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कोविड और सोशलाइजिंग:हर वक्त कोरोना के साये में रहते बच्चों के बर्ताव में आ रहा अजब बदलाव

8 दिन पहलेलेखक: सुनाक्षी गुप्ता
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  • कोविड के बाद अजनबियों से मिलने से घबराने लगे हैं बच्चे, दादा-दादी और नाना-नानी से भी बनाने लगे हैं दूरी
  • सोशल डिस्टेंसिंग करते-करते कहीं एंटी सोशल तो नहीं बन रहा आपका बच्चा, कोविड और लॉकडाउन डाल रहा बच्चों के दिमाग पर बुरा असर
  • डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट 130 देशों में 60 % बच्चे ले रहे मेंटल हेल्थ सर्विस

कुछ दिनों पहले मैं अपने अपार्टमेंट में जाने के लिए लिफ्ट का इंतजार कर रही थी, यकायक मेरी नजर एक तीन से चार वर्ष के बच्चे पर पड़ी, जो अपनी मां के साथ लिफ्ट का ग्राउंड फ्लोर पर आने का इंतजार कर रहा था। थोड़ी देर मोबाइल में देखने के बाद जब मेरी नजर उस बच्चे से टकराई तो अपने आप मेरा हाथ हवा में लहराते हुए उस बच्चे की ओर इशारा करने लगा और मुंह से निकला ‘हेलो डियर’। बस इतना कहने की देरी थी कि वह बच्चा जो पहले हवा में हाथ-पांव मार रहा था और बार-बार अपना मास्क ऊपर-नीचे कर खेल रहा था, अचानक अपनी मां से चिपट गया और मेरी तरफ हैरान निगाहों से देखने लगा, मानो मैंने कोई अटपटी सी बात कह दी हो। बच्चे के बचाव में मम्मी ने हेलो का रिप्लाई दिया और बच्चे का नाम भी बताया। हम लिफ्ट में चढ़े और थोड़ी देर में मैं अपने घर पहुंच गई, लेकिन इस बीच बच्चे के चेहरे पर स्माइल तक नजर नहीं आई। ये देख पहले तो मुझे ताज्जुब हुआ और मन में सबसे पहले यही ख्याल आया कि शायद बच्चा शर्माता होगा, जल्द दूसरों से घुलता-मिलता नहीं होगा। इसलिए ऐसे बरताव कर रहा है, लेकिन कुछ दिन बाद एक स्टडी में पढ़ा कि करीब डेढ़ साल से घरों में कैद रहने को मजबूर हुए ये बच्चे अब सोशलाइजिंग करने से डरने लगे हैं।

क्या कहती है रिसर्च?
नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इंफॉर्मेशन द्वारा जारी रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 3-6 साल के छोटे बच्चों में सबसे ज्यादा क्लिंजीनेस (clinginess) यानी माता-पिता से चिपके रहने की आदत बन गई है। उन्हें अपने घर के लोगों के इंफेक्टेड होने का सबसे ज्यादा डर रहता है इसलिए वह उन्हें अकेला नहीं छोड़ते, जबकि 6-18 वर्ष के बच्चों में बीमारी के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी लेने की उत्सुक्ता रहती है। वहीं चाइल्ड और यूरोपियन पीडियाट्रिक एसोसिएशन की स्टडी में पाया गया कि लंबे समय तक आइसोलेशन में रहने के बाद छोटे बच्चों को सबसे ज्यादा ध्यान लगाने में दिक्कत आ रही है, वे क्लिंजीनेस और चिड़चिड़ेपन से परेशान रहते हैं। इसलिए जल्द अजनबियों से मिलना पसंद नहीं करते।
कोरोना का प्रकोप जैसे-जैसे बढ़ रहा है सोशल डिस्टेंसिंग, आइसोलेशन और लॉकडाउन जैसे शब्द हमारी भाषा में शामिल होते जा रहे हैं, यह भी संभव है कि आगे चलकर एंटी-सोशलाइजिंग और इंट्रोवर्ट जैसे शब्द भी हमारे लिए आम हो जाएं। चारदिवारी में सिमट कर रहना हमारी मजबूरी नहीं बल्कि च्वॉइस बन जाए और बच्चे सोशल डिस्टेंसिंग करते-करते एंटी सोशल बन जाएं। ऐसे समय में पेरेंट्स की जिम्मेदारी दोगुनी हो जाती है कि वे उन्हों कोरोना से तो बचाएं, साथ ही उनके बदलते बर्ताव पर भी ध्यान दें।

दोस्तों से बनी दूरी तो बच्चों के विकास पर पड़ा असर
एक वो समय था जब बच्चें हमउम्र दोस्तों के साथ पार्क में खेलने जाते थे, खेलते हुए लड़ते-झड़ते और गिरते-पड़ते। किसी के घर जाकर खेलते या खिलौनों को शेयर करते। ये छोटे-छोटे पल उन्हें सोशल और मिलनसार बनाते थे, जोकि कोविड के कारण नॉर्मल जिंदगी से गायब हो गए हैं। जिसका असर बच्चों के व्यवहार पर भी पड़ रहा है, कोविड के माहौल में बड़े हो रहे बच्चों के लिए उनके माता-पिता ही उनका पूरा संसार बनते जा रहे हैं। बच्चे पेरेंट्स के साथ ज्यादा सेफ महसूस करते हैं। आसपास का माहौल और अपने पेरेंट्स का डर देखकर इतना सहम चुके हैं कि जल्द ही घबरा जाते हैं। उन्हें अपने जैसा कोई व्यक्ति नहीं दिखता, जिससे अपनी बात कर सकें, क्योंकि इस महामारी ने उन्हें अपनों से भी दूरी बनाना सिखाया है। यही वजह है कि अब बच्चों के व्यवहार में चिड़चिड़ापन दिखने लगा है। वे किसी से बात करना पसंद नहीं करते हैं, उन्हें अंजान चेहरों से मेलजोल बढ़ाने में डर लगता है। यहां तक की बच्चे दादा-दादी या किसी रिश्तेदार के घर जाने पर भी घबराने लगे हैं। जल्द घुलने-मिलने को भी तैयार नहीं होते और पेरेंट्स के लिए परेशानी बढ़ जाती है।

