लाडले/लाडली का रखें ध्यान:भारत में छोटी उम्र में ही क्यों दिखने लगते हैं डायबिटीज के सिमटम्स? जानें क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स

6 दिन पहलेलेखक: श्वेता कुमारी
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भारत के लगभग हर घर में कोई न कोई डायबिटीज का पेशेंट मिल ही जाता है। जहां पहले बुजुर्गों को खाने-पीने में सावधानी बरतने की हिदायत दी जाती थी, अब ये सलाह बच्चों को दी जाने लगी है। इसकी वजह है, बच्चों में बढ़ता प्री डायबटिक सिमटम्स। इस बारे में हमने बात कि है कोकिलाबेन धीरुभाई अंबानी हॉस्पिटल की कंसल्टेंट एंडोक्रिनोलॉजिस्ट एंड डाइबेटोलॉजी, डॉ. निशा कैमल और थिंक यू के डायटीशियन, डॉ. हिमांशु राय से।

डायबिटीज उम्र देखकर नहीं होती

डायबिटीज की बात करें, तो भारत का नाम, दुनिया के बाकी देशों के मुकाबले पहले नंबर पर आता है। हमारा देश डायबिटीज कैपिटल ऑफ द वर्ल्ड के नाम से भी प्रचलित है। वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाईजेशन के मुताबिक भारत में 8.7% आबादी डायबटिक हैं, जो 20-70 साल की उम्र के हैं। वहीं कम उम्र के बच्चों या युवाओं की बात करें, तो उनमें भी डायबटिक होने के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय, यूनिसेफ और पापुलेशन काउंसिल अमंग चिल्ड्रेन एंड अडोलेसेंस ने देश का पहला नूट्रिशनल सर्वे किया। 2019 में जारी की गई सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक, 10 में से एक बच्चा प्री डायबटिक है।

बच्चों में क्यों बढ़ रही है डायबटीज की समस्या?

डॉ. निशा बताती हैं कि मौजूदा समय में बच्चे ग्राउंड में कम और घरों में ऑनलाइन गेम खेलना ज्यादा पसंद करते हैं। उन्हें घर के हेल्दी फूड की बजाय जंक फूड लुभाते हैं। इसकी वजह से उनका वजन बढ़ रहा है, जो कि प्री डायबटिक होने का एक बड़ा कारण हो सकता है। साथ ही कोविड के दौरान घरों में रहते हुए बच्चों का वजन तेजी से बढ़ा है। यही वजह है कि उनके पास कई ऐसी पेरेंट्स आ रहे हैं, जिनके बच्चों का वजन बीते डेढ़-दो साल में तेजी से बढ़ा है।

नूट्रिशनिस्ट डॉ. हिमांशु राय का कहना है कि लोगों में स्वाद को सेहत से ऊपर रखने की मानसिकता है। मार्केट में स्वाद का ऐसा जाल बिछा है कि सेहत लगातार पीछे छूट रहा है। बच्चे तो ऐसे भी चंचल होते हैं, उन्हें वही पसंद आता है, जो उनकी हेल्थ के लिए अच्छा नहीं होता। लोग हाई कैलोरीज, हाई शुगर से भरे लजीज खाना खाने के आदि होते जा रहे हैं। इसकी वजह से मोटापा भी तेजी से बढ़ रहा है, जो कई बीमारियों की जड़ बनता जा रहा है। इनमें डायबिटीज सबसे आम बीमारी है।

कहीं आपके लाडले/लाडली में तो नहीं है ये सिमटम्स?

हमारे देश में मोटे को मोटा नहीं, हेल्दी कहा जाता है। अगर उम्र और हाइट के हिसाब से जितना होना चाहिए उससे अधिक वजन हो जाए, तो परिवार को लगता है कि बच्चे को खाना लग रहा है और वो स्वस्थ हो रहा है। गोल-मोल बच्चों को यहां स्वस्थ माना जाता है। हालांकि इस मानसिकता को बदलने की जरूरत है। किसी भी बीमारी को पहचानने का तरीका है, उससे जुड़े सिमटम्स पर ध्यान देना।

अगर बच्चा प्री टीनएज, टीनएज या फिर यंग एडल्ट होते-होते मोटापे का शिकार हो रहा है, तो जरूरी है कि उसकी सेहत पर ध्यान दिया जाए। इसके अलावा बार-बार पानी की तलब होना, थोड़ी-थोड़ी देर में यूरिन के लिए बाथरूम जाना और दिनभर आलस-सुस्ती महसूस करना भी डायबिटीज के लक्ष्ण हो सकते हैं। ऐसे में परिवार डॉक्टर से मिलकर ये जानने की कोशिश करें कि कहीं बच्चा डायबिटीज या किसी अन्य बीमारी का शिकार तो नहीं!

बच्चों को ऐसे रखें डायबटीज से दूर

  • बच्चों को हेल्दी डाइट की जरूरत समझाएं।
  • उन्हें आसपास के बच्चों के साथ फिजिकल गेम्स खेलने के लिए प्रोत्साहित करें।
  • डेली रूटीन में बच्चे के साथ मिलकर एक्सरसाइज करें।
  • जितना हो सके फास्ट फूड से दूर रखें।