लहंगा क्यों हो रहा महंगा:20 हजार में बना लहंगा बिकता है 50,000 का, पाकिस्तानी कारीगरी भी पड़ रही भारी

नई दिल्ली2 महीने पहलेलेखक: अनिमेष मुखर्जी
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हिंदी फिल्म का एक सुपरहिट गाना है ‘रेशम का लहंगा मेरा, लहंगा है महंगा मेरा’। लहंगे की बात शादियों वाले घरों में सबसे ज्यादा होती है। शादियों का मौसम चल रहा है। किसी घर से बेटी विदा होने वाली है तो किसी घर में दुल्हन आने वाली है।

तो आज 'फुरसत का रविवार' में लहंगा शॉपिंग पर ही बात करते हैं। लहंगा शॉपिंग की बात हो और उसमें दुल्हन की पसंद को सर्वोपरि न माना जाए ऐसा कैसे हो सकता है। चाहे जेब का पैसा और समय दोनों ही क्यों न खर्च हों।

लेकिन लहंगे की शॉपिंग को समझने के लिए उसके बाजार को समझना होगा। जिसमें कपड़ा, रंग, कढ़ाई और डिजाइन अहम भूमिका निभाते हैं।

दुल्हन का किसी लहंगे पर दिल आ जाए तो मम्मी-पापा जेब नहीं देखते। आप भी लहंगे के फैशन सेंस को समझने के लिए लहंगे पर होने वाले काम और कारीगरों की मेहनत को जान लीजिए।

कपड़ा और कलर पसंद का मिलने के बाद लहंगे पर हुआ काम या कारीगरी सबसे ज्यादा पसंद आने वाली चीज है। लहंगे में कई तरह की कारीगरी होती है, जिसमें जरदोजी का काम सबसे अहम माना जाता है।

नूरजहां के टाइम में शुरू हुई ज़रदोज़ी और चिकनकारी

जरदोजी शब्द फ़ारसी के ज़र से बना है। इसका मतलब हुआ कपड़े पर सोने के तारों से कढ़ाई। ये चलन मुगल साम्राज्ञी नूरजहां के समय शुरू हुआ और अवध के नवाबों के समय में ज़रदोज़ी औऱ चिकनकारी अपनी बुलंदी पर पहुंचे।

इसीलिए पारंपरिक ज़रदोज़ी के प्रमुख ठिकाने अवधी इलाके लखनऊ, बरेली और फ़र्रुखाबाद, बनारस वगैरह हैं। मुगलों और राजस्थान के राजपूत घरानों में वैवाहिक संबंध रहे, तो राजस्थानी शैली में जरदोजी के काम का एक केंद्र जयपुर बना।

वाजिद अली शाह अवध से विस्थापित होकर कलकत्ता के मटियाबुर्ज में रहे और उनके साथ अवध के कई हुनर कलकत्ता पहुंचे। इसी के चलते ज़रदोज़ी के पुराने ठिकानों में कलकत्ता का नाम भी जुड़ गया।

गुजरात का सूरत शहर मशीन पर होने वाले ज़रदोज़ी के काम का आज बड़ा ठिकाना है। मशीन और हाथ के काम के अंतर और इनकी कीमतों का हिसाब-किताब समझेंगे, लेकिन उससे पहले अलग-अलग तरह के काम को विस्तार से समझते हैं।

वेडिंग सीजन में ज़रदोज़ी की बात चली है तो इसे पहचानने का तरीका भी जान लेते हैं...

