कच्ची उम्र में पीसीओडी:हार्मोनल इम्बैलेंस से लड़कियों के मेंटल हेल्थ पर बुरा असर हो रहा है, मां बनने में बन रहा रुकावट

7 महीने पहलेलेखक: कमला बडोनी
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पीसीओडी अब कम उम्र की लड़कियों को भी होने लगा है और इसका असर उनके शरीर के साथ-साथ मन पर भी हो रहा है। गलत लाइफस्टाइल से हार्मोनल इम्बैलेंस कच्ची उम्र में पीसीओडी का प्रमुख कारण है। ऐसे में जब लड़कियों का वजन तेजी से बढ़ने लगता है, तो इसका असर उनके कॉन्फिडेंस पर भी पड़ने लगता है।

पीसीओडी के बारे में शादी के बाद पता चला

मीडिया प्रोफेशनल सुमन शर्मा ने पीसीओडी के अपने अनुभव के बारे में बताते हुए कहा, “मेरे पीरियड्स रेगुलर नहीं रहते थे। इसके बारे में घर में सबको पता था, लेकिन तब हमें इस बात की जानकारी नहीं थी कि ऐसा पीसीओडी के कारण हो रहा है। शादी के बाद जब मैं मां नहीं बन पा रही थी, तो हमने डॉक्टर से बात की। चेकअप के बाद पता चला कि मुझे पीसीओडी और मैं अब नॉर्मल तरीके से मां नहीं बन सकती। तब मुझे आइवीएफ टेकनीक का सहारा लेना पड़ा। यदि हम पहले ही पीसीओडी के बारे में जान पाते, तो मुझे मां बनने के लिए इतने लंबे प्रोसेस से न गुजरना पड़ता।”

पीसीओडी का असर लड़कियों के मेंटल हेल्थ पर भी पड़ता है

साइकोलॉजिस्ट और हेल्थ काउंसलर नम्रता जैन पीसीओडी के बारे में बताते हुए कहती हैं कि यह एक हार्मोनल समस्या है और खासतौर पर महिआलों के गर्भाशय को प्रभावित करती है। इससे कई महिलाओं में मोटापा बढ़ जाता है और यदि कम उम्र में पीसीओडी हुआ है, तो लड़कियों की मेंटल हेल्थ पर भी इसका प्रभाव पड़ने लगता है। कई लड़कियां गुस्सैल हो जाती हैं, तो कई बिल्कुल शांत हो जाती हैं, कई लड़कियां डिप्रेशन में चली जाती हैं, ऐसे में उनकी काउंसलिंग बहुत जरूरी है, वरना इसका असर उनके आत्मविश्वास पर भी पड़ने लगता है। छोटी उम्र में पीसीओडी होने पर लड़कियों के शरीर में मेल हार्मोन एंड्रोजन अधिक बनने के कारण चेहरे पर बाल उग आना, मुंहासे, मोटापा, अनियमित पीरियड्स या 15 साल की उम्र तक पीरियड्स न होना और आगे चलकर मां न बन पाना जैसी समस्याएं हो सकती हैं। ऐसे लक्षण दिखने पर गायनाकोलॉजिस्ट से संपर्क करना और सही ट्रीटमेंट लेना बेहद जरूरी है। इलाज जल्दी शुरू करने से आगे होने वाली कई परेशानियों से बचा जा सकता है।

कॉन्फिडेंस कम न होने दें

बॉडी पॉजिटिव वेलनेस कोच और योगा टीचर नौशीन शेख ने कच्ची उम्र में होने वाले पीसीओडी के बारे में बताते हुए कहा कि जब किसी लड़की को छोटी उम्र में पीसीओडी हो जाता है, तो वह अपने शरीर को लेकर बहुत कॉन्शियस हो जाती है, बढ़ता मोटापा उसका कॉन्फिडेंस कम कर देता है। कुछ लड़कियां डिप्रेशन का शिकार भी हो जाती हैं। कम उम्र में पीसीओडी होने पर लड़कियों की काउंसलिंग बहुत जरूरी है, ताकि उनका आत्मविश्वास कम न हो और वो आम लड़कियों की तरह जीवन में आगे बढ़ सकें।

पीसीओएस और प्रेग्नेंसी

यदि आप पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (पीसीओएस) से पीड़ित हैं और प्रेग्नेंसी प्लान कर रही हैं, तो आपको विशेष रूप से सावधान रहने की जरूरत है, क्योंकि ये आपकी गर्भावस्था को प्रभावित कर सकता है। मदरहुड हॉस्पिटल, मुंबई की कंसल्टेंट ऑब्सटेट्रिशियन व गायनाकोलॉजिस्ट डॉ. सुरभि सिद्धार्थ पीसीओएस और गर्भावस्था के कनेक्शन के बारे में बता रही हैं।

