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संघर्ष से मिली सफलता:स्वसहायता समूह की महिलाओं को बताई जाती है मालती की सफलता की कहानी, गांवों में ब्रांड बनी इनकी आजीविका एक्सप्रेस

4 महीने पहले
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भोपाल के बैरसिया रोड स्थित गांव रतुआ रतनपुर में रहने वाली 27 वर्षीय मालती कुशवाह एक सफल कारोबार की पहचान रखती हैं। इनकी कहानी आजीविका मिशन में स्वसहायता समूह की हजारों महिलाओं को बताई जाती है। मालती से जब हमने सवाल किया कि उनकी जिंदगी में इतने दिनों में क्या बदला? तो वे कहती हैं कि एक वक्त था जब हम खाने को मोहताज थे। अब हमारा पक्का घर है और दोनों बच्चे निजी स्कूल में पढ़ रहे हैं। खुद मालती दूसरी महिलाओं का मार्गदर्शन कर रही हैं। आप भी जानिए इस सफलता के पीछे के संघर्ष की कहानी मालती की जुबानी।

बदल दिए घर के हालात 

आठ साल पहले मैं शादी कर ससुराल पहुंची। घर टूटा-फूटा था। आर्थिक हालात भी ठीक नहीं थे, लेकिन मैंने तय कर लिया कि खुद अपने घर की तस्वीर बदलूंगी। मैं सिर्फ दसवीं पास थी और पति मजदूर थे। मैंने सोचा कि ऐसा क्या करूं कि घर के हालात बदलें। फिर मैंने पति की मजदूरी के पैसों से एक हाथ ठेला लिया और उसमें अपना जनरल स्टोर सजाया।

गांव-गांव पहुंचने लगी

गांव की महिलाओं को उनकी जरूरत का सामान गांव में ही उपलब्ध कराया। धीरे-धीरे दूसरे गांव के लोग भी स्टोर पर आने लगे। फिर साइकिल से आसपास के गांवों में जाना शुरू किया। महिलाओं की जरूरत का हर सामान उन्हें गांव में ही उपलब्ध कराया। 80 हजार रुपए का लोन लेकर मारुति वैन ले ली और इससे ही काम करने लगी। 

बुरा समय भी देखा 

हमारी वैन पहुंचते ही गांवों में महिलाएं जुटना शुरू हो जाती। धीरे-धीरे हालात बदले और फिर पति को भी अपने काम में साथ ले लिया। हमने खुद का स्टोर खोल लिया है। पक्का मकान बन गया है। बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ रहे हैं। एक समय था जब न घर में खाने का ठिकाना था न कच्चे घर की मरम्मत करा पा रहे थे। घर से बेघर होने की नौबत आ गई थी। अब इस बात का भी फख्र है कि ये सबकुछ हमने अपनी जीवटता से हासिल किया है।

कोरोबार की सीख लेने आते हैं

दूसरे लोग हमसे कारोबार की सीख लेने आते हैं। स्वसहायता समूह से जुड़ी महिलाएं हमसे बैंक के लेनदेन की बारीकियां समझने आती हैं। एक समय था जब हम खुद इन बातों को लेकर दूसरों के भरोसे रहते थे। अब हम दूसरों के लिए रोल मॉडल बन गए हैं। जिंदगी में इससे ज्यादा क्या चाहिए।

पत्नी ने दी नई दिशा
नरेंद्र कहते हैं कि पत्नी ने उनका पूरा जीवन बदल दिया। पहले वे मजदूरी करते थे। अब खुद के जनरल स्टोर के मालिक हैं। नरेंद्र खुद भी आसपास के 7 से 8 गांव में कपड़े और कॉस्मेटिक्स आइटम बेचने जाते हैं। कहते हैं कि रोजाना दो से ढ़ाई हजार रुपए कि आय हो जाती है।

दूसरी महिलाओं को कर रहीं मोटिवेट
आजीविका मिशन की डिस्ट्रिक्ट कोआर्डिनेटर रेखा पांडे कहती हैं कि मालती की कहानी अब सबके लिए मिसाल है। आजीविका मिशन से जुड़ी महिलाओं को उसके संघर्ष की कहानी बताई जाती है। रेखा कहती हैं कि मालती ने न सिर्फ अपना जीवन बदला बल्कि आसपास के गांवों की महिलाओं को भी एक नई राह दिखाई है। अब हम मालती को स्वसहायता समूह की महिलाओं को ट्रेनिंग देने के लिए बुलाते हैं।

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