फ्रेजाइल एक्स सिंड्रोम:भारत में चार लाख बच्चे इस बीमारी से प्रभावित, जानिए जेनेटिक डिसऑर्डर से कैसे बचें

21 दिन पहले
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देश में कोरोनाकाल के दौर में लोग कई नई बीमारियों और स्वास्थ्य मुद्दों के बारे में जान रहे हैं। फ्रेजाइल एक्स सिंड्रोम एक ऐसी समस्या है, जिसके बारे में जागरूकता बढ़ाने की जरुरत है। ये जेनेटिक बीमारी बच्चों के सीखने, व्यवहार करने, दिखने और उनकी हेल्थ को प्रभावित करती है। यानी इंटेलेक्चुअल डिसेबिलिटी जैसे ऑटिज्म, स्पीच डिले, ध्यान दे पाने में कमी, हाइपर एक्टिविटी डिसऑर्डर का महत्त्वपूर्ण कारण बनती है। मेंटल डिसऑर्डर की ये समस्या लड़कियों की तुलना में लड़कों में ज्यादा सीरियस होती है।

क्या है इस बीमारी का कारण
मनोविज्ञानी डॉ. समृद्धि खत्री बताती हैं कि भारत में करीब चार लाख बच्चे फ्रेजाइल एक्स सिंड्रोम से प्रभावित हुए हैं। साल 2017 में दिल्ली में ऑटिज्म से प्रभावित एक व्यक्ति ने 40 साल की उम्र में अपना पहला डीएनए रक्त परीक्षण कराया। इस दौरान उसे फ्रेजाइल एक्स सिंड्रोम नाम की बीमारी पाई गई थी। ये FMR1 नामक जीन में परिवर्तन की वजह से होता है, जो एक विशेष प्रोटीन बनाता है। ये प्रोटीन दिमागी विकास के लिए बेहद जरुरी है। हालांकि, इस बीमारी को लेकर भारत में लोग अधिक जागरूक नहीं हैं। विशेषज्ञों की मानें तो अमेरिका में चार हजार में से एक पुरुष और आठ हजार में से एक महिला इससे प्रभावित है। सेंटर फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन, 2015 के मुताबिक पांच हजार जन्मे बच्चों में से एक मेल बेबी इस सिंड्रोम से पीड़ित है।

ये हैं लक्षण

  • बचपन में चलने-बैठने सीखने में परेशानी
  • बोलने में दिक्कत होना
  • सामने वाले से आई कॉन्टैक्ट न कर पाना
  • लड़कों में खुद को नुकसान पहुंचाने वाला व्यवहार
  • गुस्सा और चिड़चिड़ाहट
  • चीजों से घबराना
  • हाइपर ऐक्टिविटी

कैसे करें इलाज

जेनेटिक डिसऑर्डर्स का कोई इलाज नहीं है, लेकिन स्पीच थेरेपी, फिजियोथेरेपी, ऑक्यूपेशनल थेरेपी, विशेष शिक्षा और एंटी एंग्जाइटी मेडिसिन से इस स्थिति के साथ जन्म लेने वाले बच्चों के व्यवहार और शारीरिक लक्षणों में सुधार हो सकता है। इससे जुड़ी समस्या तीन साल की उम्र तक पता चल जाती है। यदि एक बच्चे को यह सिंड्रोम है तो दूसरे में भी इसके होने का खतरा रहता है। कोई भी व्यक्ति लड़का हो या लड़की, जिनमें मानसिक मंदता, विकास में देरी या ऑटिज्म के लक्षण होते हैं और खासकर जिनमें फ्रेजाइल एक्स से जुड़ी हुई भावनात्मक और व्यावहारिक समस्याएं पाई जाती हैं, वे जेनेटिक टेस्टिंग करवा सकते हैं। अजन्मे बच्चे में इस बीमारी की जांच गर्भावस्था में भी की जा सकती है। वर्तमान में एफएक्सएस के इलाज के लिए कई दवाओं का परीक्षण जारी है।

पेरेंट्स इन बातों का रखें ध्यान

  • बच्चों में ऐसे लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर को दिखाएं।
  • एक साल की उम्र में बच्चों को अलग अलग एक्टिविटीज में शामिल करें।
  • पेरेंट्स को ट्रेनिंग होनी चाहिए कि कैसे इस तरह के बच्चों से व्यवहार करना है।
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