तो चलिए पहले आपको वहां ले चलते हैं जहां लहंगे बनते हैं। लहंगे बनते तो कई जगह हैं, लेकिन हमने ज़रदोज़ी के काम को समझने के लिए मशहूर शहर फर्रुखाबाद को चुना, क्योंकि नामी-गिरामी डिजाइनर अपने ब्राइडल वेयर कलेक्शन का काम यहां कराते हैं।

फैशन डिजाइनर फर्रुखाबाद आकर तैयार करवाते हैं कलेक्शन

बताया गया कि फर्रुखाबाद में ज़रदोज़ी का बहुत बड़ा कारोबार है। इसी शहर के अली हुसैन भी हाथ से बने ज़रदोज़ी के लहंगों का काम करते हैं। अली भाई बताते हैं कि शादियों के सीजन में कई बार उनकी सांसें अटकी रहती हैं, क्योंकि लहंगा ऑर्डर देने वाली लड़कियों को अपनी शादी के दिन सबसे सुंदर दिखने की चाह होती है।

कई बार ऐसा होता है कि अगर भावी दुल्हन को लहंगे के काम और खूबसूरती को लेकर जरा भी शक हो जाए तो महीनों की मेहनत पर पानी फिर सकता है। हजारों-लाखों की कीमत का लहंगा अगर शादी करने वाली लड़की के मन से उतर गया, तो फिर सिचुएशन को संभालना बड़ा मुश्किल होता है।

अब भले ही यह बात हल्के-फुल्के अंदाज़ में कही गई हो, लेकिन लड़कियों की पोशाक में लहंगा एक ऐसी चीज है, जिसकी बराबरी दूसरी किसी ड्रेस से नहीं हो सकती।

फिर शादी के लिए बने लहंगों की तो बात ऐसी है कि उसकी सुंदरता के आगे कीमत, महंगाई और दूसरी बातें फीकी पड़ जाती हैं। भले ही एक-दो बार पहना जाए, लेकिन उसे संभालकर पीढ़ियों के लिए रखा जाता है। कहते हैं ना कि शौक बड़ी चीज है।

‘लहंगा है महंगा मेरा’ और माधुरी दीक्षित की पॉपुलैरिटी

हम कह सकते हैं कि माधुरी दीक्षित आखिरी हीरोइन हैं जिनके लिए इस देश में अलग लेवल की दीवानगी देखी गई। अगर शाहरुख खान ने शादियों में रंगीन कुर्तों और दुपट्टे का चलन शुरू किया, तो माधुरी दीक्षित के खाते में लहंगे और ज़रदोज़ी को पॉपुलर फैशन बना देने का श्रेय जाता है।

माधुरी पर फिल्माए कई गाने और उन गानों में पहने गए लहंगे दोनों ही हिट हैं जिसे लड़कियां अपनी शादी में कॉपी करना पसंद करती हैं।

हालांकि, खासतौर से शादी के ज़रदोज़ी के काम के लहंगे का ट्रेंड फिल्म ‘देवदास’ के चलते शुरू हुआ। इस फिल्म में माधुरी का ‘ढाई श्याम रोक लई’ गाने में पहना गया मरून रंग का लहंगा अपनी कारीगरी और ख़ूबसूरती की वजह से 30 किलो का हो गया था। एक और जगह उनका पहना गया सुनहरा मिरर वर्क वाला लहंगा भी बेहद हिट हुआ।

मिडिल ईस्ट और यूरोप तक पहुंची कढ़ाई वाले लहंगे की मांग

अली हुसैन कहते हैं कि इस फिल्म के ज़रिए फैशन डिज़ाइनर अबू जानी और संदीप खोसला की जोड़ी ने ज़रदोज़ी को एक एवरग्रीन ट्रेंड बना दिया। नहीं तो लोग ज़रदोज़ी को पुराने दौर की भारी और चमक-दमक वाली कारीगरी मान चुके थे।

‘देवदास’ के बाद आई संजय लीला भंसाली की ‘बाजीराव मस्तानी’ जैसी फिल्म ने भी ज़रदोज़ी को चमकाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

देवदास में ही ऐश्वर्या राय की सुनहरे बॉर्डर वाली नीली साड़ी और ‘डोला रे डोला’ गाने में पारंपरिक लाल किनारी की सफ़ेद साड़ी पर सुनहरी ज़री का काम भी पसंद किया गया।

इन सबकी खूबसूरती इतनी थी कि चाहे छोटा शहर हो या बड़ा शहर, शादी हो या संगीत, भारी कढ़ाई के काम की डिमांड भारत से लेकर मिडिल ईस्ट और यूरोप तक पहुंच गई।

