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डिजिटल डिवाइड:2 करोड़ लड़कियां शायद अब कभी स्कूल नहीं आएंगी, कम उम्र में कर दी जाएगी शादी!

नई दिल्लीएक वर्ष पहलेलेखक: दीप्ति मिश्रा
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पिछले साल मार्च में कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए देश भर में लॉकडाउन लगा दिया। स्कूल-कॉलेज, दफ्तर और बाजार बंद हो गए। लोग घरों में कैद हो गए। शुरू हो गईं बच्चों की ऑनलाइन क्लासेस और बड़ों की ऑफिस मीटिंग और वेबिनार। मोबाइल, लैपटॉप और इंटरनेट सुविधा न होने के चलते महामारी की सबसे ज्यादा मार बच्चियों की पढ़ाई लिखाई पर पड़ी। हाल ही में एक स्टडी में लड़कियों की स्कूली शिक्षा को लेकर चौंकाने वाला खुलासा हुआ। स्टडी में कहा गया कि 2 करोड़ लड़कियां अब शायद कभी स्कूल नहीं लौट सकेंगी। पढ़िए, भास्कर वुमन की रिपोर्ट...

पढ़ाई नहीं हो पाई तो दे दी जान
मैं पढ़ाई के बिना जिंदा नहीं रह सकती..सुसाइड नोट में यह लिखकर 12वीं में 98% अंक लाकर अपने शहर में टॉप करने वाली हैदराबाद की ऐश्वर्या रेड्डी ने जान दे दी। ऐश्वर्या का दाखिला दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज में हो गया था, लेकिन ऑनलाइन पढ़ाई में दिक्कत आ रही थी, जिससे निराश होकर उसने फांसी लगा ली। वहीं केरल के मलप्पुरम जिले में एक दलित छात्रा ने ऑनलाइन पढ़ाई न कर पाने की वजह से आग लगाकर आत्महत्या कर ली। 9वीं में पढ़ने वाली इस छात्रा की ऑनलाइन क्लासेस चल रही थी, लेकिन उसके घर में स्मार्टफोन या कंप्यूटर नहीं था। पढ़ाई बंद हो जाने की वजह से लड़कियों के तनाव आने और जान देने जैसी सैकड़ों घटनाएं हुईं। कुछ सामने आईं तो कुछ का जिक्र ही नहीं हुआ।

प्रतीकात्मक तस्वीर
प्रतीकात्मक तस्वीर

कहीं पैसा तो कहीं नेटवर्क बना मजबूरी
मध्य प्रदेश के मुरैना की रिचा दुबे कहती हैं, मेरा सपना था कि अपनी इकलौती बेटी को अच्छे स्कूल में पढ़ाऊंगी, लेकिन लॉकडाउन में पति की नौकरी चली गई। घर खर्च चलाना मुश्किल हो गया। ऑनलाइन पढ़ाई के​ लिए इंटरनेट पर खर्च करने के लिए हमारे पास पैसे नहीं थे। स्कूल से फीस भरने के लिए बार-बार फोन आ रहे थे। आखिर में मुझे बेटी का स्कूल से नाम कटवाना पड़ा। रिचा के पति सौरव दुबे ट्रांसपोर्ट लाइन में नौकरी करते थे। उत्तर प्रदेश के एटा जिले के गांव कसेला निवासी देवेश कुमार बताते हैं कि मेरे तीन बच्चे हैं, दो ​बेटियां और एक बेटा। लॉकडाउन के बाद स्कूल बंद हो गए। मोबाइल था, लेकिन नेटवर्क इश्यू रहता था। इसलिए चाहकर भी बच्चे ऑनलाइन क्लासेस में पढ़ाई नहीं कर पाए।

क्या है डिजिटल डिवाइड?
इंटरनेट और प्रौ​द्योगिकी की पहुंच रखने वालों लोगों के बीच जो असमानता की खाई है, उसे ही डिजिटल डिवाइड कहते हैं। शहरी लोगों की तुलना में गांव में रहने वालों की टेक्नोलॉजी तक पहुंच बहुत सीमित है। तकनीक की दुनिया में पुरुषों की तुलना में महिलाएं अभी भी बहुत पीछे हैं।

राइट टू एजुकेशन फोरम ने सेंटर फॉर बजट एंड पॉलिसी स्टडीज और मलाला फंड से जुड़े चैंपियंस फॉर गर्ल्स एजुकेशन के साथ मिलकर भारत के पांच राज्यों- यूपी, बिहार, असम, तेलंगाना और दिल्ली में एक स्टडी की। सेंटर फॉर बजट एंड पॉलिसी स्टडीज की रिसर्चर नेहा घटक बताती हैं कि 'मैपिंग द इंपैक्ट ऑफ कोविड-19 ऑन द लाइव्स एंड एजुकेशन ऑफ चिल्ड्रन इन इंडिया' नाम की इस स्टडी को तीन राउंड में पूरा किया गया। इसमें कोरोना का लड़कियों की शिक्षा पर कितना असर हुआ है, इस बारे में पता लगाया गया।

