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आप भी कोरोना से डर रहे हैं:PM मोदी के 'ताली-थाली मंत्र' का राज एक्सपर्ट से समझें, अनजाने खौफ से निकाल रहे घर के पूजाघर

15 दिन पहलेलेखक: कमला बडोनी
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ईश्वर के प्रति आस्था होने से आपका विश्वास दृढ़ होता कि आप या आपके अपनों के साथ कुछ भी बुरा नहीं होगा। जब आप पॉजिटिव रहते हैं तो आपका हर काम अच्छा होता है और ईश्वर में आस्था रखने से खुद पर विश्वास बढ़ता है। कोरोना काल में लोगों का पूजाघर के प्रति झुकाव क्यों बढ़ा, इसके बारे में बता रही हैं रिलेशनशिप काउंसलर माधवी सेठ।

डर का मनोविज्ञान

माधवी सेठ कहती हैं, “कोरोना के बाद लोगों का ईश्वर के प्रति झुकाव बढ़ा है और इसमें कोई बुराई नहीं है। साइकोलॉजी में इसे ‘फियर ऑफ अननोन’ यानी अनजाना डर कहते हैं और ये हर इंसान में होता है। इंसान की एक फितरत ये भी है कि जब एक ही तरह का डर उसे बार-बार महसूस होता है, तो वह अपने डर से बाहर निकलने के उपाय ढूंढने लगता है। सभ्यता की शुरुआत में बादल गरजना, बिजली चमकना... प्रकृति से जुड़ी ऐसी घटनाओं को लेकर जब इंसान का डर बढ़ा, तो उस में इनके प्रति जानने की उत्सुकता बढ़ी और उसने इनकी वजहें जानकर अपने डर को कम किया।"

कोरोना काल में अदृश्य शक्ति पर विश्वास बढ़ा

कोरोना काल में अमीर से लेकर गरीब तक सभी ‘फियर ऑफ अननोन’ से जूझ रहे थे। इस डर ने लोगों को घरों में कैद कर लिया था। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि ये अचानक उनके साथ क्या हो रहा है। उनके मन में डर बैठ गया था कि पता नहीं कब ये बीमारी उन्हें या उनके किसी अपने को अपनी चपेट में ले लेगी। इस डर से बाहर निकलने के लिए लोगों ने ईश्वर की शरण ली। ईश्वर की आराधना भी एक ‘अदृश्य शक्ति’ पर विश्वास है, जो इंसान को ये भरोसा दिलाती है कि डरो मत, सब अच्छा होगा। इस अदृश्य शक्ति को हर धर्म, समुदाय के लोगों ने मूर्त या अमूर्त रूप में स्वीकारा है और अपनी आस्था के अनुरूप उसकी आराधना की। ये शक्ति उन्हें विश्वास दिलाती है कि उनके साथ कुछ भी बुरा नहीं होगा, जिससे उनका आत्मविश्वास बढ़ता है और वे उस स्थिति का आत्मविश्वास के साथ सामना करते हैं। ईश्वर के प्रति इसी विश्वास ने कोरोना काल में घर के मंदिर के प्रति लोगों का विश्वास बढ़ाया और आध्यात्मिकता के प्रति लोगों का रुझान बढ़ा।

आस्था की शक्ति

अदृश्य शक्ति के प्रति आस्था ही लोगों को मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, चर्च तक ले जाती है। जो स्थिति इंसान की सोच, उसकी पहुंच से परे होती है, वहां पर वह अदृश्य शक्ति से राह दिखाने की प्रार्थना करता है। फिर उसका विश्वास ही उसे आगे की राह दिखाता है। कोरोना काल में भी यही हुआ। जब लोगों के मन में ‘फियर ऑफ अननोन’ बढ़ने लगा, तो उन्होंने घर के मंदिर की शरण ली और ईश्वर से अपनी और अपनों की रक्षा करने की प्रार्थना की। भारत जैसा विशाल आबादी वाला देश अपनी आस्था और सही लाइफस्टाइल के कारण ही कोरोना पर विजय पा सका।

पूजा में ताली बजाने का रहस्य

प्रधानमंत्री मोदी ने जब दीया जलाने, ताली या थाली बजाने की बात की, तो भले ही उनका बहुत मजाक उड़ाया गया हो, लेकिन ये नुस्खा भी ‘फियर ऑफ अननोन’ पर विजय पाने का ही प्रयास था, ताकि लोगों को ये विश्वास हो कि उनके साथ कुछ बुरा नहीं होगा। दीया जलाने को हम अंधकार से प्रकाश की तरफ बढ़ने का प्रतीक मानते हैं। इसी तरह ताली या थाली बजाने के पीछे ये मान्यता जुड़ी है कि ऐसा करने से असुर शक्ति या नेगेटिव एनर्जी उस जगह से चली जाती है।

आज भी हमारे मंदिरों में ताली, थाली, ढोल बजाए जाते हैं। पहले राजा के दरबार में डंका बजाया जाता था, डंका भी थाली का ही विशाल रूप है। इसे बजाने के पीछे कहीं न कहीं असुर शक्ति पर विजयी पाना ही था। हमारी आधी तकलीफ उसी समय कम हो जाती है, जब हमें ये विश्वास होता है कि हमें कुछ नहीं होगा, सब ठीक हो जाएगा। ईश्वर के प्रति आस्था हमें यही विश्वास दिलाती है और हमारा आत्मविश्वास बढ़ाती है।

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