सोने-चांदी के थ्रेड यानी पारंपरिक ज़रदोज़ी, अब मेटल का इस्तेमाल

माल का काम मतलब कॉपर के पतले-पतले महीन स्प्रिंग से बने हुए डिज़ाइन। पुराने ज़माने में ये महीन थ्रेड सोने चांदी के होते थे, अब सस्ते मेटल का इस्तेमाल होता है। इस तरह के काम में चारपाई जैसे एक फ्रेम में कपड़ा फंसाया जाता है और कागज़ पर स्टेंसिल से डिज़ाइन उतारा जाता है।

स्टेंसिल वाली लाइनों पर सुई से छेद किए जाते हैं, जिन पर कढ़ाई होती है। इसके बाद क्रोशिए से मिलती जुलती एक सुई इस्तेमाल की जाती है। इस सुई को ‘आरी’ कहते हैं और इससे कपड़ों पर कढ़ाई की जाती है।

ब्राइडल लहंगों में अब भी 80 प्रतिशत मांग लाल, मैरून और रानी (मैजेंटा) कलर की है, तो सबसे ज़्यादा कढ़ाई सुनहरे रंग की होती है।

रेड, मैरून और मैजेंटा कलर्स की मांग के साथ लॉन्ग जैकेट की मांग भी देखी जा रही है...

पेस्टल शेड के लहंगे फेवरेट, इनमें टीकी और कारदाने के डिजाइन

ब्राइडल कलर के अलावा आजकल प्रचलित हुए पीच, टर्क्वाइज, बेज, स्मोक ग्रे, लाइलैक जैसे पेस्टल शेड्स भी खूब लोकप्रिय हैं जिनमें सिल्वर कलर से ज़रदोज़ी की कढ़ाई होती है। गुलाबी, नीले या इन लहंगों से मिलते-जुलते गोल सितारे भी टांके जाते हैं जिसे ‘टीकी’ कहा जाता है। टीकी के अलावा ‘मुकेश’ और ‘कारदाने’ से भी डिज़ाइन बनाए जाए हैं।

रेशम के धागे से कढ़ाई और चिपकाने वाला ऐप्लीक वर्क

माल और टीकी के अलावा रेशम के धागों से कढ़ाई करके उसके बीच में टीकी और कारदाने लगाने वाला स्टाइल भी पॉपुलर है। अलग-अलग टुकड़ों पर कढ़ाई करके उन्हें कपड़े पर चिपकाने वाला ऐप्लीक का काम भी होता है।

चमकीले नग कपड़े पर चिपकाकर डिज़ाइन बनाने का काम हाथ की कारीगरी के मुकाबले सस्ता होता है। इसकी मांग और दाम दोनों ही कम है।

राजपूती ‘गोटा-पट्टी’ के काम का गढ़ है जयपुर

जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर है कि इस तरह के काम का मुख्य ठिकाना राजस्थान है। जयपुर गोटा-पट्टी के काम का गढ़ है। इन डिजाइनों में गोटे और फूल-पत्तियों के काम का बोलबाला होता है।

यह फर्रुखाबाद में बने लहंगे पर हाथ के काम की ज़रदोज़ी है।
यह फर्रुखाबाद में बने लहंगे पर हाथ के काम की ज़रदोज़ी है।

लहंगे में की गई खास कारीगरी के अलावा हाथ से किया जाने वाला ढेर सारा छोटा-मोटा काम होता है, जो महिलाएं करती हैं। हमारे लिए जरूरी था कि हम इन हुनरमंद महिलाओं से भी बात करें। लेकिन कोई इन औरतों से बात कराने को राजी नहीं था।

वहां के लोगों को कहना था कि चूंकि ये महिलाएं पारंपरिक मुस्लिम परिवेश से आती हैं। इसलिए घरों में पाबंदियां होती हैं।

