पीरियड्स में राख की पोटली बांधने से अब तक:पैड के नाम पर जानवर की खाल, गोबर, अखबार, रेत, गंदे कपड़े इस्तेमाल करती थीं महिलाएं

6 महीने पहलेलेखक: मीना
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क्या आपने कभी सोचा है कि महिलाएं कपड़ा, पीरियड्स पैड और टैम्पोन से पहले क्या इस्तेमाल करती थीं। सदियों से पीरियड्स और मेंस्ट्रुअल प्रोडक्ट्स चुप्पी, लुका-छुपी का विषय रहे हैं। यही वजह है कि कई महिलाएं मेंस्ट्रुअल हेल्थ एजुकेशन और सेफ पीरियड प्रोडक्ट्स की पहुंच से बाहर रहीं।

पीरियड्स प्रोडक्ट्स के इतिहास के बारे में बात करना इसलिए जरूरी है ताकि यह समझ पाएं कि महिलाओं को ‘उन दिनों’ में कैसी परेशानियां रहतीं और किस कदर उनका स्वास्थ्य सदियों से नजरअंदाज होता रहा। इस वर्ल्ड मेंस्ट्रुअल हाइजीन वीक में समझते हैं कि राख से मेंस्टुअल कप तक का सफर कैसे शुरू हुआ और माहवारी से जुड़ी रूढ़ियां और समस्याएं क्या थीं।

ब्लड फ्लो रोकता मोटा कागज
वोक्सापॉड ब्लॉग पर इतिहासकार जिया यू वांग के छपे एक लेख के मुताबिक, सबसे पहले मिस्र के मेडिकल रिकॉर्ड्स में मेंस्ट्रुअल प्रोडक्ट्स का उल्लेख पाया गया। मिस्र में महिलाएं पीरियड्स के फ्लो को रोकने के लिए 'पेपरिस' का इस्तेमाल करती थीं।

'पेपरिस' एक मोटा कागज होता है, जिसे महिलाएं भिगो कर नैपकिन की तरह इस्तेमाल करतीं। अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया में महिलाएं पीरियड्स के दिनों में 'सूखी घास' का पैड बनाकर इस्तेमाल करती थीं।

5 से 15वीं शताब्दी के बीच महिलाओं ने गंदे कपड़े का इस्तेमाल पैड के रूप में किया, लेकिन इससे होने वाले बैक्टीरियल इंफेक्शन से बचने के लिए सैनिटरी ऐप्रन अस्तित्व में आया। यह रबड़ का बना होता था। इन रबड़ के ऐप्रन को पहनना असहज तो था ही साथ ही बदबू भी आने लगती।

एनएफएचएस की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में आज भी माहवारी के दिनों में 50 फीसदी महिलाएं कपड़े का इस्तेमाल करती हैं।
एनएफएचएस की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में आज भी माहवारी के दिनों में 50 फीसदी महिलाएं कपड़े का इस्तेमाल करती हैं।

दिल्ली विश्वविद्यालय में 40 साल समाजशास्त्र पढ़ा चुकीं प्रो. तुलसी पटेल का कहना है कि माहवारी के दिनों में कपड़े का इस्तेमाल पुराना है। यहां तक कि अफ्रीका की कई जनजातियां इन दिनों में कुछ भी इस्तेमाल नहीं करती थीं। नेचुरल तरीके से बहने और सूखने देती थीं और रोज के रोज शरीर साफ कर लेतीं।

लिस्टर्स टावल का पहला कॉमर्शियल पैड 1896 में आया, लेकिन इस वक्त तक भी माहवारी शर्म की बात थी, इसलिए महिलाएं इसे खरीद नहीं पाती थीं। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान नर्सों ने पाया कि सैनिकों का खून सोखने में सैल्यूलोज अहम भूमिका निभाता है, इस बहाने यह मेंस्ट्रुएशन के दौरान भी इस्तेमाल किया जाने लगा। 1921 में ‘कोटेक्स’ सैनिटरी नैपकिन मार्केट में आए।

