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  • Women Should Seek Legal Aid If They Are Victims Of Domestic Violence, They Have Got The Right To File A Case In Case Of Any Kind Of Restraint Or Assault.

लेकर रहें अपना हक:महिलाएं घरेलू हिंसा का शिकार होने पर विधिक सहायता लें, किसी प्रकार की रोक-टोक या मारपीट होने पर उसे मिला है प्रकरण दर्ज कराने का अधिकार

ज्योति शर्मा, पैरालीगल वॉलेंटियर, हाईकोर्ट5 दिन पहले
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पति ने गाली-गलौज कर पत्नी को बुरी तरह डंडों से मारा, जिससे उसके एक हाथ में फ्रैक्चर हो गया। पति ने गुस्से में आकर पत्नी के मुंह पर तेजाब उड़ेल दिया। जिससे उसका पूरा चेहरा झुलस गया। कई बार तो लड़ाई होने पर पत्नियों को घर से बाहर निकाल दिया जाता है। ये कुछ उदाहरण हैं समाज में स्त्री जाति पर होने वाले अत्याचारों के, जिन्हें आए दिन अखबारों की सुर्खियां बनते हुए देखा जा सकता है। इन सबके खिलाफ घरेलू हिंसा अधिनियम बनाया गया है, लेकिन जानकारी के अभाव में पीड़‍िताएं इनका फायदा नहीं उठा पाती। उन्हें अपने अधिकारों की ही जानकारी नहीं हैं। हाई कोर्ट की पैरालीगल वॉलेंटियर ज्योति शर्मा बता रही हैं महिलाओं से जुड़े घरेलू हिंसा अधिनियम के बारे में।

जोन अनुसार अधिकारी नियुक्त किए घरेलू हिंसा अधिनियम का निर्माण 2005 में किया गया और 26 अक्टूबर 2006 से इसे लागू किया गया। यह अधिनियम महिला एवं बाल विकास द्वारा ही संचालित किया जाता है। शहर में महिला एवं बाल विकास द्वारा प्रत्येक जोन के अनुसार आठ संरक्षण अधिकारी नियुक्त किए गए हैं। ये अधिकारी घरेलू हिंसा से पीड़‍ित महिलाओं की शिकायत सुनते हैं और पूरी जांच पड़ताल करने के बाद प्रकरण को न्यायालय भेजा जाता है।

गलत व्यवहार का विरोध तुरंत करें

हर क्षेत्र में महिलाएं किसी न किसी रूप से प्रताड़ना का शिकार होती हैं। कई महिलाएं चाहकर भी इसकी शिकायत नहीं करती हैं। उनका मानना है कि कौन कानूनी पचड़े में पड़े। महिलाओं की यही गलती लोगों को बढ़ावा देती है। अगर किसी महिला के साथ कुछ भी गलत व्यवहार हो रहा है तो उसका विरोध तुरंत करना चाहिए।

महिलाएं किसी भी प्रताड़ना के खिलाफ कर सकती हैं शिकायत

ऐसी महिलाओं के लिए लिए भी कानून बनाए गए हैं जो कुटुंब के भीतर होने वाली किसी भी किस्म की हिंसा से पीड़ित हैं। इसमें अपशब्द कहे जाने, किसी प्रकार की रोक-टोक करने, गाली-गलौज करने और मारपीट करना आदि प्रताड़ना के प्रकार में शामिल हैं। इस अधिनियम के अंतर्गत महिलाओं के हर रूप मां, भाभी, बहन, पत्नी और किशोरियों से संबंधित प्रकरणों को शामिल किया जाता है। घरेलू हिंसा अधिनियम के अंतर्गत प्रताड़ित महिला किसी भी वयस्क पुरुष को अभियोजित कर सकती है अर्थात उसके विरुद्ध प्रकरण दर्ज करवा सकती हैं।

जानकारी के अभाव में परेशान होती रहती हैं महिलाएं

एक पीड़ित महिला इतनी परेशान हो चुकी है कि उनका कहना है कि भले ही घरेलू हिंसा अधिनियम महिलाओं के हित के लिए बनाया गया है, लेकिन मुझे इसका कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है। अधिनियम में न्याय की अवधि छह महीने दी गई है जबकि मुझे तो कोर्ट में केस लगाने में ही छह महीने लग गए। एक साल से तो कोर्ट के चक्कर लगा रही हूं। न्याय कब मिलेगा या मिलेगा भी या नहीं, इसकी कोई गारंटी नहीं है। जब इतना ही परेशान होना है तो किस काम का घरेलू हिंसा अधिनियम। ऐसी परेशानी महिलाओं को जानकारी के अभाव में उठानी पड़ती है।

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