आंगनबाड़ी वर्कर्स-एक जंग,कई मोर्चे:बोलीं-गोद भराई से लेकर अन्नप्राशन तक का करती हैं काम और सरकारें हमें खैरात में देती हैं मानदेय

9 महीने पहलेलेखक: मीना
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‘हम आंगनबाड़ी वर्कर सिर्फ नौकरी नहीं करते बल्कि हर घर की महिला के लिए मां-बहन, सास-सहेली जैसे सभी रोल निभाते हैं। एक महिला के प्रेग्नेंट होने से लेकर डिलीवरी होने तक उसकी देखरेख से जुड़े होते हैं, उसके बच्चे की पांच साल की उम्र तक देखभाल करते हैं। मां-बच्चे की खुराक, दवाएं, इंजेक्शन यहां तक कि पोलियो ड्रॉप्स सब हमारी देखरेख में होता है। कोरोना जैसी महामारी में भी बिना पीपीई किट, सैनिटाइजर, दस्ताने के घर-घर जाकर काम किया। सरकार कहती है कि हमारा काम सुबह 9 बजे से लेकर दोपहर 2 बजे तक का है, लेकिन काम इतना होता है कि ये घंटे काफी नहीं रहते। अपनी वाजिब मांगों को लेकर जब हम आंदोलन करती हैं तो उसे रोक दिया जाता है। ये आपबीती है दिल्ली के खजूरी गांव में आंगनबाड़ी वर्कर सुनीता रानी की।

दिल्ली ही नहीं बल्कि हरियाणा के चरखी दादरी, कैथल, नरवाना, पलवल, रेवाड़ी, यमुनानगर जैसी जगहों पर भी आंगनबाड़ी वर्कर्स अपनी मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं।
दिल्ली ही नहीं बल्कि हरियाणा के चरखी दादरी, कैथल, नरवाना, पलवल, रेवाड़ी, यमुनानगर जैसी जगहों पर भी आंगनबाड़ी वर्कर्स अपनी मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं।

आंगनबाड़ी वर्कर क्यों हैं चर्चा में?
महिला दिवस के दिन दिल्ली की सभी आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं ने राजघाट से दिल्ली सचिवालय तक विशाल रैली निकालकर सरकार के सामने अपनी मांगें पूरी न होने को लेकर विरोध जताया। दिल्ली में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की यह हड़ताल पिछले 38 दिनों से चल रही थी, लेकिन अब दिल्ली के उपराज्यपाल अनिल बैजल ने एसेंशियल सर्विसेज मेंटेनेंस एक्ट (एस्मा) कानून लगाकर इन वर्कर्स की हड़ताल पर 6 महीने रोक लगा दी। इस कानून के खिलाफ दिल्ली स्टेट आंगनबाड़ी वर्कर्स एंड हेल्पर्स यूनियन ने आम आदमी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी दोनों को चेतावनी दी है कि वे इस कानून को एक हफ्ते में वापस लें, नहीं तो वे हाईकोर्ट जाएंगे।
आंगनबाड़ी वर्कर्स का कहना है कि अपनी मांगें रखने की भी हमें सजा मिल रही है और अब जब हड़ताल स्थगन के बाद वापस सेंटर पर काम करने के लिए जा रहे हैं, तो हमसे लिखित माफीनामा भी मांगा जा रहा है।
आंदोलन एक, लेकिन हर महिला प्रभावित
आंगनबाड़ी वर्कर्स महिलाओं और बच्चों के पोषण से जुड़ी योजनाओं/सुविधाओं को हर महिला के घर तक पहुंचाने और सरकार तक इन महिलाओं-बच्चों की परेशानियां पहुंचाने के पुल के तौर पर काम करती हैं। लेकिन जब ये वर्कर्स न्यूनतम वेतन न मिलने, काम के घंटे तय न होने पर परेशान होकर सड़क पर प्रदर्शन करती हैं तो जनता और सरकार के बीच सुविधाओं का यह पुल टूटता है। इस पुल के टूटने से सिर्फ आंगनबाड़ी वर्कर ही नहीं, बल्कि हर घर की वो महिला परेशान होती है, जिसकी सेहत आंगनबाड़ी वर्कर या आशा दीदी से मिलने वाली मदद के भरोसे पर टिकी होती है।
जब हम सरकारी कर्मचारी नहीं तो एस्मा क्यों?
दिल्ली स्टेट आंगनबाड़ी वर्कर्स एंड हेल्पर्स यूनियन की अध्यक्ष शिवानी कौल का कहना है कि जिस एस्मा कानून का हवाला देकर आप और भाजपा ने एलजी के सहारे आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का आंदोलन रोका है, वह कानून सरकारी कर्मचारियों पर लगता है। सरकार तो आंगनबाड़ी महिलाओं को सरकारी कर्मचारी मानती ही नहीं, उन्हें स्वैच्छिक कर्मचारी का दर्जा दिया गया है, जो मानदेय पर काम करती हैं। मानदेय यानी उनको तो एकमुश्त वेतन भी नहीं मिलता।
खैरात की तरह दिया जाता है मानदेय
शिवानी का कहना है कि दिल्ली की 22 हजार आंगनबाड़ीकर्मी खुद मध्यमवर्ग से आती हैं, जिन्हें खुद भी घर चलाना है। उन्हें छह हजार (हेल्पर के लिए) और 12 हजार वर्कर को खैरात की तरह दिए जाते हैं। यह इनकी सैलरी नहीं मानदेय है और यह भी उन्हें हर महीने नहीं मिल पाता, बल्कि दो या तीन महीने के बाद मिलता है। ऐसे में सरकार को इन महिलाओं की परेशानियां नहीं दिखाई देतीं।
एक्टिविस्ट शिवानी कौल का कहना है कि अगर सरकारों ने हमारी मांगें नहीं मानी तो हम 22 हजार आंगनबाड़ी कार्यकर्ता दिल्ली में आने वाले निगम चुनाव का बहिष्कार करेंगी। एलजी ने हमारी हड़ताल रोकी है, लेकिन हमारा ‘नाक में दम करो कैंपेन’ निगम चुनावों तक चलेगा।