मॉडर्न टैम्पोन से लेकर कप तक
1931 में मॉडर्न टैंम्पोन का आविष्कार हुआ। कुंवारी लड़कियों ने इससे दूरी बरती और शादीशुदा महिलाओं को इसके इस्तेमाल की छूट थी। 1937 में मॉडर्न मेंस्ट्रुअल कप मार्केट में आए। यह कप महिलाओं को खूब भाए। मॉडर्न प्रोडक्ट्स के बाजार में आने के बाद इनकी विविधता दिखने को मिली। अब बाजार में सैनिटरी नैपकिन, कप, पेंटीज, टैम्पोन जैसे तमाम प्रोडक्ट्स हैं।

'कोटेक्स' ने पीरियड पैड के मार्केट को समझ लिया था उसके बाद जॉनसन एंड जॉनसन ने भी स्मार्ट पैड बनाने की कोशिशें कीं।
'कोटेक्स' ने पीरियड पैड के मार्केट को समझ लिया था उसके बाद जॉनसन एंड जॉनसन ने भी स्मार्ट पैड बनाने की कोशिशें कीं।

मार्केट में प्रोडक्ट आने के बाद भी पीरियड्स से जुड़ी शर्म, धर्म की सीख, उसे पाप मानना, गंदा खून मानना जैसी वर्जनाओं की वजह से महिलाएं कभी खुलकर इस पर बात ही नहीं कर पाईं।

रेत के बिस्तर पर लिटाई जाती थीं महिलाएं
सोश्योलॉजिस्ट प्रो. तुलसी बताती हैं कि उन्होंने 40 साल पहले फर्टिलिटी पर राजस्थान में एक रिसर्च की, जिसमें यह बात सामने आई कि ‘उन दिनों’ में महिलाएं रेत की पोटली इस्तेमाल करती थीं। राजस्थान में शिशु जन्म के समय उन्हें रेत के बिस्तर लिटाया जाता और उसी पर बच्चे का जन्म होता, ब्लीडिंग को रेत सोख लेती थी।

राजस्थान के वे गांव जहां पानी की ज्यादा कमी है वहां सूखे गोबर का इस्तेमाल चोट को ठीक करने के लिए भी किया जाता रहा है। ऐसे में यह संभावना भी जताई जा सकती है कि महिलाएं पीरियड्स के दिनों में भी सूखे गोबर का इस्तेमाल करती थीं।

हमारा समाज इतना उलझा हुआ है कि किसी एक प्रांत में माहवारी का पहली बार आना उत्सव की तरह लिया जाता है क्योंकि लड़की तब रिप्रोडक्टिव सिस्टम का हिस्सा बन जाती है। यह उसके स्वस्थ होने की निशानी है। दूसरी तरफ, इसे अशुद्ध माना जाता है।

डॉ. शैली बतरा के मुताबिक, जो महिलाएं पीरियड के दिनों में रेत की पोटली का इस्तेमाल करती हैं, उन्हें सेप्टिक शॉक होने की आशंका रहती है। जिससे उनकी मौत तक हो सकती है।
डॉ. शैली बतरा के मुताबिक, जो महिलाएं पीरियड के दिनों में रेत की पोटली का इस्तेमाल करती हैं, उन्हें सेप्टिक शॉक होने की आशंका रहती है। जिससे उनकी मौत तक हो सकती है।

प्रो. तुलसी के अनुसार, पीरियड्स के खून को इतना गंदा माना गया कि जो रेत महिलाएं इस्तेमाल करती थीं, उनकी कोशिश होती कि उस पर किसी की नजर न पड़े और न पैर। ताकि किसी का कुछ बुरा न हो। कुछ जगहों पर माहवारी के खून को काला जादू का हिस्सा माना जाता था। इस अंधविश्वास की जड़ें आज भी समाज में बहुत गहरी हैं। समाज को यह समझना होगा कि पीरियड्स का ब्लड अशुद्ध, पाप या ब्लैक मैजिक नहीं है, बल्कि इसके होने की वजह से सृष्टि आगे बढ़ती है।

