प्रेमिका नीचे, पैसा ऊपर:करीब 70% लोग भविष्यवक्ताओं के पास पहुंच रहे दौलत के लिए, 30% को चाहिए बस प्यार

20 दिन पहले
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  • लगभग 80% भारतीय जीवन में एक बार ज्योतिष आजमाते हैं
  • 70% लोग करियर और 30% लोग प्यार में पहुंच रहे ज्योतिष के पास
  • वैदिक एस्ट्रोलॉजी में पुरुष ज्यादा, टैरो रीडिंग में महिला एस्ट्रोलॉजर ज्यादा

आपको अपने स्कूल का वो साथी याद है जो एग्जाम से ठीक पहले कोई न कोई मन्नत मांगता था, या फिर मंदिर जाकर माथा टेकने के बाद ही सेंटर के लिए निकलता था। परीक्षाओं के सीजन में कई लड़के-लड़कियों के हाथों में धागा, माथे पर तिलक, या गले में तावीज झूलता होता। ये सब टोटके इस बात को पक्का करते थे कि पप्पू बढ़िया नंबरों से पास हो जाए। ये तो हुई स्कूल वाली मासूमियत लेकिन पढ़ाई के बाद प्यार, परिवार और पैसों के लिए भी लोग ज्योतिष की शरण ले रहे हैं।

बढ़ी ज्योतिष की डिमांड
कोविड के बाद वैसे तो कई धंधे मंदे पड़े लेकिन एस्ट्रोलॉजी में बूम आया। लोग कुंडली से लेकर टैरो कार्ड रीडिंग में मन का सुकून खोज रहे हैं। ये कहना है टैरो मास्टर रीडर नेहा चुग का, जो पिछले 10 सालों से इस फील्ड में हैं। दैनिक भास्कर से बातचीत में नेहा कहती हैं कि उनके पास 90% से ज्यादा क्लाइंट फिलहाल टेलीफोनिक कंसल्टेशन ले रहे हैं। इनमें महिलाएं ज्यादा हैं। उनके अलावा युवा भी हैं। वे इस बात को लेकर भी आते हैं कि उन्हें किस करियर में आगे बढ़ना चाहिए। कई बार पेरेंट्स अपने बच्चों को लेकर आते हैं कि वे कौन सा सबजेक्ट लें तो बेहतर हो सकता है। बहुत सारे लोग कोविड के बाद रिलोकेशन के लिए भी कार्ड रीडिंग चाहते हैं।

कैसे काम करती है टैरो रीडिंग?
ये ताश के पत्तों की तरह कार्ड्स होते हैं। ऐसे कुल 78 कार्ड होते हैं, जो अलग-अलग रंगों या नंबरों वाले होते हैं। इन्हें अर्काना कहते हैं, लैटिन में जिसका मतलब है रहस्यों से भरा हुआ। तो रीडर का काम इसी रहस्य को सुलझाना होता है। क्लाइंट अपने सवाल के साथ कुछ कार्ड्स उठाता है। उन कार्ड्स को देखकर टैरो रीडर समझता है कि फिलहाल क्लाइंट के साथ क्या चल रहा है और फ्यूचर को किस तरफ ले जाया जा सकता है। टेलीफोन पर रीडिंग के दौरान ये होता है कि क्लाइंट कार्ड रीडर को अपना नाम और जन्मतिथि बताएंगे, जिस आधार पर कार्ड्स चुने जाएंगे।

क्या टैरो रीडिंग में भी पूजा-पाठ होता है?
नहीं। ये भविष्य जानने की वेस्टर्न विद्या है। इसमें तंत्र-मंत्र या रत्न नहीं होते, बल्कि क्रिस्टल पहनना होता है। इन्हें हीलिंग क्रिस्टल कहते हैं। ये निगेटिव एनर्जी को सोखकर पॉजिटिव चीजें आसपास लाते हैं।

