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ब्रिटेन में गैस, इलेक्ट्रिक चूल्हे पर खाना बनाना मुसीबत:3.50 लाख तक पहुंचा बिजली बिल, माइक्रोवेव से साल भर का खर्च 2500 रुपए

नई दिल्ली5 दिन पहले
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रूस-यूक्रेन में मुसलसल चल रही जंग का असर दुनिया भर के रसोईघरों में दिखने लगा है। रूस, यूरोप समेत दुनिया भर में तेल और गैस का बड़ा सप्लायर है। लेकिन जंग और रूस पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के चलते यह सप्लाई प्रभावित हुई है। जिसके चलते दुनिया भर में, खासकर यूरोप में गैस की भारी किल्लत हो गई।

इसके बाद यूरोप के रसोई घरों में इलेक्ट्रिक कूकरों से खाना बनाया जाने लगा था। लेकिन कुछ महीने में ही बेतहाशा बिजली बिल ने इस रास्ते को भी बदलने पर मजबूर कर दिया।

CNBC की एक रिपोर्ट के मुताबिक ब्रिटेन में एवरेज एनर्जी बिल 3,594 यूरो यानी लगभग 3 लाख 35 हजार रुपए सालाना तक पहुंच गया है। जिसके बाद लोग खाना बनाने के लिए वैकल्पिक साधनों की तलाश कर रहे हैं।

चूंकि पश्चिमी देश कोयले और लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाना काफी पहले छोड़ चुके हैं; ऐसे में उनके पास अब खाना बनाने का सबसे किफायती तरीका ‘माइक्रोवेव’ बचा है। आग की जगह इलेक्ट्रो मैग्नेटिक तंरगों से पका खाना ही अब यूरोप का पेट भरेगा।

इलेक्ट्रिक कूकर से 10 गुना सस्ता है माइक्रोवेव

ब्रिटिश अखबार ‘द संडे टाइम्स’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक इन दिनों यूके में खाना पकाने के लिए माइक्रोवेव का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। ‘यूटिलिटा’ के एक सर्वे के मुताबिक ब्रिटेन में साल भर में इलेक्ट्रिक कूकर इस्तेमाल करने पर औसत बिल 316 यूरो (करीब 25 हजार रुपए) है। जबकि माइक्रोवेव यही काम मात्र 30 (करीब 2400 रुपए) यूरो में करता है।

हाल के वर्षों में झटपट खाना बनाने के लिए इलेक्ट्रिक कूकरों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा था। लेकिन बढ़ते बिल को देखते हुए लोग अब माइक्रोवेव जैसी पुरानी तकनीक की ओर रुख करने लगे हैं।

लगातार बदलती रही खाना बनाने की तकनीक

खाना बनाने के लिए इंसान हजारों सालों से आग के भरोसे रहा है। सबसे पहले ये आग लकड़ी और उपले से सहारे जलाई गई। इसके बाद 1860 के दशक में गैस स्टोव का आविष्कार हुआ। लेकिन 1950 में दशक में खाना बनाने के तरीके में क्रांतिकारी बदलाव आया। अब खाना सीधे आग की जगह ‘इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगों’ से पकाया जाने लगा है। यही तकनीक ‘माइक्रोवेव’ कहलाई। फिर 1990 के आस पास इलेक्ट्रिक कूकर लोकप्रिय हुए।

कैसे काम करता है माइक्रोवेव, हीट ओवन से कैसे अलग है?

माइक्रोवेव ओवन की तकनीक खाना बनाने के दूसरी तकनीकों से बिलकुल अलग है। माइक्रोवेव ओवन में खाना आग के संपर्क में नहीं आता।

इसमें फिलामेंट या गैस भी नहीं जलती। इसमें चैंबर (ओवन) में बिजली के सहारे इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वेव पैदा की जाती है।

इस वेव को खाने के बीच से गुजारा जाता है। खाने के बीच से गुजरने पर खाने में मौजूद पानी के कण (हाइड्रोजन और ऑक्सीजन) मूव करने लगते हैं। जिससे एनर्जी बनती है और खाना गर्म होने लगता है।

जबकि साधारण हीट ओवन में बिजली के सहारे फिलामेंट के जलाया जाता है। जिसकी गर्मी से खाना पकता है। साधारण हीट ओवन से खाने का बाहरी भाग (जो हिटिंग रॉड की ओर है) अच्छे से पक जाता है। जबकि अंदर कच्चा रह जाता है। दूसरी और, माइक्रोवव पूरे खाने को समान रूप से पकाता है।

एक्सीडेंट से हुआ था माइक्रोवेव ओवन का आविष्कार

वैसे तो इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वेव के बारे में साइंटिस्ट्स 1890 के दशक तक काफी कुछ पता कर चुके थे। लेकिन किसी को इससे कुकिंग का ख्याल नहीं आया। लेकिन 1945 में हुए एक सांंटिफिक एक्सीडेंट ने दुनिया को खाना बनाने के नए तरीके से परिचय कराया।

हुआ कुछ यूं कि अमेरिकन साइंटिस्ट 'पर्सी स्पेंसर' इलेक्ट्रो मैग्नेटिक वेब प्रोड्यूस करने वाले डिवाइस पर कुछ ऐक्सपेरिमेंट कर रहे थे। इस दौरान उनकी जेब में एक चॉकलेट बार रखी थी। पर्सी ने पाया कि इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वेब के संपर्क में आने पर उनकी जेब में रखी चॉकलेट मेल्ट कर गई। यहीं उन्हें वेव के सहारे खाना बनाने का आइडिया आया।

350 किलो का था पहला माइक्रोवेव ओवन, 40 लाख थी कीमत

1947 में अमेरिका में कॉमर्शियल यूज के लिए दुनिया का पहला माइक्रोवेव ओवन बनाया गया था। 340 किलो के इस माइक्रोवेव ओवन की कीमत आज के हिसाब से तकरीबन 40 लाख रुपए थी। लेकिन जैसे-जैसे वैज्ञानिक इसमें सुधार करते गए; इसका वजन और इसकी कीमत दोनों कम होती चली गई। साल 1986 तक 25% अमेरिकी घरों में माइक्रोवेव ओवन का इस्तेमाल होता था। 1997 तक यह आंकड़ा 90% तक बढ़ गया।

खाने की तरह शरीर को भी पका सकता है माइक्रोवेव, रेडिएशन का भी खतरा

सस्ते में और झटपट खाना बनाने वाला माइक्रोवेव ओवन कई मायनों में खतरनाक भी हो सकता है। अगर इससे निकलने वाली वेव शरीर के संपर्क में आ जाए तो वो उसे भी खाने की तरह चंद सेकेंड में पका देगी। साथ ही कई लोग इससे निकलने वाले रेडिएशन को लेकर भी चिंता जाहिर करते रहे हैं। लेकिन वैज्ञानिकों को अभी तक ऐसे किसी भी खतरे के बारे में पता नहीं चला है।