इस बीच, हमारी मुलाकात यूनुस अंसारी से हुई और उन्होंने महिला कारीगरों ने बात कराने का वादा किया।

लेकिन यूनुस का एक सवाल- ‘हमारी इस बातचीत का क्या नतीजा निकलेगा, क्या हमारे पैसे बढ़ जाएंगे, मुझे थोड़ा कचोट गया। क्योंकि हमारा इरादा तो यहां वेडिंग सीजन में लहंगा मार्केट को खंगालना था। इसलिए जवाब में मेरे पास मुस्कुराने के अलावा कुछ नहीं था।’

लाखों का लहंगा तैयार करने वाले हाथों में आते हैं महीने के 1000-1500 रुपए

यूनुस हमें चूने और नील से पुते कत्थई रंग की चौखट वाले मकान पर ले गए। देहरी का जर्जर दरवाजा, मोटे से कपड़े का फूलों के प्रिंट वाला एक बदरंग पर्दा दिखा।

पर्दे के अंदर जाने पर सामने एक आंगन था, उसके बाद बरामदा जिस पर ज़रदोज़ी का अड्डा लगा हुआ था और उसके बाद एक तंग अंधेरा कमरा जहां दिन में भी बल्ब जलाने की जरूरत पड़े। ऐसा कुछ भी नहीं दिखा जो घर की बदहाली को ढंकता।

खैर, ज़रदोज़ी के लिए बने चारपाईनुमा लकड़ी का फ्रेम लगा था और उस पर गहरे लाल रंग के जॉर्जेट के कपड़े पर कढ़ाई की पतली पट्टी दिख रही थी।

कमरे में कुर्सी, स्टूल या चौकी कुछ भी नहीं थी। वो हाथ जो लहंगे की कीमत को लाखों का बना देते हैं, उनके अपने घर कितने खाली होते हैं, इस अहसास से मन अचानक लहंगे के वजन से भी ज्यादा भारी हो गया।

ज़रदोज़ी के हाथ से किए काम की पहचान लहंगा को पलटकर देखकर भी की जा सकती है।
ज़रदोज़ी के हाथ से किए काम की पहचान लहंगा को पलटकर देखकर भी की जा सकती है।

मेहरूनिस्सा यानी नूरजहां ने ईरान से भारत बुलाए थे कारीगर

चलिए, अब मिलते हैं कपड़ों पर ज़रदोज़ी का काम करने वाली मेहरुन्निसा से। अब ये भी देखिए कि इस मेहरुन्निसा की जिंदगी ज़रदोज़ी के भरोसे चल रही है, जबकि इतिहास में एक और मेहरुन्निसा हुई हैं, जिसकी ज़िंदगी में भी ज़रदोज़ी की बड़ी अहम जगह थी। तारीख उसे मुगल बादशाह जहांगीर की सबसे खास बेगम नूरजहां के नाम से जानती है।

मेहरुन्निसा यानी नूरजहां ने ईरान से कारीगर हिंदुस्तान बुलाए। उन्होंने ज़रदोज़ी और कारीगरों के हुनर को शाही रुतबा दिया। हालांकि, अवध के इलाके में कपड़ों पर सोने-चांदी के तारों की कढ़ाई की परंपरा काफी प्राचीन है। हर्षवर्धन कालीन बौद्ध ग्रंथों में इस तरह की कला का ज़िक्र मिलता है और प्राचीन कान्यकुब्ज का बड़ा हिस्सा ही आगे चलकर अवध कहलाया।

अब इतिहास की मेहरुन्निसा और ब्राइडल फैशन की दुनिया में सबसे निचले पायदान पर खड़ी मेहरुन्निसा की ज़िंदगियों में ज़मीन आसमान का अंतर है।

शादी का सबसे बड़ा आकर्षण दूल्हा-दुल्हन की जोड़ी होती है। इसमें भी दुल्हन का लहंगा बेहद खास होता है। ज़रदोज़ी की कढ़ाई वाले ये लहंगे डिज़ाइनर स्टूडियो में 40-50 हजार रुपए से शुरू होकर लाखों रुपए तक के बिकते हैं।

20 हजार रुपए का लहंगा बाहर आकर हो जाता है 50 हजार का

कारखाने से बनकर जो लहंगा 20 हजार रुपए में बाहर आता है उसमें कारखाने वाले का मुनाफा शामिल होता है। वो कारीगरों को नौकरी पर रखता है। ये कारीगर एक दिन में दो शिफ्ट में काम करते हैं।

शिफ़्ट को इनकी ज़बान में ‘नफ़री’ बोलते हैं। अच्छे कारखाने में 11 घंटे की दो नफरी होती हैं। और उन्हें 300 रुपए प्रति शिफ्ट मिलते हैं। यानी 11 घंटे काम करने के बाद 500-600 रुपए रोज़ की कमाई होती है।

ये रेट सबसे काबिल कारीगरों और सबसे बड़े कारखानों का है। ढेर सारे लड़के सिर झुकाए आरी नाम की क्रोशिए जैसी सुई से कढ़ाई करते रहते हैं और पीछे मोहम्मद रफ़ी, अनवर और अल्ताफ़ रज़ा के गाने लगातार बजते रहते हैं।

फर्रुखाबाद में क्रोशिए जैसी सुई से कढ़ाई करते कारीगर मिल जाएंगे।
फर्रुखाबाद में क्रोशिए जैसी सुई से कढ़ाई करते कारीगर मिल जाएंगे।

अब आप सोच रहे होंगे कि मेहरुन्निसा जैसी महिला कारीगरों की जरूरत कहां पड़ती है, हम बताते हैं..

लहंगे की कमर पर बांधी जाने वाली बेल्ट या थोड़ा सरल डिज़ाइन जैसे काम मेहरुन्निसा जैसी महिला कारीगरों को दिया जाता है। मेहरुन्निसा को बेल्ट टांकने का काम मिला था। मेहरुन्निसा को बेल्ट टांकने का 100 रुपए मिलता है।

अगर कपड़े पर कोई दाग लग जाए तो, धुलाई का पैसा भी इसी नफरी में से कटेगा। कोई और नुकसान हुआ तो उसकी भी भरपाई करनी होगी। महीने भर की मेहनत के बाद सिर्फ 1500 रुपए मिलते हैं। किराए के मकान में बिजली का बिल करीब 800-1000 रुपए बनता है।

आगे हम लहंगों के कारोबार और उनके दाम के बारे में पढ़ेंगे लेकिन इस ग्रैफिक से जान लेते हैं अभी किस तरह के लहंगों का ट्रेंड है...

एक ब्राइडल कलेक्शन तैयार करने में कम से कम 25-30 लाख जरूरी

ब्राइडल वेयर के डिज़ाइनर अमूमन पुरुष ही होतै हैं, चाहे फिर वे सब्यसाची हो या मनीष मल्होत्रा। नाम न छापने की शर्त पर हमें एक डिज़ाइनर ने बताया कि ब्राइडल वेयर सबसे बड़ी लागत वाला काम है। अगर 25 लहंगों का कलेक्शन भी बनाएं, तो 25-30 लाख इन्वेस्ट हो जाएंगे।

इसके बाद उसे पेश, शो करने, किसी सेलेब्रिटी को पहनाने और उसका विज्ञापन करने के लिए बड़ा बजट चाहिए। ऐसे में वही डिज़ाइनर ब्राइडल कलेक्शन में हाथ डालते हैं जो बिजनेस मोड में काम करते हैं।

सब्यसाची मुखर्जी हों या मनीष मल्होत्रा इन सबके बड़े फिल्म स्टूडियो में अच्छे संबंध हैं। ये ब्राइडल फैशन इंडस्ट्री के धुरंधर हैं। इनका हाथों का बना सामान हाथोंहाथ बिक जाता है। लेकिन अगर आप इन डिजाइनर के बनाए लहंगे आपकी जेब शूट नहीं करते तो बाजार में इनके डुप्लिकेट भी मौजूद हैं जो आधे दामों में मिल जाते हैं।

किफायती लहंगों के बारे में जानने से पहले ग्रैफिक से इनके रखरखाव के बारे में जान लेते हैं...

