कहा, “तुम्हीं ढूंढ लो कोई ऐसी लड़की जो तुम्हें इस घर के काबिल लगे।”

दिन यूं ही बीत रहे थे, लेकिन एक दिन उसकी नजर एक लड़की पर ठहर गई। उस दिन जब वह अपने स्टॉप से ट्रेन में चढ़ा तो उसे ट्रेन के आगे के दरवाजे पर एक युवती नजर आई, लंबी चोटी, कंधे पर टंगा लेदर का बैग, पीछे से वह उसे बहुत आकर्षक लगी। वह उसका चेहरा देखना चाहता था, इससे पहले ही वह अपने स्टॉप पर उतर गई। उसने झांककर देखने की बहुत कोशिश की, पर वह लड़की भीड़ में कहीं गुम हो गई, पर आज वह बहुत खुश था।

अब तो ट्रेन में चढ़ते ही वह उस लड़की की खोजने लगता, लेकिन लड़की रोज एक स्टॉप पहले ट्रेन से उतर जाती और वह उसे देखने में असफल रह जाता। ट्रेन में लड़की की झलकभर देखकर भी वह खुश हो जाता और उसका पूरा दिन अच्छा गुजरता। अब वह लड़की उसका लकी चार्म बन गई थी, जिस दिन वह उसे नहीं दिखती, वह उदास हो जाता।

एक दिन मां ने उसे एक रिश्ते के बारे में बताया, तीन बहनों में सबसे छोटी है, दोनों बड़ी बहनों का विवाह हो चुका है, मां नहीं है, बेटी का विवाह करके पिता अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहते हैं।

उसे फिर वह लड़की याद आ गई। वह सोचने लगा, “काश, वह लकी चार्म उसकी लाइफ पार्टनर बन जाती!” लेकिन मां से कहती भी क्या, उसने खुद अब तक उसे देखा नहीं है।

अगले दिन जब वो ऑफिस जाने के लिए ट्रेन में बैठा, तो लड़की ट्रेन में नहीं दिखी। वह उदास हो गया, उसे लगा जैसे लकी चार्म खो गया।

शाम को जब घर पहुंचा, तो मां ने फिर उसी रिश्ते की बात छेड़ी। आज लकी चार्म को न देखकर वह पहले की परेशान था, अब वह मां को दुखी नहीं करना चाहता था।

उसने मां से कहा, “आप लड़की को अच्छी तरह देख-समझ लो। आपकी और उसकी जमनी चाहिए, मुझे बाद में कोई झगड़ा नहीं चाहिए।”

बेटे की हामी सुन मां ने खुश होते हुए कहा, “मैंने सारी बात कर ली है, बिन मां की बहुत प्यारी बच्ची है, हमारे यहां निभ जाएगी, बस तू एक बार देख कर हां कर दे।”

“ठीक है, इस रविवार उसके घर चलते हैं।”

मां को जैसे मनचाही मुराद मिल गई, वह एक सांस में बोल गईं, “मैं कल सुबह उन्हें बता देती हूं कि हम रविवार को लड़की देखने आ रहे हैं।”

अगले दिन फिर ट्रेन में उसे उदासी हासिल हुई, लकी चार्म आज भी नहीं दिखी।

रविवार को वह मां के साथ लड़की देखने गया, तो सामने एक सांवली सी लड़की बैठी थी।

फिर परिवार वालों ने दोनों को अकेले में बात करने के लिए कहा।

लड़की से बात करने पर उसे अच्छा लगा। तभी लड़की की मां ने उसे पुकारा और वह कमरे से बाहर जाने को मुड़ी। उसके मुड़ते ही लगा जैसे ट्रेन वाली लड़की सामने खड़ी है।

उससे रहा नहीं गया, उसने पूछ ही लिया, “क्या तुम साढ़े नौ बजे चर्नी रोड स्टेशन पर उतरती हो?”

लड़की ने हैरानी देखते हुए पूछा, “आपको कैसे पता?”

“लेकिन पिछले हफ्ते दो दिन तुम क्यों नहीं आई?”

“मैं दो दिन नहीं गई ये आपको कैसे पता?”

उसने कहा, “देखो, तुम दो दिन नहीं आईं तो मैं तुम्हें लेने आ गया हूं।”

लड़की आंखें फाड़े उसे देखने लगी। “तुम ये सब क्या कह रहे हो मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा।”

“तुम्हे पता है, ट्रेन में कोई तुम्हारा आशिक था, जो चोरी-चोरी तुमको निहारा करता था।

लड़की घबरा गई और बोली, “सच कह रही हूं, मुझे इस बारे में कुछ नहीं पता। मैं तो बस घर से दफ्तर, और दफ्तर से घर जाती थी।”

यह सुनकर वह जोर से हंस पड़ा और प्यार से उसके हाथों को अपने हाथों में लेते हुए कहा, “जानती हो, तुम मेरा लकी चार्म हो।” फिर उसने आगे बढ़कर उसे बाहों में भर लिया।

- ऋतु दादू

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