पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें
  • Hindi News
  • Women
  • Lifestyle
  • Prerna Became A Woman In The Short Story "Anam Prerna", In "Henna Ki Khushboo" Sasu Maa Influenced Daughter in law And "Noise" Conveyed Wife's Emotions

दो लघुकथा, एक कविता:शॉर्ट स्टोरी "अनाम प्रेरणा" में एक महिला बनी प्रेरणा, "मेंहदी की खुश्बू" में सासू मां ने किया बहू को प्रभावित और "नि:शब्द" ने बयां किए पत्नी के इमोशंस

एक वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक

लघुकथा : अनाम प्रेरणा

लेखक : संतोष उत्सुक

उन दिनों मैं चंडीगढ़ में कार्यरत था। रिहाइशी सेक्टर 42 में लगे अर्जुन, बेल और जामुन जैसे अनेक स्वास्थ्यवर्धक वृक्षों ने पर्यावरण बहुत समृद्ध किया हुआ है। सुबह-शाम सैर करने के लिए सड़क के उस तरफ़ आम के पेड़ों से भरा पार्क तो फ़्लैट के पीछे खुला मैदान। दोनों जगह काफ़ी लोग सैर किया करते।

हम पति-पत्नी सुबह आम के वृक्षों की सोहबत में सैर करते थे, जहां कितनी ही बार मोर मिल जाते थे। पत्नी मोर परिवार के साथ फोटो खिंचवाती थी। कई बार तो पांच मोर-मोरनियां दिख जाते थे और मोर का नृत्य भी। कभी-कभार बारिश हो जाती तो मौसम थोड़ी ठंडक के साथ ख़ुशगवार हो जाया करता।

एक शनिवार रात की बात है, हमारे घर कुछ मेहमान आए हुए थे। खाना खाते और गप्पें लड़ाते हुए देर से सोना हुआ। सुबह अलार्म बजा तो उठने का मन न होते हुए भी उठ गया। देखा पत्नी अभी उठी नहीं है, जगाने की कोशिश की तो बोली, ‘आज बहुत थकी हुई हूं, आप घूम आएं।’ कुर्सी पर बैठे बाहर मैदान की ओर देखते हुए जूते पहनने लगा तो लगा कुछ देर में बारिश हो सकती है।

सीढ़ियों से उतरकर दो फ्लोर नीचे पहुंचा तो बारिश शुरू हो चुकी थी और ठंडी हवा भी चल रही थी। दोनों सूरतों ने मुझे अपने फ़्लैट की तरफ़ वापस भेज दिया। कुर्सी पर बैठकर बाहर देखने लगा, बारिश तेज़ हो गई थी। एकबारगी दिल किया कि थोड़ी देर और सो लूं, रविवार है। चाय पीने का मन किया तो रसोई में गया और चाय बनाकर पत्नी को भी दी।

उसने पूछा, ‘आप भी नहीं गए आज’, तो बताया बारिश हो रही है। चाय पीते-पीते, बारिश कम हो गई थी। बाहर देखा मैदान के किनारे एक प्रौढ़ महिला छतरी लेकर टहल रही हैं। सोचा कहीं जा रही होंगी, लेकिन नहीं, उन्होंने मैदान का पूरा चक्कर लगाया और सैर करती रहीं।

बारिश रुकी नहीं थी और वह निरंतर सैर कर रही थीं। उन्होंने धीरे-धीरे चलकर पूरे तीन चक्कर लगाए। मुझे अपने आप पर शर्म महसूस हो रही थी कि ज़रा-सी बारिश के कारण मैंने सैर पर जाना टाल दिया। जब मुझसे उम्र में काफ़ी बड़ी महिला बारिश में सैर कर सकती हैं तो मैं क्यों नहीं कर सकता, जबकि डॉक्टर के परामर्श के अनुसार मुझे रोज़ सैर करनी ही थी।

