E-इश्क:तुम दिखने में ठीक-ठाक सुंदर हो, पर इतना काफी नहीं है, तुम्हें खुद को मेरी नजर से देखना सीखना होगा

6 महीने पहले
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उर्वी लंहगा पहन कर निकली तो सब देखते ही रह गए। बेटी की खूबसूरती देखकर मां की आंखें भर आईं। वे मन ही मन बुदबुदाईं, “अभी जब कोई मेकअप नहीं, गहने नहीं, सिर्फ ट्रायल के लिए लंहगा पहना है, तब इतनी सुंदर लग रही है, तो शादी में जब अच्छी तरह तैयार होगी, तब बुरी नजर से बचाने के लिए कुछ करना पड़ेगा।”

सबने लंहगा ओके कर दिया, पर उर्वी की नजरें दृष्टा पर थीं।

“तुमने वही सैंडिल पहनी हैं जो शादी वाले दिन पहननी हैं?”

“हां क्यों?”

“तो चलकर देख लो एक बार।”

जैसे कि होता आया था, दृष्टा की बात का अनुसरण करने में उर्वी समय नहीं लगाती थी, वो चल दी और चलते ही डगमगा गई। लंहगा पांव के नीचे आ गया था। दृष्टा ने तुरंत आगे बढ़कर हाथ थाम लिया। “इसे थोड़ा छोटा करा लो। एक तो ये इतना भारी है, दूसरे जरूरत से ज्यादा लंबा।”

सबका ध्यान इस तरफ गया और बात के सही होने पर मुहर लग गई। इस बार उर्वी की पलकें भर आईं। दृष्टा की बातों पर आश्चर्य तो सभी करते थे, पर उर्वी! वो तो उसकी नजर से ही खुद को देखती आई थी। कैसे जिएगी उसके बिना। कैसे देखेगी खुद को किसी और की नजर से! क्या सचमुच वो जिंदगी का इतना बड़ा फैसला ले चुकी है? खुद अपने ही खिलाफ?

लंहगा छोटा कराने के लिए बुटीक में भिजवाकर उर्वी अपने बेस्ट फ्रेंड दृष्टा के पास आकर बैठ गई, “मैं बहुत सुंदर लग रही थी, ऐसा सब कह रहे थे। तुम बताओ, तुम शादी की तैयारियों में कुछ बोल क्यों नहीं रहे?” उर्वी ने बोलने के साथ ही अपने होंठ काट लिए। दृष्टिहीन दृष्टा की पारखी नजर से चकित तो सारी दुनिया थी, पर उर्वी तो उसकी दीवानी थी। जब से प्यार का मतलब समझी थी, उससे प्यार करती आई थी। तो क्या हुआ जो कभी इजहार नहीं हुआ। ये सच जानते तो दोनों ही थे। वैसे ही उसकी शादी तय होने के बाद से दृष्टा के चेहरे पर गहरी उदासी वह साफ देख सकती है। उसकी तो आंखें हैं। अब उसे दृष्टा से कोई अठखेली नहीं करनी चाहिए। उर्वीं सजग हो गई।

“मैं तो जानता हूं कि तुम बहुत सुंदर हो, पर क्या तुम ये जानती हो?”

“मतलब”

“तुमने सिर्फ लंहगे में ही गलती नहीं की है, सारे कपड़े ऐसे खरीद रही हो जो सुविधाजनक नहीं हैं। उर्वी, तुम इतनी सुंदर हो कि सीधे-सरल कपड़ों में भी सुंदर लगोगी, फिर इतनी तकलीफ क्यों उठानी है? क्या हो गया है तुम्हें? तुम्हें तो हमेशा कंफर्टेबल कपड़े, सिंपल सा मेकअप अच्छा लगता है। अपनी इतनी मनपसंद जॉब भी छोड़ने वाली हो, क्योंकि तुम्हारे पति के शहर में उसका ऑफिस नहीं। तुम्हारे मन का क्या होगा? कैसे खुश रहोगी, कैसे संतुष्ट रहोगी? बड़ी चिंता हो रही है मुझे और तुम कहती हो तैयारियां कैसी हैं?”

दृष्टा की बातों से उर्वी की आंखें भर आईं। वह अपने कमरे में आकर मुंह ढांपकर बैठ गई। क्या करने जा रही है वह?

उर्वी अपने नाम की तरह खूबसूरत थी और दृष्टिहीन दृष्टा उतना ही टैलेंटेड। कॉलेज में म्यूजिक टीचर बन जाने के बाद जब दृष्टा के मम्मी-पापा रिश्ता लेकर आए, तो उर्वी की मां इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं हुईं।

अब जहां उर्वी की शादी तय हुई थी, उन लोगों में दिखावा तो हद से ज्यादा था ही, उन्हें उर्वी की पसंद-नापसंद से भी कोई मतलब नहीं था। वे बात-बात पर उर्वी और उसके घर वालों को छोटा दिखाने की कोशिश करते। उर्वी को ये सब अच्छा नहीं लगता था, लेकिन मां ने उसे हिदायत दे रखी थी कि वह अपने ससुराल वालों को कभी कुछ नहीं कहेगी।

उर्वी अब भी अपने कमरे में उदास बैठी थी, तभी मोबाइल की घंटी बजी, “तुम्हारे दिमाग का कोई पेंच ढीला है क्या? इतना मंहगा लंहगा पसंद किया है मम्मी ने तुम्हारे लिए ताकि तुम ‘गार्जियस’ लग सको, पर तुमने सैंडिल ऊँची खरीदने के बजाए लंहगा छोटा करने को कह दिया। ‘रॉयल’ कैसे दिखा जाता है इसकी जरा भी समझ नहीं तुम लोगों को। माना कि तुम दिखने में ठीक-ठाक सुंदर हो, पर इतना काफी नहीं है। तुम्हें खुद को मेरी नजर से देखना सीखना होगा। वो तो अच्छा हुआ कि बुटीक ने मम्मी से पूछ लिया...”

उर्वी सुनती रही, सोचती रही, फिर जैसे किसी निर्णय के साथ उठ खड़ी हुई। “तुम लंहगे से ही शादी कर लो। मुझे तुमसे शादी नहीं करनी।”

खट-खट सुनने पर दरवाजा खोला तो दृष्टा को सामने पाया। “मैंने तुम्हारी पसंद की एक दूसरी जॉब ढूंढ़ी है जो...”

“अब इसकी कोई जरूरत नहीं। मैं यहीं रहूंगी और सारी जिंदगी खुद को तुम्हारी नजर से ही देखूंगी। जो नजर मेरे दिल को, मेरे मन को, मेरे सुख-दुख को देख सकती है, वही मेरी जीवन संगी बनेगी।” कहते हुए उर्वी ने पहली बार अपना सिर दृष्ता के सीने पर रखकर अपने प्यार का इजहार कर ही दिया।

- भावना प्रकाश

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