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100 फीसदी कागज के बॉटल्स बनाने वाली समीक्षा गनेरीवाल:शार्क टैंक इंडिया से भी आया था कॉल, 'कागजी बॉटल्स' नाम से शुरू किया स्टार्टअप

नई दिल्ली4 महीने पहलेलेखक: दीक्षा प्रियादर्शी

मैं जब भी ट्रैवल करती थी तो मेरे दिमाग में ये बात बहुत खटकती थी कि हम केवल पानी पीने के लिए प्रकृति को कितना नुकसान पहुंचा रहे हैं। ना जाने कितने ही प्लास्टिक के बॉटल्स खरीद कर हम यूं ही फेंक देते हैं और सोचते भी नहीं है। ये शब्द है समीक्षा धनेरिवाल के। दिल्ली में रहने वाली बिजनेसवुमन समीक्षा गनेरीवाल कागज से बोतलें बना रही हैं। उन्होंने साल 2018 में 'कागजी बॉटल्स' नाम से एक स्टार्टअप लांच किया। यह देश का पहला ऐसा स्टार्टअप है, जो 100% कंपोस्टेबल पेपर से बोतलें बनाते हैं।

समीक्षा बताती हैं, सुबह टूथब्रश से ब्रश करना हो या फिर ऑफिस में दिन भर कंप्यूटर पर काम, बाजार से कोई सामान लाना हो या वाटर बॉटल या टिफिन बॉक्स में खाना और पानी लेकर चलना, प्लास्टिक हर जगह है। काफी कोशिशों के बाद भी मुझे कोई विकल्प नहीं मिला। फिर मैंने सोचा कि क्यों न इको फ्रेंडली पैकेजिंग प्रोडक्ट्स बनाए जाएं। उसके बाद मैंने एक ऐसी कंपनी बनाई, जो पूरी तरह से 100% कंपोस्टेबल कागज की बोतल बनाने पर फोकस्ड हो।

आर्टिकल में नैनो पार्टिकल के बारे में जाना फिर आया आइडिया

2018 में अपने बेटे के जन्म के बाद मेरी नजर एक आर्टिकल पर पड़ी। इस आर्टिकल में नैनो पार्टिकल के बारे में जानकारी दी गई थी। ये कुछ ऐसा था जो मेरी कुछ अलग कर दिखाने की चिंगारी को हवा दे सकता था। मैंने पढ़ा कि नैनो पार्टिकल एक ऐसा लिक्विड होता है जिसका इस्तेमाल कर के कागज को पानी रोकने लायक बनाया जा सकता है और सबसे अच्छी बात तो ये थी कि इस लिक्विड पर जो साइंटिस्ट काम कर रहे थे, वो इंडियन हैं। मैंने उनसे संपर्क किया और वो भी मेरे प्रोजेक्ट में मदद करने को तैयार हो गए। असल में, मैं इको फ्रेंडली पेपर बॉटल्स बनाना चाहती थी, जिससे प्रकृति का कोई नुकसान ना हो और हम वैसे ही इसे भी कैरी कर सकें जैसे प्लास्टिक के बॉटल्स को करते हैं। मैं घर में ही इसके ऊपर रिसर्च करने लगी, इसकी शुरुआत मैंने एग ट्रे से की।

मैं एग ट्रे में सॉल्यूशन ब्रश कर के धूप में सूखने डालती और उसमें पानी भर के छोड़ देती थी। कई एक्सपेरिमेंट फेल होने और लिक्विड के कंपोजिशन बदलने के बाद फाइनली मैं कामयाब हुई। इस बार एग ट्रे पानी रखने के 24-25 दिनों के बाद भी खराब नहीं हुआ था। मैं इस चीज को लेकर बहुत खुश थी। हालांकि, अभी कई ऐसे फेज बाकी थे जिस पर मुझे काम करना था।

पानी के लिए यूज होने वाली प्लास्टिक की बॉटल्स को रिप्लेस करने के लिए समीक्षा कुछ ऐसा बनाना चाहती थीं, जो कंपोस्टेबल हो।
पानी के लिए यूज होने वाली प्लास्टिक की बॉटल्स को रिप्लेस करने के लिए समीक्षा कुछ ऐसा बनाना चाहती थीं, जो कंपोस्टेबल हो।

सवाल था कागज का बोतल कोई इसे क्यों खरीदेगा

मैंने जिसको भी इस प्रोजेक्ट के बारे में बताया उसने पहली बार में इसको बहुत सीरियसली नहीं लिया। यहां तक कि मेरे पिताजी ने भी ऐसा ही किया। सबका यही कहना था कि कोई भी 20 रुपए की लागत देकर ये कागज के बॉटल्स को क्यों खरीदेगा, जबकि प्लास्टिक की बॉटल (बिना पैकेजिंग सिर्फ बॉटल) 3 से 4 रुपए में मिल जाती है। हालांकि, मैं जानती थी कि अगर ये प्रोडक्ट मार्केट में आएगा तो इसमें जरूर इंटरेस्ट लेंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि लोग भी आजकल सस्टेनेबल चीजों को लेकर काफी अवेयर रहते हैं और वो ऐसी चीजों को प्रमोट भी करते हैं।

प्लास्टिक की बॉटल्स से ज्यादा रेट होने के कारण समीक्षा के लिए इसे मार्केट में प्लेस करना मुश्किल था।
प्लास्टिक की बॉटल्स से ज्यादा रेट होने के कारण समीक्षा के लिए इसे मार्केट में प्लेस करना मुश्किल था।

