हाइपोकॉन्ड्रिया:चिता तक पहुंचा सकती है सेहत की ज्यादा चिंता, हर 10 में से 8 लोग हैं इस बीमारी से पीड़ित

नई दिल्ली2 महीने पहले
  • कॉपी लिंक

मुझे कहीं कोई गंभीर बीमारी तो नहीं, बीपी बढ़ गया मैं मर तो नहीं जाऊंगी, सोते-सोते मुझे हार्ट अटैक न आ जाए? सामान्य सिरदर्द या मामूली सर्दी-खांसी बुखार को किसी गंभीर बीमारी का संकेत मान लेना। जांच रिपोर्ट में सब नॉर्मल आने के बावजूद डर में जीना.. क्या आपको भी इसी तरह किसी गंभीर बीमारी और मौत का डर सताता रहता हैं? अगर हां, तो यह रोगभ्रम यानी हाइपोकॉन्ड्रिया नामक एक बीमारी है। आइए जानें हाइपोकॉन्ड्रिया किस कारण से होती है और कैसे यह दिल की सेहत से जुड़ी है...

कई रिसर्च में इस बात का दावा किया गया है कि रोगभ्रम यानी हाइपोकॉन्ड्रिया के शिकार व्यक्ति में धीरे-धीरे उसी रोग के लक्षण नजर आने लगते हैं, जिसके बारे में वह सोचता रहता है। मनोचिकित्सक डॉ. बिंदा सिंह बताती हैं कि इंसान दिमाग में जो सोचता है, शरीर उसे मानने लगता है। हाइपोकॉन्ड्रिया के मरीजों पर गंभीर बीमारियों का डर इतना हावी हो जाता है कि कई बार उनकी जान पर बनी आती है। उनको हार्ट अटैक भी आ सकता है। मौजूदा वक्त में हर 10 में से 8 लोग इस बीमारी से पीड़ित हैं। अब डॉक्टर भी हाइपोकॉन्ड्रिया को ज्यादा गंभीरता से लेने लगे हैं।

ज्यादा चिंता करने वालों में मौत का खतरा अधिक
नॉर्वे में इस पर हुआ एक शोध 2016 में मेडिकल जर्नल बीएमजे ओपन में प्रकाशित किया गया। इस शोध में 7 हजार से अधिक लोगों को शामिल गया था। यह 12 साल तक चला। इसमें लोगों से उनकी जीवनशैली, शिक्षा और हेल्थ के बारे में सवाल पूछ गए। सभी की जांच भी की गई। शोध में हाइपोकॉन्ड्रिया की जांच करने के लिए व्हाइटली इंडेक्स का सहारा लिया गया। शोधकर्ताओं को उम्मीद थी कि जो लोग अपनी सेहत के बारे में चिंतित रहते हैं, उनमें शायद जागरुकता की वजह से मौत का खतरा कम होगा, लेकिन नतीजे इसके उल्टे देखने को मिले।

शोधकर्ताओं की टीम का नेतृत्व करने वाले डॉ. लाइन इडेन बेर्गे ने बताया, हमने देखा कि जिन प्रतिभागियों को अपनी सेहत की ज्यादा चिंता थी, उन्हें दिल की बीमारी होने का खतरा 70 अधिक रहता है। शोध के परिणामों से स्पष्ट हो चुका है कि सेहत को लेकर अति चिंता और अवसाद के बीच संबंध है। दोनों ही दिल के लिए अच्छे नहीं हैं।

क्या है हाइपोकॉन्ड्रिया?
हाइपोकॉन्ड्रिया या इलनेस एंजाइटी डिसऑर्डर लंबे समय तक चलने वाली बीमारी है। इस बीमारी से पीड़ित लोग स्वस्थ रहने के बावजूद गंभीर बीमारियों को लेकर आशंकित रहते हैं। अगर मरीज को पहले से कोई बीमारी है तो उसकी स्थिति और बिगड़ जाती है। वह छोटी सी बीमारी को बढ़ा-चढ़ाकर देखने और बताने लगता है। यह डर उम्र के साथ या किसी तनाव के साथ और बढ़ता जाता है, जिसका सीधा असर मरीज के रोजमर्रा के काम और रिश्तों पर पड़ता है।

कैसे पहचानें?
अगर मरीज परिवार या डॉक्टर के बोलने, रिपोर्ट नॉर्मल आने के बावजूद गंभीर बीमारियों और मौत के डर में जीना। एक जगह जांच नॉर्मल आने पर दूसरे डॉक्टर के पास जाना। लगातार बीमारियों के बारे में बात करना। इंटरनेट या किताबों में इसी तरह की चीजों को पढ़ना चाहता है। लोगों से मिलना जुलना टालने लगता है। इस बीमारी के कारण अब तक अज्ञात हैं, लेकिन हॉर्मोनल डिसबैलेंस को भी इसके पीछे एक वजह माना जा रहा है। इसके अलावा, परिवार में किसी की बीमारी से मौत या फिर खुद लंबे समय तक बीमार रहने के चलते भी हाइपोकॉन्ड्रिया हो जाता है।

क्या है इलाज?
हाइपोकॉन्ड्रिया पर अब तक कई शोध हो चुके हैं, जिसके बाद इलाज का नया तरीका खोजने पर काम जारी है। डॉ. बेर्गे के मुताबिक, इसके इलाज के लिए अच्छे हृदयरोग विशेषज्ञों और न्यूरोलॉजिस्ट के साथ ही मनो​चिकित्सकों की भी जरूरत है। मनोचिकित्सक डॉ. बिंदा कहती हैं कि हाइपोकॉन्ड्रिया के शुरुआती मरीजों को काउंसलिंग करनी होती है। साइको थेरेपी देनी पड़ जाती हैं, लेकिन स्थिति गंभीर हो जाने पर दवाइयां देनी पड़ती हैं। हाइपोकॉन्ड्रिया के बारे में समय रहते पता चल जाए तो कई बीमारियों को टाला जा सकता है।