सिजोफ्रेनिया:ये नहीं है पागलपन की बीमारी, जानें क्या कहते हैं मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट

21 दिन पहलेलेखक: श्वेता कुमारी
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सिजोफ्रेनिया एक ऐसी मानसिक परेशानी है, जिससे जूझने वाले लोगों को पागल कहकर बुलाया जाता है। इतना ही नहीं, लोगों में जागरूकता की इतनी कमी है कि इस मानसिक समस्या का इलाज करने वाले डॉक्टर्स को पागलों का डॉक्टर कहा जाता है। ऐसा कहना है साइकेट्रिस्ट डॉ. धर्मेंद्र सिंह का। भास्कर वुमन से हुई खास बातचीत में उन्होंने बताया क्या है ये बीमारी, जिसका ट्रीटमेंट करवाने में अब भी लोगों को शर्मिंदगी महसूस होती है।

क्या है सिजोफ्रेनिया?

हमारे दिमाग में डोपामाइन नाम का न्यूरोट्रांसमीटर है, जो दिमाग और शरीर में तालमेल बिठाने का काम करता है। जब किसी भी वजह से दिमाग में डोपामाइन केमिकल जरूरत से ज्यादा बढ़ जाता है, तब सिजोफ्रेनिया की समस्या देखी जाती है। मानसिक अस्थिरता की ये स्थिति दो कारणों से हो सकती है। पहला जेनेटिक और दूसरा उस इंसान के आसपास का माहौल। डॉ. सिंह के मुताबिक बच्चे के मां-बाप में से किसी एक को ये परेशानी होती है, तो बच्चे में सिजोफ्रेनिया होने की संभावना 11 से 12 % तक होती है। वहीं अगर किसी बच्चे के मां-बाप दोनों ही इस मानसिक समस्या से जूझ रहे होते हैं, तो उस बच्चे में ये बीमारी होने की समस्या 40% तक होती है।

केस स्टडी से समझें सिजोफ्रेनिया की गंभीरता

एक केस स्टडी का जिक्र करते हुए डॉ. सिंह ने बताया कि उनके पास राजस्थान का एक मामला आया था, जहां एक व्यक्ति सिजोफ्रेनिया की समस्या का शिकार था। उसकी मानसिक हालत और हरकतों की वजह से उसका परिवार इस हद तक परेशान था कि उसे जंजीर से बांधकर रखा जाता था। उसे खाना भी दूर से फेंक कर दिया जाता था। उस व्यक्ति गिरती मानसिक स्थिति को देखकर भी घरवालों ने उसे पागल समझकर उसका इलाज नहीं कराया, जिसके वजह से वो व्यक्ति एक ही जगह टॉयलेट और पॉटी करता था और कई बार अपनी रोटी तक उसमें डुबो लेता था। ऐसी मानसिक हालत को भी ठीक किया जा सकता है, बस लोगों में समझदारी की जरूरत है।

सिजोफ्रेनिया में लोगों के साथ क्या होता है?

ऐसे लोग अकेले रहते हैं, दूसरों से दूरी बनाकर रखते हैं और कम बोलते हैं।

इस समस्या में लोग मटरिंग टू सेल्फ यानी खुद अपने आप से बुदबुदाकर बातें करते हैं।

हर वक्त उनके दिमाग में ये बात रहती है कि कोई उन्हें देख रहा है या उनका पीछा कर रहा है।

हर किसी को देखकर सोचते हैं कि सब उन्हीं के बारे में बातें कर रहे हैं या उन पर हंस रहे हैं।

ये मरीज हर जाने-अनजाने चेहरे से डरते हैं। उन्हें लगता हैं कि कोई उन्हें मार देगा।

पीड़ित को कभी आवाजें सुनाई देती हैं, तो कभी वो दिखाई देता है, जो होता ही नहीं है।

क्या ठीक हो सकते हैं सिजोफ्रेनिया से ग्रसित लोग?

इसके लक्ष्ण को तीन भागों में बांटा गया है। पॉजिटिव, नेगेटिव और कोगनिटिव सिम्टम। जिन्हें ये बीमारी जेनेटिक कारणों सी होती है उनमें नेगेटिव और कोगनिटिव सिमटम्स होने की संभावना ज्यादा होती है। यानि उनमें समस्या पॉजिटिव के मुकाबले गंभीर होती है। वहीं पॉजिटिव सिम्टम की बात करें, तो इस स्टेज में दवाइयां कारगार साबित होती है। शरीर और दिमाग दवाई पर रेस्पौंड करता है और इंसान जल्द ही ठीक हो जाता है।

वहीं नेगेटिव और कोगनिटिव स्टेज में लोगों को ठीक होने में थोड़ा समय लगता है।डॉ. सिंह के मुताबिक जिसे लोग पागलपन कहते हैं, असल में वो दिमाग में होने वाली केमिकल प्रॉब्लम है। इस मानसिक बीमारी में लोगों के मौत की वजह ज्यादातर सुसाइड देखी जाती है। सिजोफ्रेनिया को लेकर लोगों में जो डर की स्थिति है, उसके खिलाफ जागरूकता की जरूरत है, ताकि लोग अपनी जिंदगी खत्म करने की स्टेज तक न पहुंचे और समय रहते ठीक हो जाएं।

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