पुराने तरीकों को मानने वाले ज्यादा
टैरो कार्ड एस्ट्रोलॉजी का केवल एक हिस्सा है। वैदिक एस्ट्रोलॉजी पर आज भी लोगों का भरोसा ज्यादा है। ज्योतिषों से ऑनलाइन बातचीत के लिए बनी एक बेहद लोकप्रिय साइट एस्ट्रोटॉक का दावा है कि उनके पास फिलहाल 1200 से ज्यादा ज्योतिष हैं, वहीं टैरो कार्ड रीडर्स की संख्या 300 है। ये साइट यह भी बताती है कि विदेशी और खासकर अमेरिकी यूजर टैरो पर भरोसा करते हैं, जबकि भारतीयों का विश्वास ज्योतिष के पारंपरिक तरीकों पर है, जैसे कुंडली दिखाना या हाथ दिखाना। ऐसे क्लाइंट्स की जरूरतें पूरी करने के लिए अलग-अलग भाषाएं जानने वाले और अलग टाइम जोन में काम करने वाले ज्योतिष के जानकार भी इससे जुड़े हुए हैं।

क्या है वैदिक ज्योतिष और कैसे काम करता है?
ज्योतिषाचार्य प्रदीप वर्मा पिछले 19 सालों से वैदिक ज्योतिष के पेशे में हैं। उनके मुताबिक ज्योतिष अंधविश्वास नहीं, बल्कि साइंस है, जिसमें कैलकुलेशन होता है। वे कहते हैं कि ज्योतिष का कमजोर नॉलेज रखने वाले लोग गलत कैलकुलेट करते हैं और गलत भविष्य या रेमेडी बताते हैं। इस वजह से ही लोग ज्योतिष जैसे साइंस को अंधविश्वास मानने लगे। वैदिक ज्योतिष किसी डॉक्टर की तरह काम करता है। जैसे फीवर के लिए डॉक्टर को पता होता है कि फलां दवा काम करेगी। वो दवा सजेक्ट करता है लेकिन वो पक्का नहीं जानता कि उस दवा से बुखार जाएगा या नहीं। ऐसे ही ज्योतिष भी काम करता है। उसमें नियम बताए जाते हैं लेकिन पक्का नहीं होता कि हर मरीज (क्लाइंट) पर वही नियम कितना काम करेगा। कोई 100 फीसदी ठीक हो जाता है तो किसी पर कम असर होता है।

किस परेशानी को लेकर और किस उम्र के लोग आ रहे हैं?
यहां भी ट्रेंड वही दिखा। ज्यादातर लोग करियर और मैरिज ट्रबल्स को लेकर पहुंचे। एक नई बात ये हुई कि अब कॉर्पोरेट कंपनियां भी ज्योतिषों की मदद ले रही हैं। प्रदीप वर्मा के मुताबिक उनके पास ढेरों कंपनियां आती हैं और किसी कैंडिडेट की कुंडली बनाकर ये जानना चाहती हैं कि उसे कंपनी में लेना कितना फायदेमंद होगा। आमतौर ये कैंडिडेट ऊंची पोस्ट के लिए होते हैं जिनपर कंपनी बड़ी रकम खर्च कर रही होती है। ऐसे में उसकी पढ़ाई और तजुर्बे के अलावा कंपनी ये भी पता लगाना चाहती है कि उसके सितारे कंपनी से जुड़कर क्या फायदा या नुकसान कर सकते हैं। इसे कॉर्पोरेट एस्ट्रोलॉजी कहते हैं।

ज्योतिष में पढ़ाई कितनी जरूरी?
वैदिक एस्ट्रोलॉजी में विशारद कर चुकी रत्ना श्रीवास्तव का मानना है कि इसके लिए भी पढ़ाई उतनी ही जरूरी है, जैसे सर्जरी के लिए डॉक्टरी की पढ़ाई। इसकी प्रॉपर पढ़ाई के बाद सालों तक कुंडलियां देखनी होती हैं, जिसके बाद ही कोई खुद को ज्योतिष का जानकार कह सकता है।

