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डॉक्टर्स डे पर 5 महिला डॉक्टर्स की कहानियां / डॉ तरु ने बिहार के गरीबों को अपनाया तो डॉ. लीला जोशी ने आदिवासी महिलाओं को जीना सिखाया, डॉ. इंदिरा ने देश के पहले टेस्ट ट्यूब बेबी से इतिहास रच दिया

Story of 5 women doctors of India who gave new heights to the health care sector at the grassroots level, so far, many honors have been received for medical services
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Story of 5 women doctors of India who gave new heights to the health care sector at the grassroots level, so far, many honors have been received for medical services

दैनिक भास्कर

Jul 02, 2020, 11:33 AM IST

हमारे देश की महिला डॉक्टर्स द्वारा मेडिकल क्षेत्र में दिए गए योगदान के लिए भारत सरकार ने इन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित किया है। डॉक्टर्स डे पर आज हम बात कर कर रहे हैं भारत की पांच डॉक्टर्स के बारे में जिन्होंने अपनी मेहनत से मेडिकल क्षेत्र में खास मुकाम हासिल किया है। 

डॉ. तरु जिंदल 
इनके पिता भाभा ऑटोमिक रिसर्च सेंटर में वैज्ञानिक थे। 2013 में तरु ने मुंबई में मेडिकल कॉलेज और सायन हॉस्पिटल से ऑब्सटेरिक्स और गायनेयोकोलॉजी में एमडी किया। इसके बाद इनके पास बड़े कॉर्पोरेट अस्पतालों में नौकरी के कई विकल्प थे लेकिन डॉ. तरु ने केयर इंडिया और डॉक्टर्स फॉर यू के जरिये बिहार की स्वास्थ्य सेवाओं में सुधारे लाने के लिए मोतिहारी, चम्पारण आने का निर्णय लिया।

तरु ने इस अस्पताल की दयनीय स्थिति को सुधारने में दिन-रात एक कर दिया। उनके अथक प्रयासों से 2017 में मोतिहारी जिला अस्पताल को भारत सरकार द्वारा ‘कायाकल्प अवार्ड‘ से सम्मानित किया गया। तरु ने बिहार के मसारी में भी हेल्थ केयर सेंटर की शुरूआत की लेकिन ब्रेन ट्यूमर होने की वजह से वे इस अस्पताल में अपना अधिक समय नहीं दे सकीं।

उन्होंने एक किताब भी लिखी है। इसका नाम ''ए डॉक्टर्स एक्सपेरिमेंट इन बिहार'' है। 

डॉ. लीला जोशी 
डॉक्टर लीला जोशी ने अपने कॅरिअर के शुरूआती दिनों में असम में काम किया था। वहीं उनकी मुलाकात मदर टेरेसा से हुई। मदर टेरेसा से प्रभावित होकर रिटायरमेंट के बाद लीला ने मध्यप्रदेश की आदिवासी महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए काम किया।

डॉक्टर लीला आदिवासी अंचलों में जाकर वहां की महिलाओं का निशुल्क इलाज करती हैं। डॉ. जोशी पिछले 22 सालों से इस कार्य में लगी हुईं है। 82 साल की उम्र में भी उनके जोश में कोई कमी नहीं आई है। स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. लीला जोशी ने आयरन की कमी से जूझती आदिवासी महिलाओं को सेहतमंद बनाने के लिए कैंप लगाए और मुफ्त इलाज किया।

उनकी उपलब्धियों को देखते हुए भारत सरकार ने 82 वर्षीय लीला जोशी को पद्मश्री से सम्मानित किया। 

डॉ. पद्मावती बंदोपाध्याय 
डॉ.पद्मावती बंदोपाध्याय ने उस जमाने में सेना में जाने का फैसला किया, जब लड़कियों को घर से निकलने की भी आजादी नहीं थी। उन्होंने वायु सेना में तैनाती के दौरान भारत-पाक के बीच हुए 1971 के युद्ध और कारगिल युद्ध में भी हिस्सा लिया।

उनके सहारानीय कार्यों को देखते हुए उन्हें विशिष्ट सेवा पदक, अति विशिष्ट सेवा पदक और राष्ट्रपति से सम्मान पदक सहित देश-दुनिया में करीब एक दर्जन से ज्यादा सम्मान मिल चुके हैं।

उन्हें लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड ने वर्ष 2014 के लिए वुमन ऑफ द ईयर चुना। पद्मावती और उनके पति दुनिया के पहले ऐसे कपल हैं, जिन्हें विशिष्ट सेवा पदक एक ही दिन एक साथ मिला था।

डॉ. इंदिरा हिंदुजा 
6 अगस्त 1986 को केईएम अस्पताल में भारत के पहले टेस्ट ट्यूब बेबी का जन्म करा कर इतिहास रचने वाली डॉ. इंदिरा हिंदुजा का परिवार मूल रूप से पाकिस्तान के शिकारपुर का रहने वाला था। विभाजन के बाद वह परिवार के साथ भारत आ गईं। उन्होंने अपनी शिक्षा-दीक्षा मुंबई में ही की।

बॉम्बे यूनिवर्सिटी से स्त्री रोग विज्ञान में एमडी की डिग्री हासिल करने के बाद उन्होंने अपना पूरा जीवन लोगों की सेवा में लगा दिया। उन्होंने बॉम्बे यूनिवर्सिटी से ह्युमन इन वर्टियो फर्टिलाइजेशन व एंब्रियो ट्रांसफर में पीएचडी की डिग्री हासिल की। 

15 जुलाई, 1991 को उन्हें मुंबई के सार्वाधिक प्रतिष्ठित माने जाने वाले जसलोक अस्पताल में ऑनरेरी ऑब्सटेट्रीशियन एंड गायनेकोलॉजिस्ट बनाया गया और वे अब तक वहां से जुड़ी हैं। वर्ष 2011 में उन्हें भारत सरकार द्वार दिये जाने वाले तीसरे सबसे बड़े पद्म पुरस्कार पद्मश्री से सम्मानित किया गया। 

इसके अलावा उन्हें धनवंतरी अवॉर्ड, इंटरनेशनल वुमंस डे अवॉर्ड, लाइफटाइम अचीवमेंट और आउटस्टैंडिंग लेडी ऑफ महाराष्ट्र स्टेट जैसे अवार्ड भी मिल चुके हैं।

डॉ. शांति रॉय 
बिहार के सीवन गांव तक चिकित्सा सेवाएं पहुंचाने में डॉ. शांति रॉय का खास योगदान हैं। गायनेकोलॉजिस्ट और ऑब्सटट्रिशियन शांति को पद्मश्री सम्मान प्राप्त है। उन्होंने महिलाओं को दी जाने वाली मेडिकल सेवाओं को विकसित किया।

रिटायर होने के बाद वे पटना मेडिकल कॉलेज में गायनेकोलॉजी विभाग की हेड ऑफ द डिपार्टमेंट हैं। काफी व्यस्त होने के बाद आज भी वे महिलाओं को अपनी सेहत के प्रति जागरूक करने की हर संभव कोशिश करती हैं।

डॉ. शांति रॉय कहती हैं कि भारत की महिलाएं पति और बच्चों की देखभाल में दिन-रात लगी रहती हैं। वे अपने परिवार के लिए रोज अच्छे से अच्छा खाना बनाती हैं। लेकिन जब उनके स्वास्थ्य की बात आती है तो खुद की देखभाल करने में वे सबसे पीछे हैं। 

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