उसके होंठों पर एक चुंबन दे दिया:आपने कोई अपराध नहीं किया जो आप खुद को सज़ा दें, रीना ने मुस्कराकर कहा, दोनों अपनी राह चल दिए

एक महीने पहले
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रीना की ऊपर की सांस ऊपर और नीचे की नीचे रह गई। एक आदमी के साथ उस छोटे से कमरे में सारी रात? या कॉरिडोर में.. बर्फबारी के कारण बस आगे नहीं जा सकती थी। अब बस कल सुबह नौ बजे निकलेगी। सारी रात इस छोटी सी लॉज में ही बितानी थी सबको। वो बस के इस छोटी सी जगह पर रुक जाने को कोई छोटी‌ प्रॉब्लम या कुछ चयक्कड़ो की चाय पीने की इच्छा समझकर आराम से अपनी सीट पर बैठी वादियों की सुंदरता देखने में खोई रही और सभी परिवार वालों ने लॉज में कमरा बुक करा लिया। अब ये आखिरी कमरा बचा था, जिसे उसको एक अकेले आदमी के साथ शेयर करना था। उसकी नानुकुर पर साफ कह दिया था लॉज के मालिक ने कि फर्स्ट-कम-फर्स्ट-सर्व का रूल है उसके यहां।

कमरा उस आदमी ने पहले बुक कराया है और एक और यात्री को देने की अनुमति दी है। तो वो चाहे तो वो कमरा ले ले या सारी रात कॉरिडोर में रह सकती है। पर्ची कटाकर दरवाज़ा खटखटाया तो रही-सही हिम्मत भी काफूर हो गई। ये तो वही आदमी था जो उसकी बगल वाली सीट पर था और उसे पूरे रास्ते घूरे जा रहा था। एक बार असहज भी हो गई थी वो – “क्या कोई काम है आपको मुझसे या कुछ पूछना है?” रीना के शब्द यही थे पर अभिप्राय था कि इस तरह उसे घूरे जाना उसे पसंद नहीं आ रहा। उसने अपने लहजे से स्पष्ट कर दिया था पर वो आदमी तो जैसे चिकना घड़ा था।

वो रीना की बात का मतलब समझा नहीं या समझकर उपेक्षा की, उसका जवाब सुनकर भरी बस में भी डर गई थी वो – “मैंने आप जैसी सुंदरता पहले कभी नहीं देखी। इसीलिए देख रहा हूं..” लेकिन रीना के तमतमाए चेहरे से शायद वो समझ गया और चुप होकर दूसरी ओर मुंह करके बैठ गया। रीना दरवाज़े पर ही अचकचाई सी खड़ी कमरे का मुआइना करने लगी। एक बमुश्किल छह-बाई-आठ का कमरा। चार बाई छह के दीवान के साथ दो छोटे स्टूल। एक पर कांगड़ी और एक पर स्टील की पानी गरम करने वाली इलेक्ट्रिक केतली। एक छोटी सी खिड़की जिसका दरवाज़ा शायद कभी खोले न जाने के कारण जाम हो चुका था। वो आदमी कांगड़ी बेड पर रखकर स्टूल पर बैठ गया था और रीना बेड की दरवाज़े वाली साइड पर। ​​​​​​

​कॉरीडोर में जाने का मतलब आत्महत्या करना था इसलिए रीना ने खुद को कमरे में ही रात गुज़ारने की हिम्मत दी थी। एक घंटे बीत चुका थे पर रीना की मुद्रा ऐसी ही बनी थी, जैसे वो आगे बढ़ा और ​​​​​​​रीना कूदकर बाहर। रह रहकर दरवाज़ा हवा से खुल जाता और बर्फ हवा के साथ अंदर आकर कमरे को जमा जाती पर रीना न सिटकिनी लगा रही थी न उस आदमी को सिटकिनी लगाने के लिए कहने की हिम्मत कर रही थी। हालांकि वो लगातार छींक रही थी और अब कांपने भी लगी थी। वो आदमी उठा और अपने सूटकेस से एक कोट रीना की ओर बढ़ा दिया। रीना ने मुंह फेर लिया। “किसी को मुग्ध होकर देखना या उसकी सुंदरता की तारीफ कर देना क्या इतना बड़ा गुनाह है कि ऐसा करने वाले व्यक्ति को इतनी बड़ी सज़ा मिलनी चाहिए?” उसने कुछ ऐसे अंदाज़ में कहा कि बात रीना को छू गई। उसने कोट ले लिया। “इसमें हुड भी है। उसे कसकर आप डोरी भी बांध सकती हैं। रीना ने आज्ञा का पालन जैसा किया। पर नाक! नाक तो खुली ही थी और छींके लगातार आ रही थीं। “आपने बताया नहीं कि मैंने क्या गुनाह किया है?” उस आदमी ने जैसे खामोशी की बर्फ तोड़ने की कसम उठा ली थी।