जो महिलाएं पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (पीसीओएस) से पीड़ित होती हैं, उनके अंडाशय असामान्य मात्रा में एण्ड्रोजन का उत्पादन करते हैं, पुरुष सेक्स हार्मोन आमतौर पर महिलाओं में कम मात्रा में देखे जाते हैं। पीसीओएस से पीड़ित महिलाएं प्रेग्नेंसी के दौरान कई तकलीफों से गुजरती हैं और होने वाले बच्चे को भी कई जटिलताओं से गुजरना पड़ता है।

प्रेग्नेंसी में डायबिटीज

ऐसी महिलाओं को प्रेग्नेंसी में डायबिटीज की संभावना ज्यादा होती है, लेकिन जल्दी इलाज कर लिया जाए, तो यह मां या भ्रूण को कोई बड़ी समस्या नहीं पैदा कर सकता है और बच्चे के जन्म के बाद चला जाता है। इन महिलाओं को सिजेरियन या सी-सेक्शन डिलीवरी की जरूरत हो सकती है, ब्लड शुगर कम हो सकता है और सांस लेने में दिक्कत हो सकती है। प्रेग्नेंसी के दौरान डायबिटीज होने से पर ऐसी महिलाओं के बच्चों को भी आगे चलकर टाइप 2 डायबिटीज होने की संभावना रहती है।

अबोर्शन या अर्ली प्रेग्नेंसी हो सकती है

पीसीओएस वाली महिलाओं में आम महिलाओं की तुलना में प्रेग्नेंसी के शुरुआती महीनों में गर्भपात की संभावना अधिक होती है इसलिए इस स्थिति को नजरअंदाज न करें और गायनाकोलॉजिस्ट के संपर्क में रहें। ऐसी महिलाओं में समय से पहले डिलीवरी की संभावना अधिक रहती है इसलिए इन्हें ज्यादा ध्यान देने की जरूरत होती है।

प्रीक्लेम्पसिया

इसे प्रेग्नेंसी के 20वें हफ्ते के बाद ब्लडप्रेशर के अचानक बढ़ जाने के रूप में भी जाना जाता है। इसके अलावा प्रेग्नेंसी में पीसीओएस से पीड़ित महिला के लिवर, किडनी और ब्रेन पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। यदि सही उपचार न किया गया, तो प्रीक्लेम्पसिया एक्लम्पसिया में बदल सकता है, जो ऑर्गन डैमेज, यहां तक कि मौत का कारण भी बन सकता है। प्रीक्लेम्पसिया वाली गर्भवती महिलाओं को सी-सेक्शन डिलीवरी की जरूरत हो सकती है, जो मां और बच्चे दोनों के लिए जोखिमभरा हो सकता है।

समय से पहले जन्म

जिन शिशुओं का जन्म गर्भावस्था के 37 सप्ताह से पहले होता है, उन्हें समय से पहले जन्म माना जाता है। समय से पहले जन्म लेने वाले शिशुओं को कई स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा होता है। इनमें से कुछ समस्याएं जन्म के ठीक बाद और बाद में भी इनके जीवन के लिए खतरा हो सकती हैं।

सिजेरियन या सी-सेक्शन डिलीवरी

पीसीओएस से पीड़ित प्रेग्नेंट महिलाओं को पीसीओएस से जुड़ी जटिलताओं, जैसे गर्भावस्था में हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज के कारण सिजेरियन डिलीवरी करानी पड़ती हैं। सी-सेक्शन डिलीवरी में ठीक होने में नॉर्मल डिलीवरी के मुकाबले ज्यादा समय लगता है और यह मां व शिशु दोनों के लिए जोखिमभरा हो सकता है।

यदि आपको पीसीओएस है और आप प्रेग्नेंसी प्लान कर रही हैं, तो पहले डॉक्टर से कंसल्ट करें, इससे आपको अपनी लाइफस्टाइल को सही करने और सुरक्षित रूप से बच्चे को जन्म देने में मदद मिलेगी। प्रेग्नेंसी के दौरान आपको अपने डॉक्टर के निर्देशों का पालन करना होगा जैसे बैलेंस डाइट, रेगुलर एक्सरसाइज, हेल्दी लाइफस्टाइल, वजन को कंट्रोल रखना, प्रोसेस्ड और जंक फूड से बचना, योग या ध्यान करके तनाव कम करना और समय पर दवाएं लेना, ऐसा करके आप अपनी प्रेग्नेंसी को सुरक्षित बना सकती हैं।

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