क्या वैदिक ज्योतिष ढकोसला है?
बिल्कुल नहीं। जिस घड़ी हम जन्म लेते हैं, उस समय ग्रहों की खास पोजिशन के मुताबिक हमारी दशाएं तय होती हैं। 9 ग्रह इसी हिसाब से किसी भी इंसान की सेहत, परिवार और पैसों पर असर डालते हैं। तो एक तरह से देखा जाए तो सबकुछ तय है लेकिन खराब चीजों को कम खराब या अच्छी चीजों को और बेहतर बनाने में वैदिक ज्योतिष मदद करता है। ये डायरेक्शन देता है ताकि हम मजबूत ग्रहों को और मजबूत बना सकें। ये ऐसा ही है, जैसे करियर में अपनी खास स्किल को और तराशना। इसके लिए बड़े-बड़े कर्मकांडों की बजाए मंत्र जाप जैसी चीजें ज्यादा असर करती हैं।

ज्योतिष का कारोबार
कुंडली दिखाना हो या फिर टैरो कार्ड रीडिंग, ज्योतिष की एक अच्छी-खासी इंडस्ट्री खड़ी हो गई है। फोर्ब्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक अकेले भारत में ही ये इंडस्ट्री 40 अरब डॉलर से ज्यादा की है। अब कोरोना के दौर में इसमें और बढ़त का अनुमान लगाया जा रहा है। लोग वर्चुअल ज्योतिष की ओर बढ़े, जिसे देखते हुए कई एस्ट्रोलॉजिकल स्टार्ट-अप शुरू हो चुके हैं। वहीं कई पुरानी वेबसाइट्स की ओर भी लोग जा रहे हैं। जैसे गणेशा स्पीक्स, एस्ट्रो सेज, एस्ट्रो यात्रा, एस्ट्रो वेद और एस्ट्रो टॉक।

कैसे काम करती हैं ये वेबसाइट्स
इसमें जाकर लोगों को अपॉइंटमेंट लेना होता है। लगभग आधे घंटे का सेशन होता है, जिसमें सवाल पूछे जाते हैं। यहां कोरोना के बाद ज्योतिष खास स्पिरिचुअल हीलिंग भी दे रहे हैं। अपने परिवार के किसी सदस्य को खो चुके लोग करियर या पैसे की बजाए मन की शांति की बात करते हैं। तब उन्हें इसी तरह के रास्ते सुझाए जाते हैं कि सुकून मिल सके।

भविष्य जांचने के अजीबोगरीब तरीके
वैदिक ज्योतिष और टैरो कार्ड रीडिंग जैसे तरीके काफी पॉपुलर हैं लेकिन कई बेहद बेतुके तरीके भी हैं, जिनके बारे में भविष्यवक्ता दावा करते हैं कि वे क्लाइंट के बारे में सब पता लगा लेते हैं। ऐसा ही एक तरीका है कॉफी कप रीडिंग। इसे टेसिओग्राफी भी कहते हैं। इसमें कॉफी के अलावा चाय से भी फ्यूचर जाना जाता है। दरअसल चाय या कॉफी पीने के बाद कप में जो शेप बनता है, ये एस्ट्रोलॉजर उसे ही प्रेडिक्ट करते हैं। एक तरीका और भी अजीब है, जिसे बट रीडिंग कहते हैं। जी हां, आप बिल्कुल ठीक पढ़ और समझ रहे हैं। इसमें एस्ट्रोलॉजर अपने क्लाइंट के बट की स्टडी कहते हैं और बताते हैं कि उनका भविष्य क्या होगा। भविष्य जानने की इस विधा को रुम्पोलॉजी कहते हैं। हालांकि इस तरह से भविष्य जान सकने का दावा कितना सच्चा है या कितने लोग इन एस्ट्रोलॉजर्स के पास जाते हैं, इसका कोई डेटा नहीं। भारत में इसका कोई चलन भी नहीं है।

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