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सेल्फी सिंड्रोम / बार- बार सेल्फी लेना भी है एक सिंड्रोम, आप भी हो सकते है ‘सेल्फाइटिस’ के शिकार

Taking a selfie again and again is also a syndrome, you can also be a victim of 'selfitis'
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Taking a selfie again and again is also a syndrome, you can also be a victim of 'selfitis'

दैनिक भास्कर

Jan 21, 2020, 03:34 PM IST
लाइफस्टाइल डेस्क. लोग रोज़ाना दो-तीन सेल्फी लेते हैं, तो कुछ इसकी सीमा तय नहीं कर पाते। सेल्फी लेना जब लत बन जाती है, तो ‘सेल्फाइटिस’बीमारी कहलाती है। यह एक तरह का मानसिक विकार है, जिसमें व्यक्ति  दिन भर में कई सेल्फी लेता है। इसका उसके दिमाग और व्यवहार दोनों पर असर पड़ता है। अगर आप एक दिन में चार-पांच से ज़्यादा सेल्फी ले रहे हैं तो इस पर गौर कीजिए, आप सेल्फी सिंड्रोम का शिकार बन सकते है।

जानिए क्या है सेल्फी सिंड्रोम के कारण

यह भी एक तरह का मानसिक विकार है, जो सोशल मीडिया से जुड़ा हुआ है। तवज्जो पाने के लिए व्यक्ति अपनी सेल्फी, तस्वीरें या स्टेटस जैसी पोस्ट लगातार सोशल मीडिया पर डालता है। यह लत सोशल नार्सिसिज़्म कहलाती है। सोशल मीडिया पर लगातार प्रोफाइल पिक्चर बदलते रहना, कई स्टेटस या तस्वीरें पोस्ट करना, दिन में 60 से 100 बार सोशल मीडिया अकाउंट जांचना, कमेंट या चैट के जरिए अधिक बातचीत करना, कमेंट के जरिए क्रोध या आक्रामक होने जैसी लत इस विकार का नतीजा होती हैं।ह एक तरह का मानसिक विकार है, जिसमें व्यक्ति दिन भर में कई सेल्फी लेता है। इसका उसके दिमाग और व्यवहार दोनों पर असर पड़ता है।

अच्छी सेल्फी लेने के प्रयास में बार-बार तस्वीरे लेना, लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करना, भरोसे की कमी और फिट होने व सबसे अच्छा दिखने की भावना, सामाजिक तौर पर होड़, सोशल मीडिया पर अधिक लाइक पाने की चाह, कमेंट्स और तारीफें पाने की होड़ करना आदि बार-बार सेल्फी लेने के कारण हो सकते हैं।

जब व्यक्ति को मनमुताबिक तारीफ़ या तवज्जो नहीं मिलती है, तो वह निराश और चिड़चिड़ा हो जाता है। अन्य लोगों के मुकाबले जब तस्वीर अच्छी नहीं होती है या वह अपनी तस्वीरों से संतुष्ट नहीं होता तो उसके आत्मविश्वास में कमी आने लगती है। वह अकेला रहना पसंद करता है, परिवार और करीबियों से दूरी बना लेता है या फिर नशे का आदी हो जाता है। इससे डिप्रेशन का शिकार हो सकता है और साथ ही खुदकुशी भी कर सकता है। 

इस तरह की लत से छुटकारा दिलाने के लिए आमतौर पर कॉग्नीटिव बिहेवियरल थैरेपी (सीबीटी) का इस्तेमाल दुनियाभर में किया जाता है। यह थैरेपी लत के शिकार व्यक्ति को उसकी अंदरूनी विचार प्रक्रिया, भावना और कार्य के बीच संबंध तलाशने के लिए प्रेरित करती है। सीबीटी से ऐसे व्यक्ति में मादक पदार्थों के सेवन, आत्महत्या करने के विचार, अवसाद आदि को बढ़ावा देने वाली गलत धारणा और असुरक्षा की भावना को दूर करने में मदद मिलती है। हालांकि व्यक्ति की स्थिति पर भी उसका उपचार निर्भर करता है। ऐसे में यदि आप या आपके आस-पास कोई सेल्फी या सोशल नार्सिसिज़्म से ग्रस्त है, तो उसे विशेषज्ञ के पास ले जाएं। इसके अलावा आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए नियमित काउंसलिंग भी करा सकते हैं। 

बॉडरलाइन सिंड्रोम- इसमें व्यक्ति कई सेल्फी लेता है, लेकिन इन्हें सोशल मीडिया पर नहीं डालता है। 

एक्यूट सिंड्रोम- इस स्थिति में व्यक्ति कई सेल्फी लेता है और इन्हें हर जगह पोस्ट करता है जैसे फेसबुक, इंस्टाग्राम, स्नैपचेट आदि। 

क्रॉनिक सिंड्रोम- इस स्थिति में व्यक्ति कई सेल्फी लेने के बाद भी संतुष्ट नहीं होता। उसके मन में और सेल्फी लेने का विचार बना रहता है।
 

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