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उफ्फ, ये केमिकल लोचा:क्या होता है, जब महिलाओं के तूफानी हॉर्मोन हिलोरे मारते हैं ?

नई दिल्ली13 दिन पहलेलेखक: भारती द्विवेदी
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फोटो सौजन्य: Liza Summer - Dainik Bhaskar
फोटो सौजन्य: Liza Summer
  • एस्ट्रोजन, प्रोजेस्टेरोन और टेस्टोस्टेरोन महिलाओं के लिए जरूरी हॉर्मोन
  • एस्ट्रोजन हॉर्मोन वेजाइना की सेहत के लिए भी अच्छा होता है
  • ओव्यूलेशन के ठीक पहले महिलाओं की यौन इच्छा चरम पर होती है

कल जो लड़की पार्टी की जान थी, आज अचानक दुख का दरिया बन गई। सिलवट भरे कपड़ों और बेतरतीब बालों के साथ दफ्तर पहुंची। हर बात पर झुंझलाती और बिसूरती हुई। दफ्तर में हर कोई उससे ऐसे बच रहा था, मानो कटखनी बिल्ली हो। मेरी इस दोस्त का रवैया नया नहीं, न तो मेरे और न दफ्तरिया साथियों के लिए। कमोबेश सारी ही लड़कियां महीने में कुछ दिनों के लिए हॉर्मोन का ज्वारभाटा झेलती हैं। एक पल वे शहद हो जाती हैं तो दूसरे ही मिनट तीखी मिर्च। ऐसा क्यों होता कि हॉर्मोन्स की उठापटक से मूड डगमगा जाता है? समझिए...

रीना, (बदला नाम) पेशे से पत्रकार हैं। कई मीडिया संस्थानों के लिए काम कर चुकी हैं। अपने मूड स्विंग का एक किस्सा उन्होंने बताया। तो हुआ ये कि पीरियड्स आने के पहले रीना की बॉडी में हॉर्मोनल लोचा शुरू हो चुका था। लेकिन सिर पर काम का प्रेशर भी था। सुबह से स्टोरी के चक्कर में कुछ खाया भी नहीं था। वो सोच रही थी कि पहले कुछ स्टोरी खत्म कर लें फिर खाना खाएंगी। लेकिन एक तस्वीर या डिजाइनर की लापरवाही के चक्कर में उनकी स्टोरी अटक गई। फिर क्या था? रीना ने अपने रिपोर्टिंग मैनेजर को कॉल किया और ऐसी भड़ास निकाली कि मैनेजर कुछ बोल ही नहीं पाया। बस इतना कहा कि ऐसा कीजिए आप पहले खाना खाइए, फिर स्टोरी की सोचिए। इस केस में दो बातें हो सकती है। या तो मैनेजर साहब लड़कियों के मूड स्विंग को अच्छे से समझते थे। दूसरा कि अगर वो मूड स्विंग ना होता, कोई भी आम दिन होता तो शायद ही रीना रिपोर्टिंग मैनेजर पर चिल्लाने की हिमाकत करती।

रीना शादीशुदा नहीं है। वो अपनी सेक्सुअल डिजायर पर भी बात करती है। और उसे इसकी सबसे ज्यादा जरूरत पीरियड्स के बाद महसूस होती है। हालांकि कई लड़कियों में पीरियड्स के पहले यौन इच्छा प्रबल होती है। इस दौरान हॉर्मोनल चेंज की वजह से लड़कियों के अंदर कुछ अलग इच्छाएं आती हैं। यह वो दौर होता है, जब लड़कियां चाहती हैं कि कोई उन्हें गले लगाए, लाड़- प्यार करे। यह सिर्फ रीना के साथ नहीं होता है। हर लड़की इस फेज से गुजरती है।

हॉर्मोनल इंबैलेंस और मूड स्विंग होता क्यों है?

हॉर्मोनल इंबैलेंस और मूड स्विंग को समझने के लिए हमने मुंबई की डायटिशियन कंचन पटवर्धन से बात की। वो बताती हैं कि आजकल लड़कियों में अर्ली प्यूबर्टी देखी जा रही है। पीरियड्स का नियमित नहीं होना, कई-कई महीने तक पीरियड्स का ना आना, अचानक वजन का बढ़ना या घटना, पॉलीस्टिक ओवरियन डिजीज (PCOD), पॉलीस्टिक ओवरी सिंड्रोम (PCOS) , चेहरे या ब्रेस्ट एरिया में बाल का आना, बहुत ज्यादा गुस्सा आना या चिड़चिड़ापन जैसे लक्षण हॉर्मोनल इंबैलेंस के साइन हैं। इसके पीछे की वजह है हमारी लाइफ स्टाइल। ऐसा नहीं है कि हर लड़की या महिला में हॉर्मोनल इंबैलेंस, मूड स्विंग एक जैसा हो। या फिर एक तय उम्र में ही हो। प्यूबर्टी, प्रेग्नेनेंसी, मोनोपॉज हर फेज में अलग-अलग लक्षण होते हैं।

लेकिन इनसे डरना नहीं होता है। हम इन्हें ठीक कर सकते है। ये सारी ही दिक्कतें क्यूरबल यानी कि ठीक होने वाली होती हैं। इसके लिए बस आपको अपनी लाइफ स्टाइल ठीक करनी होगी। फिजिकल एक्टिविटी बढ़ानी होगी। शरीर में गुड हॉर्मोन को बढ़ाने के लिए फिजिकल एक्टिविटी बहुत जरूरी है।

