पीरियड्स पर खुलकर बोलीं महिलाएं:शर्म लाज रख दी कोने में, अब जोर से कहती हूं- ‘हां महीना आ रहा है’

नई दिल्ली6 महीने पहलेलेखक: मीना

‘मैं बिहार में थी और जब पीरियड्स शुरू हुआ तो मां ने सिखाया कि इस दौरान इस्तेमाल कपड़ा किसी को नहीं दिखना चाहिए।

एक तो मुझे समझ नहीं आ रहा था कि कहीं फोड़ा-फुंसी नहीं फिर खून कहां से बह रहा है। ऊपर से मां-बड़ी बहन इस तरह सिखा-पढ़ा रहे थे कि लगा कि जैसे न जाने मेरे शरीर को क्या हो गया है।

मां-बहन से मिली सीख से उस खून से लिसे कपड़े को बांस की छत में घुसा दिया।

उन दिनों शर्म इतना बड़ा गहना हो जाती थी कि उस कपड़े को झिझक की वजह से उस बांस से निकाल ही नहीं पाती और महीने भर में वहां मकड़ी का जाल बन जाता। छिपकली उसे अपना घर बना लेती।

ये प्रैक्टिस मैंने सालों की, लेकिन जब दिल्ली आना हुआ और ‘गूंज’ में काम शुरू किया तो पीरियड्स से जुड़ी, शर्म-लाज, उसे गंदा खून मानने जैसी सोच को उसी बांस की छत में छुपा दिया। दोबारा उसे उठाकर भी नहीं देखा। हा हा हा’…

मिंटू मिश्रा पिछले नौ साल से 'गूंज' में काम कर रही हैं।
मिंटू मिश्रा पिछले नौ साल से 'गूंज' में काम कर रही हैं।

जिस आत्मविश्वास के साथ एक सांस में मिंटू मिश्रा ने यह सारी बातें कह डालीं, कुछ साल पहले यह बातें बोलना उनके लिए आसान नहीं था। भारत के 22 राज्यों में ‘कचरे’ को सोने में बदल रही संस्था ‘गूंज’ की दी सीख की बदौलत ही यह महिलाएं खुलकर पीरियड्स पर बोल पा रही हैं।

वे पुरुषों के बीच जाकर महिलाओं को इस विषय पर जागरुक कर पाती हैं और जरूरत की चीजें मुहैया करा पाती हैं। नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इन्फोर्मेशन पर साल 2015 में छपे शोध पत्र के मुताबिक भारत में आज भी कभी-कभी 88% महिलाएं राख, अखबार, सूखी पत्तियां और रेत का इस्तेमाल करती हैं।

धीरे-धीरे शुरू हो रही बात
साल 2018 में पैडमैन मूवी आने के बाद पीरियड्स एक सेंसटिव विषय तो बना, लेकिन इससे जुड़ी शर्म, इस खून को गंदा मानने की सोच नहीं बदली। पर धीरज इस बात की है कि अब धीरे-धीरे ही सही महिलाओं ने इस विषय पर चुप्पी तोड़नी शुरू की है।

‘गूंज’ में कपड़े के पैड पर इंटरलॉक कर रहीं निभा कहती हैं कि मैं एक दिन में ढाई सौ से तीन सौ पैड सिल लेती हूं। आज तो इस फील्ड में काम कर रही हूं, लेकिन जब गांव से आई थी तब माहवारी मेरे लिए इतना छुपा हुआ विषय था कि अपनी सहेली तक से नहीं कह पाती थी, लेकिन अब अपनी 15 साल की बेटी को आराम से इस विषय पर बता पाती हूं।

...जब बेटी को मिला राष्ट्रपति की बेटी से पुरस्कार
बेटी को इस तरह से शिक्षित किया कि उसने स्कूल में जाकर इस विषय पर बात की और राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद की बेटी ने मेरी बेटी को पुरस्कार दिया। मुझे खुशी होती है कि अब मैं इतनी सक्षम हूं कि अपनी बेटी को इस विषय पर बता पाई।

बिहार की रहने वाली रुना झा साल 2008 से दिल्ली में पीरियड्स पैंटी बनाने का काम कर रही हैं। वे एक ऐसी जादुई पैंटी बना रही हैं जिसमें से कपड़े का पैड खिसकेगा नहीं। पैंटी की मियानी में कपड़े के ही दो हुक बनाए जाते हैं जिससे पैड खिसकता नहीं है।

रुना इस टाइप की पैंटी बना रही हैं जिससे पैड नहीं खिसकता। अपनी जगह टिका रहता है।
रुना इस टाइप की पैंटी बना रही हैं जिससे पैड नहीं खिसकता। अपनी जगह टिका रहता है।

लगभग 45 साल की रुना कहती हैं कि एक वक्त था जब पीरियड्स पर बात करने में शर्म आती थी। जब पहला पीरियड्स आया तो मां की साड़ी का इस्तेमाल किया। उन कपड़ों को ऐसे छुपाना पड़ता जैसे हमने कोई पाप कर दिया हो।

चुप! किसी को कपड़ा न दिख जाए
भाई को न दिख जाए, पिता जी की नजर न पड़ जाए। जहां, धूप नहीं आती, कीड़े-मकोड़ों की संख्या ज्यादा होती…ऐसे घुप अंधेरे में माहवारी का कपड़ा सुखाना पड़ता। जब दिल्ली आ गई तो यहां कपड़ा नहीं मिला तो पैड इस्तेमाल किया, लेकिन 2008 में जब गूंज में काम शुरू किया तब अपनों से ही पीरियड्स का कपड़ा छुपाना बंद कर दिया।

अब चुप्पी तोड़ दी...
रुना के दो बेटे हैं। वे अपने बेटों को भी माहवारी के बारे में जानकारी दे रही हैं। ताकि उनके घर में आने वाली बहूओं को परेशानी न हो। वे कहती हैं कि हर महीने आने वाला पीरियड्स कब तक छुपाती, अब चुप्पी तोड़ दी। अब 'पीरियड्स हो रहे हैं' कहने में शर्म नहीं आती।