‘शब्दों’ से सेहत पर संकट:पीरियड्स की जगह कोई बोलती है ‘आंटी आई है’, कोई कहती ‘रेड लाइट’ पर सही शब्द पर शर्म क्यों?

8 महीने पहलेलेखक: मीना
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आंटी आ गई, हैप्पी बर्थडे, लाल रंग आ गया है, अभी रेड लाइट ऑन है, महीना आ गया है, लाल बाबू शुरू हो गया है, अभी थोड़ी सी डाउन चल रही हूं...ये कोई कोड वर्ड नहीं हैं, बल्कि महिलाओं की पीरियड्स डिक्शनरी है। आज भी महिलाएं पीरियड्स शब्द बोलने की जगह कोड वर्ड में बात करती हैं। ये कोड वर्ड बताते हैं कि महिलाओं के लिए माहवारी आज भी शर्म या झिझक की बात क्यों है? इस विषय पर वाराणसी में 'मुहिम' संस्था चला रहीं स्वाति सिंह कहती हैं कि मैं पिछले छह सालों से पीरियड्स के मुद्दे पर काम कर रही हूं और सस्टेनेबल मेंस्ट्रुएशन पर जोर देती हूं। स्वाति बताती हैं कि काम करते हुए देखा है कि परिवारों में आज भी माहवारी शब्द बोलने पर झिझक है। हमारा समाज कागजों पर प्रगतिशील हो रहा है, लेकिन दिमागी तौर पर आज भी कुंठाओं और झिझक से भरा है। सिंपल सा शब्द पीरियड्स इतना कठिन बना दिया है कि लोग सिर्फ ये शब्द बोलने की जगह बाकी सारे शब्द बोलते हैं और इशारों में बात करते हैं।

पीरियड्स बोलने पर शर्म कैसी?
पीरियड्स बोलने पर शर्म कैसी?

समाज सेविका स्वाति बताती हैं कि मैंने देखा है कि सिर्फ ग्रामीण महिलाएं ही पीरियड्स या माहवारी बोलने में नहीं कतराती हैं, बल्कि शहर के पढ़े-लिखे लोग भी इस शब्द को बोलने में शर्म महसूस करते हैं। पीरियड्स शुरू होते ही लड़कियों को समझाया जाता है कि अब लड़कों से बात मत करना, तुम सयानी हो गई हो... इन शब्दों से कुल मिलाकर परिवार यह समझाना चाहता है कि अब लड़की शादी के लायक हो गई है और बच्चे पैदा कर सकती है। मतलब एक लड़की का अस्तित्व सिर्फ बच्चे पैदा करना ही है, जबकि माहवारी के दिनों में लड़कियों को जिस तरह की डाइट की जरूरत होती है वो उन्हें नहीं मिलती। इसके बदले में मिलती हैं हिदायतें।

समाज सेविका स्वाति सिंह
समाज सेविका स्वाति सिंह

‘पीरियड्स की महत्ता पर बात नहीं होती’
विज्ञापन देखकर महिलाओं में इतनी समझ आई है कि पीरियड्स होने पर पैड लेना है, लेकिन इसके हाइजीन और हेल्थ के पहलू पर चुप्पी है। पहले उन्हें परिवार यह नहीं समझाता कि पीरियड्स आने की वजह क्या है, जब ये आते हैं तब हाइजीन के हिसाब से किन बातों का ध्यान रखना चाहिए। यहां तक कि स्कूलों में भी टैक्स्ट बुक्स में किशोरावस्था शब्द इस्तेमाल किया जाता है।
इस शब्द पर चुप्पी जान का खतरा : डॉ. शैली बतरा
दिल्ली के बतरा अस्पताल में स्त्री रोग विभाग की प्रमुख डॉ. शैली बतरा का कहना है कि महिलाएं पीरियड्स पर चुप्पी रखती हैं और डर में जीती हैं। यही डर और शर्म आगे जाकर इंफेक्शन, ब्लीडिंग और जान तक का खतरा बढ़ा देता है। जहां-जहां शिक्षा कम है वहां पीरियड्स से जुड़े मिथक ज्यादा हैं। बच्चियों के पास जब पीरियड्स से जुड़ी सही जानकारी नहीं होती तो वे इसके चक्र को भी नहीं समझ पातीं।

डॉ. शैली बतरा
डॉ. शैली बतरा

कई बच्चियों जिनको पहली बार पीरियड्स आते हैं तो चौंक जाती हैं। उन्हें नहीं मालूम होता कि नॉर्मल पीरियड्स की टाइमिंग 3 से 4 दिन है, अगर किसी को 15 दिन तक ब्लीडिंग हो रही है तो वह दिक्कत है। ऐसे में नॉर्मल पीरियड्स तक की जानकारी उनके पास नहीं होती और ज्यादा ब्लीडिंग होने से शरीर में दूसरी बीमारियां पनपने लगती हैं।
पीरियड्स के बारे में जानकारी न होने पर अनसेफ सेक्स और अबॉर्शन तक नौबत आ जाती है। कम उम्र में ही बच्चियों को बुरे खामियाजे भुगतने पड़ते हैं। जिस कम्युनिटी में पीरियड पर बात नहीं होती वहां बच्चियां शारीरिक खतरों के साथ-साथ मानसिक परेशानियां भी भुगतती हैं।
कैसे खत्म करें शर्म, क्या है हल?
पीरियड्स पर चुप्पी और शर्म को तोड़ने को लेकर दिल्ली की क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. प्रज्ञा मलिक का कहना है कि हमारे पुरुष प्रधान समाज में पीरियड्स ही नहीं महिलाओं का स्वास्थ्य प्रमुख मुद्दा माना ही नहीं जाता। उन्हें हमेशा सेकेंडरी माना जाता है। इस वजह से उन्हें मेंटल इलनेस भी ज्यादा बढ़ती हैं, क्योंकि वे खुलकर अपनी बात को कह नहीं पातीं। पीरियड पर बात करके और स्कूली स्तर पर बच्चों को समझाकर ही लोगों को जागरुक किया जा सकता है। दूसरा, परिवारों में जब खुलापन होगा तो बेटियां खुलकर अपनी बात रख पाएंगी। पीरियड्स की महत्ता को जब परिवार समझेंगे तो इस स्टिगमा से बाहर निकलने में देर नहीं लगेगी।
समाज आज भी कुंठाओं और शर्म से भरा है, यही वजह है कि पीरियड जैसा आसान शब्द लोग बोलने में कतराते हैं। इस शब्द पर चुप्पी से लड़कियों को बड़े खामियाजे भुगतने पड़ते हैं। यह खामियाजा मानसिक और शारीरिक दोनों रूपों में होता है।

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