महिलाओं के सेक्स हॉर्मोन

एस्ट्रोजन, प्रोजेस्टेरोन और टेस्टोस्टेरोन ये तीन ही हॉर्मोन महिलाओं के शरीर का हिस्सा होते हैं। महिलाओं की सेक्सुअल डिजायर में इनका अहम रोल होता है। आमतौर पर ओव्यूलेशन के ठीक पहले महिलाओं की यौन इच्छा चरम पर होती है। और वो इन्हीं हॉर्मोनल उतार-चढ़ाव की वजह से ही होता है। सेक्स हॉर्मोन इमोशन से जुड़े होते हैं इसलिए इनके स्तर में बदलाव आते ही मूड स्विंग भी शुरू हो जाते हैं। इस दौरान महिलाओं के मूड स्विंग की बात करें तो ये "रोलर कोस्टर" जैसा होता है। जहां पल-पल इमोशन्स बदलते रहते हैं।

सबसे पहले बात तूफानी हॉर्मोन एस्ट्रोजन की

एस्ट्रोजन...महिलाओं की ओवरी में बनने वाला हॉर्मोन। ये थोड़ा बहुत एड्रिनल ग्लैंड और फैट सेल्स में भी बनता रहता है। लोग इसे फीमेल हॉर्मोन के तौर पर ही जानते हैं। एस्ट्रोजन रिप्रोडक्शन और यौन विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह ब्रेन, हेयर, स्किन, यूरिनरी ट्रैक्ट के लिए जरूरी और मूड स्विंग्स, पीएमएस (PMS) और हॉट फ्लैश जैसी कई और चीजों के लिए जिम्मेदार होता है। एस्ट्रोजन वेजाइना की सेहत के लिए भी अच्छा होता है। उम्र के हर पड़ाव पर इसका लेवल बदलता रहता है। एस्ट्रोजन के कई प्रकार होते हैं। कुल मिलाकर कहें तो यह कई मामलों में फायदेमंद होता है।

अब ये हॉट फ्लैश क्या बला है?

हॉट फ्लैश। जैसा कि नाम से ही जाहिर हो रहा है कि मामला कुछ गर्मी से जुड़ा होगा। इस टर्म का सामना ज्यादातर महिलाएं 40 की उम्र में करती हैं। यानी कि वो जब अपने मोनोपॉज के करीब होती है। इस दौरान अचानक चेहरे पर गर्मी महसूस होने लगती है, रात में पसीना आना, नींद ना आना जैसी समस्या होती है।

प्रोजेस्टेरोन और टेस्टोस्टेरोन का क्या काम?

प्रोजेस्टेरोन महिलाओं की ओवरी में बनने वाला हॉर्मोन है। जो ओव्यूलेशन (Ovulation)के बाद बनता है। इसका काम होता है पीरियड्स को नियंत्रित करना और शरीर को प्रेग्नेंसी के लिए तैयार करना। शरीर में प्रोजेस्टेरोन का स्तर कम होने पर अनियमित पीरियड्स, कंसीव करने में दिक्कत आ सकती है।

टेस्टोस्टेरोन यानी मेल हॉर्मोन। आप सोच रहे होंगे महिलाओं के शरीर में इसका का क्या काम? लेकिन ये बहुत ही कम मात्रा में महिलाओं के शरीर में भी मिलता है। ये भी ओवरी में बनने वाला हॉर्मोन है और प्यूबर्टी में इसका अहम रोल होता है। प्यूबर्टी के दौरान शरीर के दूसरे हिस्सों में बाल आना, सेक्सुअल डिजायर, पीरियड्स को नियमित करना इसका काम होता है। लेकिन जब ये ज्यादा मात्रा में बनने लगे तो फिर दिक्कत होती है। जिस भी महिला के शरीर में ये ज्यादा होता है, वो पीसीओडी (PCOD),चेहरे पर पुरुषों की तरह बाल का आना, ऑयली स्किन, अनियमित पीरियड्स, मोटापा जैसी समस्याओं को झेलती हैं।

मूड स्विंग और हॉर्मोनल इंबैलेंस को फूड से कैसे कंट्रोल करें?

दिल्ली की न्यूट्रिशियन डॉ. शैली तोमर बताती हैं कि खाने में ओमेगा-3, फाइबर और प्रोटीन को लाना होगा यानी कि बैलेंस डाइट लेनी होगी। लाइफस्टाइल से प्रोसेस फूड को हटाकर, ऑर्गिनिक फूड शामिल करना बहुत जरूरी है। हर रोज के खाने में रागी, ज्वार, ओट्स, बजारा, किनोय जैसे अनाज को डाइट का हिस्सा बनाना होगा। हॉर्मोन के बनने में प्रोटीन की अहम भूमिका होती है तो प्रोटीनयुक्ट डायट जैसे कि दाल, सोया, चना, राजमा भी खाने में होने बहुत जरूरी हैं। साथ ही खाने में फल, सब्जियां, वैसे मसाले भी होने चाहिए जो हमारे शरीर के लिए फायेदमंद हैं। और सबसे जरूरी बात कि आठ घंटे की नींद लेनी चाहिए और हर दिन कम से कम आधे घंटे एक्ससाइज करनी होगी।

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