प्रियंका चोपड़ा की बेटी 100 दिन तक कहां रही:नन्ही गुड़िया क्यों दूर रही मम्मी पापा से, NICU सुना है क्या

नई दिल्ली2 महीने पहलेलेखक: निशा सिन्हा
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  • सौ में से 40 बच्चों की मौत प्रसव के दौरान या 24 घंटे के अंदर हो जाती है।
  • 9% नवजात, जन्मजात विकृतियों की वजह से दुनिया छोड़कर चले जाते हैं।

मदर्स डे के दिन प्रियंका की बिटिया घर आई। वे 15 जनवरी को सरोगेसी की मदद से मां बनी थी। उनकी बिटिया प्रीमैच्योर पैदा हुई थी इसलिए जन्म के बाद एक्ट्रेस उसे घर नहीं ला पाई थी।

मां से दूर कहां रही प्रियंका की लाडली
कुछ दिन पहले ही प्रियंका ने अपनी बेटी का नाम दुनिया के साथ शेयर किया। उनकी बिटिया का नाम है मालती मारी चोपड़ा जोनस। प्रियंका अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर बिटिया के नाम को MM लिखा है। प्रीमैच्योर जन्म होने के कारण अभी तक मालती अपने पेरेंट्स से दूर ‘नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट’ में थी। वहां 100 दिनों तक रखे जाने के बाद वह घर आई। आमतौर पर इस यूनिट में प्रीमैच्योर शिशु को रखा जाता है।

भारत में करीब 35 लाख बच्चे समय से पहले जन्म लेते हैं। इसमें से 15 लाख बच्चे बर्थ डिफेक्ट्स के साथ पैदा होते हैं। प्रति वर्ष करीब 10 लाख बच्चों को एनआईएसयू से डिस्चार्ज किया जाता है, जो किसी न किसी वजह से वहां एडमिट होते हैं।
भारत में करीब 35 लाख बच्चे समय से पहले जन्म लेते हैं। इसमें से 15 लाख बच्चे बर्थ डिफेक्ट्स के साथ पैदा होते हैं। प्रति वर्ष करीब 10 लाख बच्चों को एनआईएसयू से डिस्चार्ज किया जाता है, जो किसी न किसी वजह से वहां एडमिट होते हैं।

नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट ही क्यों
दिल्ली स्थित फोर्टिस ला फेमे के नियोनेटोलॉजी विभाग के निदेशक डॉ. रघुराम मलाइहा के अनुसार, “नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट (NICU) में प्रीमैच्योर बेबी को रखा जाता है। बेबी के जन्म के पहले महीने में अगर नवजात को किसी तरह की दिक्कत हो रही हो, तो उसे एनआईसीयू में रखने की जरूरत पड़ती है।
इसके अलावा डिलीवरी डेट से 24 सप्ताह पहले शिशु जन्म होने पर, ब्रीदिंग की प्रॉब्लम में, जॉन्डिस हो जाने पर, फीडिंग से जुड़ी दिक्कतें आने पर बेबी को NICU में रखा जाता है। एक महीने तक के नवजात को भी इसमें रखा जा सकता है।”

नवजात शिशुओं की मृत्युदर में कमी आई है। साल 1990 की तुलना में साल 2016 में न्यूबॉर्न की मौत में 10 लाख की कमी पाई गई। इतना ही नहीं महिलाओं की प्रसव संबंधी स्वास्थ्य सुविधाओं के बढ़ने की वजह से मां की मृत्युदर में भी कमी देखी गई।
नवजात शिशुओं की मृत्युदर में कमी आई है। साल 1990 की तुलना में साल 2016 में न्यूबॉर्न की मौत में 10 लाख की कमी पाई गई। इतना ही नहीं महिलाओं की प्रसव संबंधी स्वास्थ्य सुविधाओं के बढ़ने की वजह से मां की मृत्युदर में भी कमी देखी गई।

डॉ. रघुराम मलाइह के मुताबिक, "डिलीवरी के लिए पेरेंट्स को हमेशा ही ऐसे हॉस्पिटल को चुनना चाहिए, जहां सभी सुविधाओं से लैस NICU की व्यवस्था हो और साथ ही प्रीमैच्योर बेबी की देखभाल के लिए स्पेशलाइज्ड डॉक्टर और नर्स हों।
दरअसल, नॉर्मल प्रेग्नेंसी में भी कई बार यह पता नहीं चल पाता है कि कब प्रीटर्म लेबर शुरू हो जाए। बेबी के जन्म समय किसी नियोनेटल एक्सपर्ट की जरूरत पड़ जाए। हाईरिस्क प्रेग्नेंसी की स्थिति में इस बात का और भी ख्याल रखा जाना जरूरी हो जाता है।"

डिस्चार्ज होने के बाद भी बेबी को रखें सबसे दूर
एनआईसीयू से बेबी के डिस्चार्ज किए जाने के बाद भी डॉक्टर के संपर्क में रहना जरूरी है। इसके अलावा पेरेंट्स को इस बात का भी ख्याल रखना चाहिए कि बेबी बहुत सारे लोगों के संपर्क में नहीं आए। अक्सर न्यूबॉर्न को देखने के लिए घर में रिश्तेदारों का आना-जाना शुरू हो जाता है। इससे बचना जरूरी है।
नए बच्चे को घर के लोग भी प्यार से चूमते हैं, इन चीजों से पूरी तरह बचना चाहिए। डिस्चार्ज होने के बाद मां को बेबी की फीडिंग का खास ख्याल रखना चाहिए, जिस तरह से एनआईसीयू में रखा जाता था। कई बार ब्रीदिंग प्रॉब्लम या इंफेक्शन के कारण भर्ती हुए बेबी को बाद में भी फॉलो-अप के लिए बुलाया जाता है।

मां और बच्चे दोनों की स्थिति पहले से बेहतर
विश्व में हर साल करीब 2.5 करोड़ बच्चे जन्म लेते हैं। इसका 5वां हिस्सा भारत में पैदा होता है। एक अनुमान के अनुसार इसमें से प्रति मिनट एक शिशु की मृत्यु हो जाती है। यूनिसेफ के आंकड़ों के अनुसार सौ में से 40 बच्चों की मौत प्रसव के दौरान या 24 घंटे के अंदर हो जाती है जबकि 100 में से 35 नवजात प्री टर्म लेबर की वजह से होती है। करीब 33% संक्रमण, 20% दम घुटने और 9% जन्मजात विकृतियों की वजह से दुनिया छोड़कर चले जाते हैं।
हालांकि इस रिपोर्ट में इस बात का भी जिक्र किया गया है कि जन्म के तुरंत ब्रेस्टफीड कराने, जरूरी टीका लगाए जाने से मृत्यु दर में कमी आई है। इसके ठीक एक दशक पहले तक 10 में से 6 महिलाओं की डिलीवरी घर में कराई जाती थी। इस वजह से मां और नवजात दोनों जोखिम में होते थे। इस संख्या में 3 गुना कमी पाई गई।

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