“आपको कौन सी सज़ा दी है मैंने?” रीना धीरे से बोली। “सज़ा तो आप खुद को दे रही हैं। मैं तो आपकी तकलीफ का कारण खुद को समझने के कारण दुखी हूं। सज़ा को स्वेच्छा से भुगत रहा हूं।” उसके लहजे में अपनापन था, वेदना थी, जिज्ञासा थी। रीना ने उसकी आंखों में झांका, वहां तड़प थी। रीना का डर गायब होने लगा।

“मैं बच्चों को हॉस्टल छोड़कर लौट रही थी।” “मैं भी”

बातचीत का सिलसिला चल निकला तो कब ​​​​​​​रीना ने उठकर दरवाजे की सिटकिनी लगा दी, उसे भी पता नहीं चला। “मुझे ब्लैक कॉफी बहुत पसंद है” और मुझे पूरे दूध की चाय।”

दोनों एक-दूसरे का अभिप्राय समझकर हंस दिए। केतली में चाय बनी, नाश्ता निकला, फिर खा पीकर नींद अपनी आगोश में कसने की कोशिश करने लगी। लेकिन बातें इतनी रुचिकर हो चली थीं कि नींद हवा होती रही और वे बैठने से ​​​​​​​अधलेटे होने की मुद्रा में आ गए, फिर पूरे लेट गए। चार फिट के बेड पर एक अजनबी के साथ यों लेटने पर अचानक से सट जाने पर एक अनोखा एहसास मन में रोमांच पैदा कर गया और असहजता ने फिर एक बार दोनों को कस लिया। इस असहजता को दूर करने की कोशिश में रीना थोड़ा किनारे ​​​​​​​खिसकी और गिरते-गिरते बची, क्योंकि उसकी मजबूत बांहों ने रीना को थाम लिया था – “आप अगर अब भी असहज हों तो मैं फिर स्टूल पर बैठ जाऊं।”

“आपने कोई अपराध नहीं किया जो आप खुद को सज़ा दें।” रीना मुस्कराई और लेटकर बातों का सिलसिला चल पड़ा। नींद खुली तो रीना उसकी गरमाई आगोश में थी। अचकचाकर उठी तो वो वो भी अचकचा गया। “वो शायद ठंड के कारण..नींद में..सॉरी..” दोनों एक साथ बोले फिर एक साथ हंस पड़े। बस चल पड़ी थी। नेटवर्क भी आ गया था। रीना ने बच्चों और पति को कुशलता का समाचार दे दिया था और उसने अपने बच्चों और पत्नी को। “ऐसा क्यों लग रहा है कि हम एक दूसरे को बरसों से जानते हैं?” “शायद इसलिए कि हम एक जैसे हैं।” “या शायद इसलिए कि हमने इतनी बातें कर ली हैं।” “सच, मैंने दस साल के अपने विवाहित जीवन में अपने पति से इतनी बात नहीं की होंगी। जितनी रात भर में आपसे” लेकिन तभी कंडक्टर बोला कि गंतव्य आने में केवल पंद्रह मिनट बचे हैं, जिसका टिकट... बातचीत का सिलसिला अचानक थम गया क्योंकि दोनों को ही लगा कि मन में ऐसा कुछ घुमड़ने लगा है जिसके लिए शब्द नहीं हैं उनके पास। अब बातचीत मनो में ही चलने लगी थी। “कभी-कभी हम बरसों में किसी को इतना नहीं जान पाते जितना एक रात में जान जाते हैं, क्यों?” “कभी-कभी शिद्दत से की गई कोशिशों से भी मन किसी के साथ नहीं बंध पाता और कभी-कभी यों ही बंध जाता है, क्यों?” “क्यों मन इस सफर से बाहर नहीं निकलना चाहता?” क्यों मन इस चेहरे से निगाहें हटाने को तैयार नहीं है?” “क्यों..” “क्यों...” “कौन सा विदाई वाक्य बोलूं कि..” “कैसे कहूं, क्या कहूं..” पर दोनों​​​​​​​ में किसी ने कुछ नहीं कहा। वो रीना को एकटक देखता रहा और रीना धीरे से मुस्कराती रही। दोनों बस से उतरे और अपनी-अपनी राह चल दिए। फिर दो कदम चलकर पलटे और करीब आए। उसने बिना शब्दों के इजाज़त ली और रीना का चेहरा हाथों में लेकर उसके होंठों पर एक चुंबन अंकित कर दिया। फिर वे पलटे और अपनी-अपनी राह चल दिए।

-भावना प्रकाश

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