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किड्स कॉर्नर:एक्सपर्ट से जानें बच्चों को सोशल, इमोशनल और मेंटल सपोर्ट कैसे दें, उनके साथ इंटरेक्शन बढ़ाएं, मिलकर काम करने का महत्व बताना भी जरूरी

डॉ. दिनेश चौधरी, असिस्टेंट प्रोफेसर एंड कंसल्टेंट25 दिन पहले
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कोरोना संक्रमण के चलते हुए लॉकडाउन ने लोगों को एक-दूसरे से दूर कर दिया है। स्कूल-कॉलेज और ट्यूशन बंद होने के कारण बच्चों की दुनिया अब घर की चारदीवारी में सिमटकर रह गई है। ऐसे में उनके लिए परिवार या घर में मौजूद पेट्स ही दुनिया हैं, लेकिन घर में लंबे समय तक बंद रहने से उनकी मानसिक और शारीरिक समस्याएं सामने आने लगी हैं।

इसके अलावा न्यूक्लियर फैमिली और माता-पिता दोनों के वर्किंग होेने का असर बच्चों के सोशल बिहेवियर पर भी पड़ रहा है। हालांकि सरकार ने लॉकडाउन तो खत्म कर दिया है, लेकिन पैरेंट्स सुरक्षा की खातिर अब भी बच्चों को बाहर लेकर निकलने में डर रहे हैं। अब मोबाइल फोन, कम्प्यूटर और गेम्स बच्चों की दिनचर्या का अनिवार्य हिस्सा बन गए हैं। सफल और बेहतर जीवन के लिए जरूरी है कि बच्चों में सोशल स्किल भी विकसित हो। सोशल स्किल बच्चों में साझेदारी की भावना विकसित करती हैं और उनके मन से अकेलेपन की भावना को कम करती हैं।

बच्चों मेंं साामाजिकता की कमी ऐसे पहचानें :

  • वे शादी-ब्याह आदि फंक्शन में जाने से कतराएं।
  • - अन्य लोगों से बात करने से बचें। अकेले रहना पसंद करें।
  • बार-बार पूछने पर भी जवाब न दें या अनिच्छा से बात करें।
  • परिवार के साथ बैठने के बजाय अलग रहें।
  • उनके मन की बात न होने पर गुस्सा दिखाएं या जिद करें।
  • एंग्जाइटी और डिप्रेशन में रहना।
  • नए दोस्त या अन्य किसी से मेलजोल बनाने में अरूचि होना।

सोशल इंटरेक्शन बढ़ाएं

1. समाजशास्त्रियों का कहना है कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है। उसे अपनी योग्यता और क्षमता को विकसित करने के लिए भावनात्मक रिश्तों की जरूरत होती है। अब बच्चों की बात करें तो वे तो खिलते हुए फूल हैं। ऐसे में उनके सर्वांगीण विकास में सोशल लाइफ की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसलिए आज के हालात को देखते हुए पैरेंट्स की जिम्मेदारी बढ़ गई है। उन्हें बच्चों को सोशल, इमोशनल और मेंटल सपोर्ट देना हाेगा।

2. शब्दों का बच्चों के मन-मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ता है। संक्रमण में हम सोशल डिस्टेंसिंग के बजाय फिजिकल डिस्टेंसिंग शब्द इस्तेमाल करें क्योंकि हमें लोगों से सामाजिक निकटता तो रखना है, लेकिन फिजिकल डिस्टेंस बरकरार रखते हुए। बच्चों को वीडियाे कॉल या चैट के जरिए उनके दोस्तों से टच में रहना सिखाएं। सोशल मीडिया का उपयोग एक साथ मिलकर खेलने में भी कर सकते हैं।

3. बच्चों के साथ खेल खेलना एक शैक्षणिक और मनोवैज्ञानिक तरीका है, जिसकी मदद से हम उनमें सोशल और कांग्नीटिव स्किल्स डेवलप कर सकते हैं। इसमें बोर्ड गेम से लेकर एक्स्ट्रा स्किल वाले गेम भी हो सकते हैं। इससे पैरेंट्स को स्पेशल फैमिली टाइम भी मिलेगा जिसमें अन्य बातों को छोड़कर पूरा परिवार एक साथ एंजाॅय करेगा।

4. बच्चों की हर जरूरत के समय उनके लिए मानसिक और शारीरिक रूप से उपलब्ध रहें, परंतु उन्हें थोड़ा पर्सनल स्पेस भी दें। बढ़ती उम्र के साथ उनके व्यवहार में बदलाव आता है, इसलिए इसका भी ध्यान रखें।

5. बच्चों को घर के काम में इन्वॉल्व करें जिससे उनका कॉन्फिडेंस बढ़ेगा और क्रिएटिविटी के साथ एक्स्ट्रा स्किल डेवलप होगी। रूटीन में बदलाव से भी वे रिलैक्स महसूस करेंगे। बच्चों को किचन के छोटे-मोटे काम सिखाएं। उनकी मर्जी से काम करने पर उन्हें प्रोत्साहित भी करें। खेल-खेल में उन्हें आपसी रिश्ते, मिलकर काम करने के महत्व और शक्ति को समझाएं।