प्रतीकात्मक तस्वीर
प्रतीकात्मक तस्वीर

सिर्फ 30 फीसदी लड़कियों के हाथ मोबाइल
रिसर्चर नेहा घटक के मुताबिक, ऑनलाइन क्लासेस शुरू होने के बाद स्टडी का पहला राउंड अप्रैल, 2020 में किया गया। इसमें पता चला कि एक बड़े तबके के पास मोबाइल, लैपटॉप और इंटरनेट सुविधा नहीं है। देश भर में सिर्फ 30 फीसदी लड़कियों की ही मोबाइल तक पहुंच है। ज्यादातर घरों में जो मोबाइल, लैपटॉप या कंप्यूटर है, वो लड़कों के हाथ में हैं। बात जब ऑनलाइन पढ़ाई की आती है तो पहले लड़कों को तवज्जो दी जाती है।

11% सिर्फ टीवी पर देखे एजुकेशनल प्रोग्राम
स्टडी का दूसरा राउंड जब स्कूल खुलना शुरू हो गए तब किया गया, जिसमें पांच राज्यों के 3,176 परिवारों को शामिल किया गया। नेहा ने बताया कि हमारी ​टीम ने जिन परिवारों से बात की। कोरोना ने उनकी कमाई का जरिया छीन लिया। दो वक्त की रोटी के लाले पड़े हुए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, गरीब तबके के परिवारों में से 70 फीसदी ने माना कि उनके पास दो वक्त के खाने के लिए खाना नहीं है। ऐसे में बड़ी संख्या में बच्चों का स्कूल छूट रहा है। स्टडी में शामिल 37 फीसदी लड़कियों और 27 फीसदी लड़कों ने माना कि उन्हें पढ़ाई के लिए मोबाइल नहीं मिल पाया। वहीं कुल परिवारों में से 52 फीसदी परिवारों के पास ही टीवी था। इनमें से भी सिर्फ 11 फीसदी बच्चों ने ही टीवी पर एजुकेशन प्रोग्राम देखने की बात कही।

प्रतीकात्मक तस्वीर
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खतरे में बचपन, बाल मजदूरों की संख्या बढ़ी
नेहा घटक के मुताबिक, स्टडी के तीसरे राउंड में पता चला कि परिवारों की मदद करने के लिए बड़ी संख्या में लड़कों ने काम करना शुरू कर दिया है, जिससे चाइल्ड लेबर यानी कि बाल मजदूरी के मामले बढ़ गए हैं। लॉकडाउन के बाद से ज्यादातर लड़कियां घर में कैद हैं। करीब 90 फीसदी लड़कियों को पढ़ाई के समय में भी घर के काम करने पड़ते हैं, जबकि 38 फीसदी लड़कों से ही घर के काम करने को कहा जाता है।

लड़कियों की कम उम्र में शादी का खतरा बढ़ा
यूनिसेफ ने कोविड के बाद भारत में बच्चों की शिक्षा पर एक सर्वे किया, जिसमें सामने आया कि दो करोड़ से अधिक लड़कियां शायद अब कभी स्कूल नहीं लौट पाएंगी। रिपोर्ट में कहा गया कि अगर लड़कियां स्कूल नहीं लौट सकेंगी तो उनकी कम उम्र में शादी करने का खतरा बढ़ जाएगा।

चार साल भी नहीं पढ़ पाती लड़कियां
शिक्षा का अधिकार यानी राइट टू एजुकेशन (आरटीई) के तहत 6 से 14 साल तक की उम्र के बच्चों के लिए पहली से 8वीं तक की पढ़ाई मुफ्त में देने की व्यवस्था है। गरीब तबके की लड़कियां स्कूल के इन 8 सालों में से 4 साल भी पूरे नहीं कर पाती हैं।

महामारी ने बदतर बना दी जिंदगी
महामारी ने महिलाओं के लिए स्थिति को और भी बदतर बना दिया। इस दौरान महिलाओं को अपने कामकाज के साथ-साथ घर परिवार की जिम्मेदारी, दूरस्थ शिक्षा, बच्चों और बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल सबका भार संभालना पड़ा। वर्ष 2020 के अगस्त और सितंबर में 2.16 लाख पुरुषों ने नौकरी छोड़ी। इस अवधि में करीब चार गुना अधिक यानी 8.65 लाख महिलाओं को अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी।