कॉफी विद ताहिरा / जिंदगी काटने के लिए नहीं वैल्यू एड करने के लिए है, हम सब खुश रहने के हकदार : कैंसर सर्वाइवर ताहिरा कश्यप

जवाहर लाल नेहरू कैंसर अस्पताल एवं अनुसंधान केंद्र की सिल्वर जुबली पर भोपाल के मिंटो हॉल में आयोजित कार्यक्रम में कैंसर सर्वाइवर ताहिरा कश्यप खुराना ने साझा किया कैंसर को मात देने का अपना मंत्र...

Life is for value added, not for cutting, we all deserve to be happy: Cancer Survivor Tahira Kashyap
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Life is for value added, not for cutting, we all deserve to be happy: Cancer Survivor Tahira Kashyap

Dainik Bhaskar

Jan 11, 2020, 01:20 PM IST

लाइफस्टाइल डेस्क. जवाहर लाल नेहरू कैंसर अस्पताल एवं अनुसंधान केंद्र की ओर से शुक्रवार को रजत जयंती वर्ष के मौके पर भोपाल में कैंसर सर्वाइवर्स मिलन समारोह का आयोजन किया जा रहा है। दो दिवसीय इस समारोह के पहले दिन मिंटो हॉल में 'कॉफी विद ताहिरा कश्यप खुराना' का विशेष सत्र रखा गया। समारोह में बड़ी संख्या में कैंसर सर्वाइवर्स, कैंसर मरीज और उनके परिजन, पूर्व सांसद सुरेश पचौरी, विधायक विश्वास सारंग, जवाहर लाल नेहरू कैंसर अस्पताल एवं अनुसंधान केंद्र की अध्यक्ष आशा मदन जोशी और सीईओ दिव्या पाराशर उपस्थित थीं। इस दौरान ताहिरा से बतौर एंकर बात की हॉस्पिटल की ऑन्कोसर्जन डॉ. नीलू मल्होत्रा ने -

एंकर- आपकी जिंदगी में बधाएं आईं, उस सफर के बारे में बताइए?
ताहिरा-
सेहत हो, फाइनेंस हो या रिश्ते हर किसी की जिंदगी में 'ग्रे क्लाउड्स' आते ही हैं। लेकिन हर बाधा में कोई न कोई सिल्वर लाइनिंग जरूर होती है। हम मुश्किल हालात से निपटकर ही बेहतर इंसान बनते हैं। मैं बुद्धिज्म को फॉलो करती हूं- जो बताता है कि अगर कोई समस्या आई है तो मुझे कुछ सिखाने आई है।

एंकर- आपको कभी लगा कि ऐसा मेरे साथ ही क्यों हुआ?
ताहिरा- आज 10 जनवरी 2020 की तारीख तक मैंने यह सवाल खुद से नहीं पूछा है। मेरा तरीका यह था कि चैलेंज को एक चैलेंज की तरह लो और अपना बेस्ट सामने लाओ। ऐसे समय में किसी मजबूत सपोर्ट सिस्टम कि जरूरत पड़ती है, जैसे मेरे लिए बुद्धिज्म की प्रैक्टिस। मैंने अपनी मनोदशा ऐसी रखी कि बीमारी को खुद पर हावी नहीं होने दिया। और यह कहना बड़ा अजीब लगता होगा लेकिन मैं अपने इस सफर को सेलिब्रेट करना चाहूंगी और मैंने किया भी। (और इसी के साथ तालियां बजने लगी)

एंकर- कई सारे कैंसर सर्वाइवर हमारे साथ हैं, उनको क्या मैसेज देना चाहेंगी?
ताहिरा- मैं उन सभी महिलाओं को सलाम करती हूं, उनको भी जिन्होंने यह जंग जीती और उन्हें भी जो यह नहीं जीत पाए। इन सबकी कहानियां प्रेरणा देने वाली हैं। मुझे महिलाओं से प्यार है, यह एक ऐसी प्रजाति है जो कभी हार नहीं मानती, हारकर भी फिर खड़े होने की हिम्मत रखती है।

एंकर- सर्जरी के बाद आपने अपना ध्यान कैसे रखा?
ताहिरा - मैंने फूड, वर्कआउट का ध्यान रखा। और यह भी सुनिश्चित रखा कि मेरी मानसिक सेहत अच्छी रहे। मैं अपनी खुशी पर फोकस करती हूं। और हम सब खुश रहना चाहते है। परेशान नहीं होना चाहते। जिंदगी कट रही है…., जिंदगी काटने के लिए नहीं है वैल्यू एड करने के लिए है और हम सब खुश होने के हकदार है और यही मेरा रोज का मंत्र है। 

एंकर: आप मंडे टू फ्राइडे काम करती थीं, फिर कीमो और फिर काम?
ताहिरा:
मैं बहुत शुक्रगुजार हूं कि मेरे पास कुछ करने के लिए था। जब हमारे पास कोई मिशन होता है तो हमारी मानसिक ताकत शारीरिक ताकत से बेहतर हो जाती है। तो तब मैं अपनी फिल्म के प्री-प्रोडक्शन पर काम कर रही थी। तभी सर्जरी हुई, कीमो थैरेपी शुरू हुई। प्रोड्यूसर ने कहा अभी पोस्टपोन कर देते है। लेकिन मैंने कहा आप मुझसे मेरी जिंदगी ले लोगे। मैंने डॉक्टर्स से परमिशन ले ली है। डॉक्टरों ने यह कहा था कि जाओ लेकिन केयर करना डब्ल्यूवीसी नहीं गिरना चाहिए। किसी को कोई इन्फेक्शन है तो उससे दूर रहना। तो मेरे ऑफिस के सभी लोगों ने इसका ध्यान रखा कि मेरे आसपास कोई खांसी-जुकाम वाला न हो। इस दौरान मंडे टू फ्राइडे काम करती रही, शनिवार को कीमो करवाती थी। संडे को डब्ल्यूवीसी गिरता था तो मैं ग्रेफिन शॉट लगवाती थी।
मुझे नहीं लगता कि कीमो की इतनी साइडइफेक्ट थी जितनी ग्रेफिन की थी। ऐसे में जब तक मैं काम कर रही होती थी तो दर्द का एहसास नहीं होता था। लेकिन जिस दिन छुट्‌टी होती तो पता चलता कि यहां दर्द हो रहा है। मेरी मां ने कहा भी - कि ऑफिस में दस घंटे रहती हो तब नहीं पता चलता है। तो हम अपने मन को मजबूत बना ले तो शरीर को उसकी माननी ही पड़ेगी आधी जंग आप जीत लेंगे। और यही बात हर चैलेंज पर लागू होती है। 


एंकर: परिवार ने सपोर्ट कैसे किया?
ताहिरा: मैं बहुत खुशनसीब हूं कि मुझे ऐसा परिवार मिला। मैंने हॉस्पिटल में देखा कि कई परिवारों ने औरतों को छोड़ दिया जब उन्हें मालूम हुआ कि उन्हें कैंसर हुआ है। टाटा मेमोरियल गई तो वहां देखा कि ब्रेस्ट कैंसर वाले फ्लोर पर कई पेशेंट के साथ उनके परिवार के लोग थे कईयों के साथ कोई नहीं। यह मेरे लिए झटका था। इसलिए मैं अपने परिवार के सपोर्ट के लिए शुक्रगुजार हूं।

एंकर: आपने फिल्म डायरेक्ट की है टॉफी इसके बारे में बताइए?
ताहिरा: पिन्नी(पंजाबी लड्‌डू) मेरी दूसरी शॉर्ट फिल्म होगी। इससे पहले शॉर्ट फिल्म टॉफी रिलीज हो चुकी है। मेरे नानके जालांधर में है। गर्मियों में वहां जाती थी। वहां टीवी, इंटरनेट नहीं था। अकेली बच्ची थी, तो कैसे टाइम बिताया जाए? वहां एक लड़की मिली ऋतु जिसकी उम्र मेरे बराबर ही थी। वो टॉफियां बेचती थी। मुझे उसके साथ खेलना होता था तो टॉफियां लपेटने में मैं उसकी मदद करती थी, ताकि काम जल्दी खत्म हो औऱ् हम खेल सकें। फिर एक बार जब मैं 13 साल की उम्र में नानके पहुंची तो पता चला उसकी शादी हो गई। टॉफी का कॉन्सेप्ट यहीं से मिला। चाइल्ड मैरिज की प्रॉब्लम मेरे दिल के बहुत करीब है। मुझे इसके लिए लड़ना है।

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