भाई और जीजाजी ने कहा 'मुझे तुम पर पूरा भरोसा है'

समीक्षा बताती हैं कि मेरा एक्सपेरिमेंट तो कामयाब रहा लेकिन इसको लागू करने को लेकर कई चुनौतियां थीं। मैंने इसको लेकर अपने छोटे भाई समर्थ गनेरीवाल को फोन किया और उसको अपने प्रोजेक्ट को लेकर पूरी बात बताई। इसके अलावा मैंने ये भी बताया कि अगर मैंने ये कर दिखाया तो ये बहुत बड़ी बात होगी। मैं देश की पहली ऐसी बिजनेस वुमन होंगी, जो इस तरह का कुछ कर रही होंगी। भाई ने मुझसे बात सपोर्ट करते हुए कहा कि बिल्कुल इसपर काम करना चाहिए। बात कर के जैसे ही मैंने फोन काटा उसने मुझे तुरंत ही पैसे ट्रांसफर कर दिया। मैंने उसे वापस फोन कर के कहा कि मैं तुमसे पैसे नहीं मांग रही थी। मैंने तो सिर्फ अपना आइडिया शेयर किया था। भाई ने कहा कि मैंने तो सिर्फ एक छोटा सा सपोर्ट किया है, मुझे तुम पर पूरा भरोसा है, तुम जरूर सफल होगी।

ये मेरी लाइफ का टर्निंग प्वाइंट था और इस प्रोजेक्ट की शुरुआत मैंने इसी भरोसे से किया, जो मेरे भाई ने मुझ पर दिखाया था।भाई के अलावा मेरे जीजाजी, जिनका नाम सिद्धार्थ है उन्होंने भी हमेशा से मुझपर भरोसा था, वो कहते थे तुम चाहे जो भी करो मै तुम्हारा साथ जरूर दूंगा। आज वो मेरे कंपनी के शेयर होल्डर हैं। बाद में फैमिली के बाकी लोगों ने भी इस काम को आगे बढ़ाने में बहुत सपोर्ट किया।

समीक्षा के सबसे पहले अपने भाई समर्थ के साथ अपना आईडिया शेयर किया।
समीक्षा के सबसे पहले अपने भाई समर्थ के साथ अपना आईडिया शेयर किया।

शार्क टैंक इंडिया से भी आया था कॉल

भाई के सपोर्ट करने के बाद बॉटल्स का स्ट्रक्चर और मोल्ड्स को लेकर काम शुरू हो गया। जब भी फंड्स की कमी होती मेरे पति मेरी मदद करते हैं। मीटिंग के लिए जब भी बाहर जाती हूं। मेरे पति ही बच्चों और घर दोनों का ख्याल रखते हैं। ये मेरे लिए बहुत बड़ा मोरल सपोर्ट होता है। इसके बाद हस्बैंड की मदद से मोल्ड और रॉ मटेरियल के लिए हिमाचल के एक बिजनेसमैन ने मेरी मदद की और हम मोल्ड बनाने में कामयाब रहें। इस दौरान मुझे शार्क टैंक इंडिया से कॉल भी आया था कि मैं प्रपोजल लेकर वहां जाऊं। मगर, मेरा प्रोडक्ट पूरी तरह कम्पलीट नहीं था। उसके कैप और टेस्टिंग को लेकर काम करना था। इसके अलावा मुझे मटेरियल को लेकर 100% तक कन्फर्मेशन चाहिए था। इस वजह से मैं उसमें हिस्सा नहीं ले पाई थी। शार्क टैंक के अलावा भी मुझे इंवेस्टमेंट को लेकर कई लोगों के कॉल आए थे।

घर से बाहर होने पर समीक्षा के पति मनिष गोविल घर और बच्चों का ख्याल रखते हैं और उनके बिजनेस को सेट करने में भी उनकी मदद कर रहे हैं।
घर से बाहर होने पर समीक्षा के पति मनिष गोविल घर और बच्चों का ख्याल रखते हैं और उनके बिजनेस को सेट करने में भी उनकी मदद कर रहे हैं।

कॉलेज में जाकर एडमिशन के लिए रिक्वेस्ट करती थी

ये प्रोजेक्ट पर काम करने के समय जब भी मैं निराश होती थी। उस समय को याद करती थी। जब एडमिशन के लिए मैं डेली डीन के ऑफिस में जाकर उनसे एक मौका मांगा करती थी। मुझे याद है कि राजस्थानी मारवाड़ी परिवार से होने के कारण हमारे यहां लड़कियों का बाहर जाकर पढ़ना बहुत बड़ी बात होती थी। उस समय मामी के सपोर्ट और पापा से जिद कर के पुणे पढ़ने के लिए गई थी।

हालांकि, इसको लेकर पापा की शर्त थी कि किसी ऐसे कॉलेज में एडमिशन मिल जाए, जिसमें ज्यादा पैसे ना लगते हो। इसलिए मैं अपने कॉलेज के डीन के पास जाकर डेली रिक्वेस्ट करती थी कि वो मुझे एक मौका दें। ऐसा करीब मैंने 7 दिनों तक किया और आखिर में जाकर उन्होंने मुझे एडमिशन दे दिया। उस दिन मैं ये समझ गई थी कि अगर इंसान चाहे तो कुछ भी पॉसिबल है।

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