मशीन की कढ़ाई वाले लहंगे होते हैं सस्ते, सूरत में होते हैं तैयार

हाथ से बने लहंगों की महंगी कीमत के चलते मशीन से तैयार लहंगे भी काफी पॉपुलर हैं। इस तरह के ज़्यादातर लहंगे सूरत में बनते हैं। इनकी कीमत हाथ की कढ़ाई से आधी या उससे भी कम होती है।

इन लहंगों में मशीन से धागे के घने डिज़ाइन बनाकर उस पर ऊपर से कुछ सितारे चिपका या टांक दिए जाते हैं।

कम बजट में तैयार होने वाला यह काम आपको रॉयल फीलिंग दे सकता है, लेकिन मशीन की कढ़ाई में हाथ से की गई कढ़ाई जितनी बारीकी और सफाई नहीं मिलेगी।

हाथ की कारीगरी पर बिजली का बिल और GST भारी

हाथ से की जाने वाली जरदोजी के सामने कई चुनौतियां हैं, जिससे इसकी कीमत बढ़ जाती है। इसकी महीन कढ़ाई के लिए रोशनी की ज़रूरत होती है। देश में सबसे महंगी बिजली उत्तर प्रदेश में है। इससे लहंगा बनाने की लागत बढ़ जाती है। इसके बाद इन लहंगों पर 12% जीएसटी लगता है। यानी 20,000 का लहंगा थोड़ा सा ऑल्टरेशन और जीएसटी मिलाकर 25 हजार का हो ही जाता है।

कई बार दुकानदार मशीन से बने लहंगों को हाथ से की गई असली ज़रदोज़ी बताकर बेच देते हैं। इसलिए अगर आप लहंगा लेने जाएं, तो पहचान के लिए इन बातों का ध्यान रखें।

पाकिस्तान से आने वाला बेहतरीन सस्ता लहंगा दे रहा टक्कर

जब तक हमारे पब्लिक सेलेब्रिटीज की शादियां देखकर उन पर फिदा होती रहेंगी, तब तक भारी और महंगे लहंगों की डिमांड बनी रहेगी। लहंगा होगा, तो ज़रदोज़ी भी जिंदा रहेगी। हमारे यहां की कारीगरी को बढ़ावा देने के लिए इसे सरकारी सहायता, कम टैक्स दरें और दूसरी सुविधाएं मिलें, तो इसकी लागत और कीमत दोनों कम होंगी। नहीं तो पाकिस्तान से आने वाला बेहतरीन लहंगा भी दस्तक देने लगा है। इसकी कीमत भारत के लहंगों से कम भी रहती है।

पाकिस्तान में बनने वाले लहंगों की कीमत भले ही कम होती है लेकिन वहां की रॉयल फैमिली में भारतीय डिजाइनर के ड्रेस काफी पसंद किए जाते हैं...

वैसे पाकिस्तान की बात पर आपको एक किस्सा बताते चलें। खूबसूरत लहंगों पर नाज़नीनों का दिल आ जाता है, ये तो आपने सुना ही होगा। लेकिन फर्रुखाबाद के लहंगे बनाने वाले कारीगर जमाल पर पाकिस्तान की एक खवातून का दिल आ गया था।

अब 23 साल के जमाल मियां भी इसी साल जून में ‘गदर’ के तारा सिंह बनकर पाकिस्तान पहुंच गए और निकाह पढ़वा और दुल्हन ले आए। अब इस पर इतना ही कहा जा सकता है कि जब कोई चीज़ दिल को भा जाती है, तो सीमाएं पीछे छूट जाती हैं और बजट मायने नहीं रखता।

(अनिमेष मुखर्जी फूड और फैशन ब्लॉगर हैं)

इनपुट्सः कमला बडोनी, ग्रैफिक्स: सत्यम परिडा

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