गायनाकोलॉजिस्ट डॉ. शैली बतरा की प्रैक्टिस से सच्चाई मालूम होती है। वे बताती हैं कि उन्होंने जब 1977 में लखनऊ के मेडिकल कॉलेज में पढ़ना शुरू किया, तब वहां ऐसी भी महिलाएं आतीं जो पीरियड्स के दिनों में राख, रेत या मिट्टी का इस्तेमाल करके गंभीर इंफेक्शन से गुजर रही होतीं।

वे राख, रेत या मिट्टी को कपड़े में बांधकर पोटली बनाकर पैरों के बीच में रखतीं। जरा सा भी हिलती-डुलतीं तो खून पैरों पर बहने लगता। ऐसे में वे कमरे में सिमटकर रह जातीं।

जानवर की खाल और गोबर का इस्तेमाल
2019 में द गार्डियन में छपे एक लेख के मुताबिक, युगांडा में पीरियड्स ब्लड को सोखने के लिए महिलाएं जानवर की खाल तक को इस्तेमाल में लाती हैं। जांबिया में गाय के गोबर को सुखाकर कपड़े में लपेटकर इस्तेमाल किया जाता है।

आज स्थिति क्या है?
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, हिंदुस्तान में 64 फीसदी महिलाएं सेनेटरी नैपकिन, 50 फीसदी कपड़ा धोकर बार-बार इस्तेमाल करती हैं। 15 फीसदी नैपकिन का उपयोग करती हैं। कुल मिलाकर, 15-24 वर्ष की 78 फीसदी महिलाएं मासिक धर्म में स्वच्छ विधि का उपयोग करती हैं।

डॉ. बतरा के मुताबिक, जब महिलाओं को उन दिनों में खुद को स्वच्छ रखने के तरीके नहीं मालूम थे, बाजार में आज जैसे प्रोडक्ट्स भी नहीं थे और गरीबी के चलते इन नुकसानदेह चीजों का इस्तेमाल किया जाता था।

नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इन्फोर्मेशन (एनसीबीआई) पर साल 2015 में छपे शोध पत्र के अनुसार भारत में आज भी महिलाएं स्वच्छ तरीकों का इस्तेमाल नहीं कर पातीं। कई देश तो ऐसे हैं जहां सूखे गोबर का इस्तेमाल भी माहवारी के दिनों में किया जाता है।
नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इन्फोर्मेशन (एनसीबीआई) पर साल 2015 में छपे शोध पत्र के अनुसार भारत में आज भी महिलाएं स्वच्छ तरीकों का इस्तेमाल नहीं कर पातीं। कई देश तो ऐसे हैं जहां सूखे गोबर का इस्तेमाल भी माहवारी के दिनों में किया जाता है।

राख, रेत या मिट्टी वजाइना के अंदर चिपक जाए तो सेप्टिक शॉक से महिला की मौत तक हो सकती है। बच्चेदानी में अगर अंदर तक इंफेक्शन पहुंच जाए तो उससे पेट के निचले हिस्से में दर्द, सेक्शुअल रिलेशन में समस्याएं, ब्लीडिंग हो सकती हैं। इंफेक्शन के कारण ट्यूब्स ब्लॉक हो सकती हैं और आगे चलकर प्रेग्नेंसी में दिक्कतें और बांझपन तक की समस्या से सामना हो सकती है। महिलाओं के शिक्षित होने पर खुद की स्वच्छता को लेकर जागरूकता बढ़ी है।