जल्दी से जूते के तस्मे बांधते हुए पत्नी से कहा कि जा रहा हूं। उस दिन छतरी लेकर सैर करने का मज़ा आ गया। वापस आया तो पत्नी बोली, ‘अरे वाह, आज तो जनाब बारिश में ही सैर करने चले गए थे।’ मैंने हंसते हुए बिल्कुल ताज़ा मिली प्रेरणा बारे उन्हें बताया। उस अनाम, अनजान प्रेरणा ने चंद मिनट में ही मेरी ज़िंदगी की किताब में बेहद सकारात्मक पाठ जोड़ दिया था, जिसे मैंने बार-बार पढ़ा और दूसरों को भी प्रेरित किया।

सैर की नियमितता बरक़रार रखना स्वास्थ्य के लिए कितना ज़रूरी है, यह समझना सचमुच महत्वपूर्ण रहा। आज भी सैर के लिए निकलते समय यदि सामान्य बारिश हो तो मैं जाता ज़रूर हूं। छतरी हाथ में उठाए अनाम प्रेरणा को याद अवश्य करता हूं।

लघुकथा : मेहंदी की ख़ुशबू

लेखिका : स्वाति

मां जी मैं ज़रा बाज़ार से होकर आती हूं। दीदी को मेहंदी, चूड़ियां और सुहाग की चीज़ें भेजनी होंगी न। सावन के तो कुछ दिन भी निकल गए। दीदी इंतज़ार कर रही होंगी। वंदना ने अपनी सास से कहा।

‘ठीक है बहू। लेकिन जल्दी आ जाना। लग रहा है कि बारिश होने वाली है।’ वंदना की सास ने प्यार से देखते हुए कहा। वंदना मुस्कराते हुए बाहर निकल गई।

एक घंटे में जब वह वापस आई तो अपने कमरे में सुहाग के सामान और चटख लाल रंग की साड़ी देख हैरान रह गई।

‘ये सब किसका सामान है मां जी?’ वंदना ने पूछा।

‘तुम्हारा है बहू! तुम्हारी मां नहीं हैं तो क्या मैं तुम्हारे लिए सावन में ये सब नहीं ला सकती? मैं भले भूल जाऊं मगर तुम मेरी बेटियों को तीज-त्योहारों पर परम्परा की चीज़ें भेजना नहीं भूलती। तो मैं ये कैसे भूल जाती कि अब तुम्हारी मां नहीं रही तो तुम्हारे लिए इन परम्पराओं को कौन निभाएगा!’ सास ने लाड़ भरे स्वर में कहा।

वंदना कुछ भी बोल नहीं पाई। सास के गले लगते ऐसा लगा मानो अपनी मां के ही गले लगी हो। बाहर सावन बरस रहा था और आंखों से ख़ुशी के आंसू!

कविता : नि:शब्द

लेखिका : सुरभि नोगजा

कहते थे न तुम

मत चलो आज कहीं

घर पे ही रहते हैं,

बहुत थक गया हूं

आओ, ज़रा यहीं बैठते हैं।

और मैं फिर तुनक जाती

मनमौजी जो हूं,

बिना तुम्हारे भाव को समझे

बेबात तुमसे उलझ जाती।

बाहर का वो शोर-शराबा,

तुम्हें कभी पसंद था ही नहीं

घर की शांत दीवारों पर

तुम फिदा थे, यूं ही।

बस इसी बात पर,

खीझ जाती मैं

ज़िद्दी हूं न बहुत,

बड़ा सताती तुम्हें।

तुम धीर गंभीर से बने,

मेरे हर नखरे को सहते

मैं कितना ही हल्ला मचाऊं

पर तुम कुछ न कहते।

मेरी हर ज़िद को तुम,

सिर आंखों पर लेते

बात ग़लत हो मेरी फिर भी,

साथ मेरा ही देते।

पर आज क्यूं मानी ज़िद मेरी

क्यूं चले गए बाहर,

जब रहना था घर पे ही।

समझा देते न आज भी मुझे,

कि ये बीमारी कोई मज़ाक़ नहीं

घर रहना आजकल कोई सज़ा नहीं

थोड़ा रूठती थोड़ा झगड़ती,

पर कभी तो समझती।

लो सुनो, अब कह रही हूं मैं

आज मत ले चलो कहीं,

मुझे घर ही रहना है,

अब तुम कुछ बोलो न,

मुझे और कुछ नहीं कहना है,

मुझे और कुछ नहीं कहना है।