कोरोनाकाल में बच्चों को मानसिक बीमारियों ने घेरा
आमूमन पांच साल तक के बच्चे आस-पास की चीजें देखकर सीखते हैं और ये उनके ग्रोथ ईयर्स माने जाते हैं, लेकिन कोरोना के कारण बच्चों को एक्सप्लोर करने का मौका ही नहीं मिल रहा। ग्रोथ ईयर्स में आइसोलेशन में रहना बच्चों और पेरेंट्स दोनों के लिए खतरनाक साबित हुआ है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन ने अक्टूबर 2020 में जारी सर्वे रिपोर्ट में बताया कि कोरोनाकाल में 130 देशों में करीब 60 % बच्चे और किशोर ऐसे रहे, जो किसी न किसी तरह की मेंटल हेल्थ सर्विस ले रहे हैं। लॉकडाउन में रहने के कारण बच्चों से लेकर बड़े सभी मानसिक रूप से बुरी तरह से प्रभावित हुए। डिप्रेशन, स्ट्रेस और एंजायटी के साथ ही ईटिंग डिसऑर्डर ने बड़ों के साथ बच्चों को भी घेरा।
एम्स के मनोचिकित्सा विभाग के विशेषज्ञों का कहना है कि महामारी के समय आइसोलेशन में रहने से बच्चों की नॉर्मल एक्टिविटी एकदम से रुक गई। स्कूल बंद रहे तो ऑनलाइन पढ़ाई चलती रही। ऐसे में बच्चे अपने हमउम्र दोस्तों से दूर रहने को मजबूर हो गए, जिस कारण उनकी बातें भी सीमित हो गई। सारा वक्त बड़ों के बीच गुजारने से बच्चों की इमोशनली हेल्थ पर बेहद असर पड़ा है। फर्क सिर्फ इतना है कि बच्चे अपनी एंजायटी, डर और परेशानी को शब्दों में बयां नहीं कर पाते हैं। यही कारण है कि वे ज्यादा बीमार पड़ रहे हैं और पैनिक होकर अजीब तरह से पेश आने लगे हैं।

बच्चों की साइकोलॉजिकल हेल्थ पर पड़ रहा असर
यूनिसेफ और चाइल्ड लाइन ने बच्चों की साइको-सोशल हेल्थ पर जारी रिपोर्ट में जिक्र किया गया कि महामारी बच्चों के विकास और साइकोलॉजी पर असर डाल रहा है। क्योंकि कोविड से पहले बच्चे आपस में मिलते थे और कुछ न कुछ सीखते रहते थे। घर में बंद रहने से उनका फिजिकल कॉन्टेक्ट कम रहा और दोस्तों से दूरी बनने से सोशल गैप बढ़ा है। रिसर्च में कोविड का साइड इफेक्ट गिनाते हुए लिखा है कि जिन बच्चों के पास लिमिटेड कांटेक्ट रहते हैं, उन्हें भविष्य में हिंसा, घरेलू हिंसा, लिंग आधारित हिंसा या शारीरिक दंड का सामना करने की संभावना बढ़ जाती है। बच्चे इस तरह की हिंसा का शिकार होने पर मदद मांगने में सबसे ज्यादा घबराते हैं, क्योंकि उनका दायरा बहुत सीमित होता है। ऐसे में पेरेंट्स को ये ध्यान देने की जरूरत है कि वे किस तरह धीरे -धीरे अपने बच्चों को नॉर्मल जिंदगी की ओर वापस लाएं और उन्हें स्ट्रेस, डर, एंजायटी व हिंसा से बचाते हुए उनकी साइको-सोशल रूप से मदद करें।

पेरेंट्स इस तरह कर सकते हैं बच्चों की मदद

1 - अगर बच्चा बोल नहीं रहा तो उसके मन की बात जानने के लिए उसे ड्राइंग और पेंटिंग के लिए प्रेरित करें।
2- बच्चे से सीधे बीमारी और इंफेक्शन की बात न करें, बल्कि उनसे बात करने का क्रिएटिव तरीका निकालें।
3 - घर में हमेशा खुशी का माहौल बनाने की कोशिश करें।
4 - घर में अगर किसी तरह का आर्थिक संकट भी आए तो उसकी चर्चा बच्चों के सामने न करें, ताकि उनपर मानसिक दबाव न पड़े।
5 - दुनिया से कनेक्ट कराने और लोगों से परिचित कराने के लिए छोटे बच्चों को वीडियो कॉल के जरिये दोस्तों और परिवार के लोगों से मिलवाते रहें।

बच्चों के लिए जरूरी हेल्पलाइन

  • एंजायटी होने पर बच्चे Childline 1098 हेल्पलाइन नंबर पर कॉल कर काउंसलर से बात करें।
  • खास मदद के लिए NIMHANS toll free number - 8046110007 पर संपर्क करें।
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