‘हमारे जमाने में इस मुद्दे पर बात नहीं होती थी’
दिल्ली विश्वविद्यालय में 31 साल पढ़ा चुकीं 83 साल की डॉ. सीता बिम्ब्रो और बिहार की 81 साल की निर्मला मिश्रा बताती हैं कि हमारे समय में इस विषय पर बात करने की मनाही थी। हम मां से भी नहीं पूछ सकते थे कि पीरियड्स क्या है। बड़ी बहनों ने बताया कि कपड़े का इस्तेमाल कैसे करना है। हर महीने साफ सूती कपड़े का इस्तेमाल करते, महीना खत्म होने पर उन कपड़ों को सुखाकर फिर उसे अगली बार इस्तेमाल के लिए रख देते। एक जमाना था जब पीरियड्स पर घरों में बात नहीं होती थी। लेकिन आज हमारे पोते-पोतियां खुलकर इस पर हमसे बात करते हैं।

एवरी इंफैंट मैटर्स संस्था चार देशों के साथ महिला और बच्चों की हेल्थ पर काम करती है। इस संस्था की सीईओ डॉ. शैली बतरा कहती हैं कि अब बाजार में ऐसे भी सैनिटरी नैपकिन उपबल्ध हैं, जो पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाते। हालांकि, इनकी कीमत इतनी ज्यादा होती है कि गांव की महिलाएं इन्हें खरीद ही नहीं सकतीं। गांव, जहां पानी की किल्लत है, पीरियड्स के कपड़े को धोकर दोबारा इस्तेमाल करना मुश्किल हो जाता है। वे महिलाएं जो पैड अफोर्ड नहीं कर सकतीं, वे साफ सूती कपड़े को इस्तेमाल कर सकती हैं।

'पीरियड उतना ही नॉर्मल जितना पुरुषों का सीमेन'
भोपाल के बंसल अस्पताल में साइकेट्रिस्ट डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी के अनुसार, ‘यूरीन, सलाइवा, मल, पुरुष का सीमेन…यह बॉडी की फिजियोलॉजी है। जितनी साधारण यह चीजें हैं उतना ही पीरियड भी है। इसे किसी तरह का पाप या गंदा खून नहीं माना जाना चाहिए।
विज्ञान और शैक्षणिक प्रगति की वजह से मेंस्ट्रुअल प्रोडक्ट्स तो बाजार में आ गए। आगे भी संभावनाएं बनी रहेंगी, लेकिन इसके बारे में बातचीत में सहजता लानी होगी। जिस तरीके से विज्ञान ने राख से कप तक का ट्रांसफार्मेशन किया, अब समाज अपनी सोच को अपडेट करे और इसे एक शारीरिक प्रक्रिया माने।

पीरियड को छुआछूत का विषय मानने वाला समाज स्त्री के पीरियड रुकते (मेनोपॉज) ही उसे बुढ़िया करार कर देता है। ऐसे समाज में स्त्री को सिर्फ सेक्स टॉय की तरह देखा जाता है। समाज का यह दोहरा रवैया शर्मनाक है।
पीरियड को छुआछूत का विषय मानने वाला समाज स्त्री के पीरियड रुकते (मेनोपॉज) ही उसे बुढ़िया करार कर देता है। ऐसे समाज में स्त्री को सिर्फ सेक्स टॉय की तरह देखा जाता है। समाज का यह दोहरा रवैया शर्मनाक है।

हालात यह है कि जैस कलीरे टच कर देने से या दुल्हन की जयमाल डाल लेने से शादी जल्दी हो जाएगी, वैसे ही लड़कियां पीरियड होने वाली लड़की को छूकर अपने पीरियड को न्योता देती हैं। ऐसे टोटकों की भी कमी नहीं है।

साल 2018 में पैडमैन मूवी आने के बाद इस विषय पर थोड़ी झिझक दूर हुई है। पीरियड लीव मिलने लगी है, लेकिन जिसे हम आधी आबादी कहते हैं वो पूरी आबादी की जननी है और यह माहवारी ही उसे जननी का रूप देती है। फिर इसे अछूत क्यों मानें? पीरियड से जुड़ी सोच को धर्म-कर्म और अंध विश्वासों के छलावे से बाहर निकालना होगा। समाज का स्त्री को सशक्त बनाने के सही दिशा में पहला कदम होगा।

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