सरकार का तर्क है कि दिल्ली में बच्चों और महिलाओं की देखरेख को नुकसान पहुंच रहा है इसलिए आंगनबाड़ी कर्मियों की हड़ताल पर एस्मा लगाकर इसे रोका जा रहा है।
सरकार का तर्क है कि दिल्ली में बच्चों और महिलाओं की देखरेख को नुकसान पहुंच रहा है इसलिए आंगनबाड़ी कर्मियों की हड़ताल पर एस्मा लगाकर इसे रोका जा रहा है।

दिल्ली के खजूरी गांव में 44 साल की वर्कर सुनीता रानी का कहना है कि किसी गांव की गर्भवती महिला का सबसे पहले आंगनबाड़ी वर्कर ही रजिस्ट्रेशन करती। गर्भवती महिला का प्रधानमंत्री मातृत्व वंदना योजना का फॉर्म भरती है, ताकि सरकार की तरफ से प्रेग्नेंट महिला को पांच हजार रुपए मिल सकें। उस गर्भवती महिला को बताना कि तीन महीने तक तुम्हें अपना बहुत ज्यादा ध्यान रखना है, हेल्दी डाइट लेनी है। हम गर्भवती महिला के वजन के उतार-चढ़ाव को मॉनिटर करते हैं, उसे हेल्थ सेंटर ले जाकर जरूरी टीके लगवाते और सभी जरूरी टेस्ट की सलाह भी देते हैं।
गोद भराई से लेकर अन्नप्राशन संस्कार होने तक हम काम करती हैं
पांचवें-छठे महीने पर दूसरा टीका लगवाने में मदद करते हैं। इस वक्त तक महिला की हालत आंगनबाड़ी सेंटर तक आने की नहीं रहती, तब हम उसके घर जाते हैं। उसकी दवाएं, अल्ट्रासाउंड सब देखना हमारी जिम्मेदारी में शामिल होता है। प्रेग्नेंट महिलाओं को गर्भावस्था के सातवें महीने में सेंटर में बुलाकर उनकी गोद भराई की रस्म भी निभाते हैं।
उनकी गोद में फूल रखते हैं, चुन्नियां लाते हैं, उन्हें एक दुल्हन की तरह सजाते हैं। ये सब देखकर महिलाएं बहुत खुश होती हैं। हमें इन सब काम का पैसा डिपार्टमेंट देर से देता है, लेकिन तब तक तो सारा खर्च हम आंगनबाड़ी वर्कर्स अपनी जेब से करती हैं। ये सब हम इसलिए भी करते हैं, क्योंकि हम प्रेग्नेंट महिला से इमोशनली जुड़ जाते हैं।
डिलीवरी के बाद भी उस महिला की देखभाल करना और बेबी की सेहत ठीक है या नहीं, यह भी हमें ही देखना पड़ता है। बच्चा छह महीने का होने के बाद हम अन्नप्राशन डे तक मनाते हैं। जब वह पहली बार अन्न का स्वाद लेता है। गोदी में बैठाकर उन बच्चों को अपने हाथों से खाना खिलाती हैं।
हम 14 से लेकर 18 साल तक की लड़कियों को आयरन की कमी होने पर आईएफए टेबलेट तक देते हैं। इतना सब काम करने के बाद भी हमें हमारे काम के अनुसार वेतन नहीं मिलता और सरकार हमें किसी श्रेणी का कर्मचारी मानने को भी तैयार नहीं होती। यह हमारे दुख की सबसे बड़ी वजह है।
बच्चों की मां की तरह देखभाल करना
35 साल की आंगनबाड़ी हेल्पर करुणा (बदला हुआ नाम) का कहना है कि हम आंगनबाड़ी कर्मी 5 साल तक के बच्चे के इम्युनाइजेशन से लेकर उसकी पूरी देखभाल करते हैं। घर-घर जाकर सर्वे करते हैं। महिलाओं को उनकी सेहत को लेकर जागरुक करने के लिए उनकी बैठकें बुलाते हैं, लेकिन फिर भी सरकारों को हमारे काम दिखाई नहीं देते। इन बच्चों की देखभाल के चक्कर में हम अपने बच्चों तक को ठीक से नहीं देख पाते। ऐप पर काम होने की वजह से रात 12 बजे तक काम चलता है।
कल्पना बताती हैं, ‘कॉम केयर ऐप से हमने हर घर जाकर सर्वे किया। उस ऐप पर हमने दो साल मेहनत की और उसे बंद करके हमें पोषण ट्रैकर ऐप दिया गया। इस ऐप पर काम करते समय ओटीपी नंबर रजिस्टर नंबर भेजा जाता है और हम जिन घरों में प्रेग्नेंट महिलाओं के पास जाते थे, उनके पास फोन नहीं होते थे, उनके हसबैंड अपने काम पर से जब तक ओटीपी नंबर बताते तब तक ओटीपी नंबर एक्सपायर हो जाता था।

कई बार ओटीपी जाता ही नहीं था। हम काम करना चाहते थे, लेकिन इन टेक्निकल परेशानियों का कोई हल ही नहीं था। इस ऐप में हमें गर्भवती महिला का इम्युनाइजेशन, बच्चों का वजन, लंबाई ये सब चढ़ाना होता था, ये सब काम हमें दिनभर में पूरा करके देना पड़ता था, पर ऐप की कमी की वजह से रात को 12 बजे तक यही काम करना पड़ता था। वो ऐप बंद हो गया, लेकिन हमारे काम के घंटे कभी तय नहीं हुए।
इन सब काम को रजिस्टर बनाना और उसे लगातार भरना। अपने एरिया की महिलाओं को बुलाकर सेहत से जुड़े मुद्दे पर जागरुक करते हुए मेनोपॉज, एनीमिया पर भी जानकारी देना। इतना सब करने के बावजूद कोई हमारी मजबूरियां कोई नहीं समझता। मीलों पैदल चलते हैं, पर साल में 31 रुपए का इन्क्रीमेंट होता है। क्या ये सही है?
सरकार को हमें वर्कर मानना होगा
प्रगतिशील महिला संगठन की जनरल सेक्रेटरी और एडवोकेट पूनम कौशिक का कहना है कि आशा और आंगनबाड़ी दोनों ही सौ फीसदी वर्कफोर्स महिलाओं की है। सरकारों को इन्हें रेगुलर वर्कफोर्स के तौर पर देखना चाहिए, लेकिन सरकारों ने हेल्थ को बिजनेस बना दिया है और इस बिजनेस को संभालने का सारा जिम्मा आंगनबाड़ी वर्कर पर डाल दिया है, जिन्हें वह वर्कर भी नहीं मानते।
इन्हें मानदेय दे दिया। ये महिलाएं कनेक्टिविटी का काम करती हैं। अब इन आंगनबाड़ी वर्कर की मांगें पूरी न होने पर जब ये काम नहीं कर रही हैं तो आम औरत प्रभावित हो रही है। न्यूट्रीशन लड़कियों तक नहीं पहुंच पा रहा है। सरकारें आंदोलनों को तोड़ने के लिए नए लोगों की भर्ती करती हैं। ऐसे में आप आम आदमी के विरोध में ही काम कर रही है।
हमारी मांग है कि इन आंगनबाड़ी कर्मी को वर्कर माना जाना चाहिए और ये स्किल वर्कर हैं, इसलिए इन्हें वही वेतन मिलना चाहिए जो दिल्ली सरकार में स्किल वर्कर को मिलता है।